राजधानी के अस्पतालों में व्यवस्थाएं चौपट, मरीज को समय पर नहीं मिल पाता इलाज


भोपाल (आरएनएस)। प्रदेश के जिला मुख्यालय में आपातकालीन व्यवस्थाएं पूरी तरह से चौपटा नजर आती हैं। दुर्घटना के बाद अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को भी हर रोज इंतजार करना पड़ रहा है। शासकीय अस्पतालों में तीन ट्रामा के इंतजाम हैं। इसमें जयप्रकाश (जेपी) अस्पताल, एम्स भोपाल और हमीदिया अस्पताल शामिल है। जेपी अस्पताल में दुर्घटना के बाद आने वाले मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद रेफर कर दिया जाता है। एम्स में भी दुर्घटना के बाद मरीजों को एंट्री मिल पाना थोड़ी मुश्किल होता है। हालांकि, एक बार मरीज अस्पताल में में आ गया तो उसका पूरे प्रोटेक्शन के साथ उपचार दिया जाता है। इधर, सबसे बड़ी परेशानी घायलों को हमीदिया अस्पतालों में आती है। यहां मरीज के अस्पताल पहुंचने के बाद भी उसके साथियों को स्टे्रचर से लेकर वार्डब्वाय के सहयोग से लिए गए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है। जिन घायलों के साथ कोई नहीं आता उन्हें बेहतर इलाज नहीं मिल पाता।

शहर की सड़कों में वर्तमान में 41 एंबुलेंस दौड़ रही हैं। इसमें जननी एक्सप्रेस 17 और 104 एंबुलेंस हैं। स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सकों की मानें तो कई बार अधिकतर घायलों को गोल्डन आवर अर्थात दुर्घटना के पहले घंटे में सही इलाज न मिलने से मरीज की कई बार मौत तक हो जाती है। घटना स्थल से अस्पताल पहुंचने में जितना ज्यादा समय लगता है, मरीज के बचने की उम्मीद उतनी ही कम होती चली जाती है। 108 एंबुलेंस की नई सेवा प्रदाता कंपनी को शहरी क्षेत्र में काम के बाद 18 मिनट में पहुंचने का लक्ष्य दिया गया है। जबकि पिछले टेंडर में यह समय 25 मिनट था। ऐसे ही ग्रामीण क्षेत्रों में 25 से 30 मिनट में पहुंचने का लक्ष्य था।

लेकिन कई बार एंबुलेंस इस समय सीमा में भी नहीं पहुंच पाती है। इसका कारण है कि टेंडर की शर्तों के अनुसार सर्विस प्रदाता कंपनी ने लोकेशन वेस्टड सर्विस शुरु नहीं की है।

ऐसे में कई मामलों में घटना स्थल ही नहीं मिल पाता है और चिकित्सीय मदद पहुंचने में देरी होती है। भापेाल शहर में छह माह में 1415 सड़क हादसे हुए हैं। इनमें घायल हुए लोगों को 108 एंबुलेंस की मदद से अस्पतालों में भर्ती कराया गया। इसमें निजल वाहनों और निजी एंबुलेंस की संख्या अतिरिक्त है।


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