• dainik kshitij kiran

तेल की मार के राष्ट्रवादी तर्क


जैसे सुबह होती है, शाम होती है, इसी के साथ तुक यह भी मिलती है-जिंदगी तमाम होती है। जिंदगी तमाम हो, उससे पहले वह हर हाल में तेल के नाम हो! सरकार की पूरी ‘तैलीय’ कोशिश है। सूरज उगता है, चांद निकलता है, मुर्गा बोलता है, नेता मुंह खोलता है, वैसे ही तेल खोलता है। भाव बढ़ते हैं। भाव बढऩा नित्य क्रिया की तरह है, होना है, होता है और होगा। आलम यह है कि लोगों ने कोरोना के संग ही नहीं, तेल के बढ़ते भावों के साथ भी जीना सीख लिया है। मान लिया है, वायरस से बचे तो तेल से निपटेंगे। तेल से बच लिए तो वायरस अब हवा में भी आवारागर्दी करने लगा है।

इस बार सरकार ने तेल के पैसे एक साथ ना बढ़ाकर थोड़े-थोड़े का दर्शन अपनाया हुआ है। थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है। कहावत है, बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। घड़ा तो पाप का भी भरता है, लेकिन आजकल वह फूटता नहीं है, पुण्य की जबरदस्त मार्केटिंग के जरिए पब्लिक के सिर पर रख परिक्रमा करवाई जाती है। यदि दाम नर्वस नाइंटीज के शिकार नहीं हुए तो इस दफा शतक पक्का।

इधर डीजल की खुशी छुपाए नहीं छुप रही है। पहली बार पेट्रोल को पछाड़ आगे निकला है तो कायदेनुसार आपे से बाहर है, ताऊ हट जा थोड़ो पाछे ना, नाचण दे मैंने जी भर के...! ताऊ तो पाछे ही नहीं हटा, बल्कि धड़ाम गिरा है, किसान जो ठहरा। ताऊ है, तो किसान ही होगा। किसान या तो लटकेगा, या रस्सी खरीदने के लिए लोन नहीं मिला, तो गिरेगा।

मैंने एक नेता से आपत्ति जताई, तो वे बोले, आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि इसके जरिए कित्ता बड्डा मैसेज दिया है, मतलब पेट्रोल खरगोश है, डीजल कछुआ है, अंतत: आगे निकल ही गया, यानी कि कहानी आज भी प्रासंगिक है। मैंने कहा-डीजल आगे निकल गया, लेकिन अब महंगाई उससे आगे निकल जाएगी, गरीब, किसान, कमजोर वर्ग बहुत पीछे छूट जाएगा।

किसी दिन सूरज निकलने से रुक सकता है, लेकिन भाव बढऩे से नहीं। रोज दाम बढऩा अब नियति है, किसी दिन न बढऩा ही भाग्य है। इसी भाग्य के सहारे लोग तेल की धार देख रहे हैं। यह दिख रहा है कि दाम एकदम से नहीं बढ़ रहे हैं, वरना सरकार के पास तो अध्यादेश का विकल्प भी है। किसान विकास के लिए जमीन ना दे तो अध्यादेश झट से खेत की तारबंदी कूदकर आ जाता है। यह सरकार की मंशा और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचायक है। दृढ़ता के ड्रम में इच्छा और शक्ति घोल दो तो संकटकाल में भी तेल के दाम बढ़ाए जा सकते हैं।

असल में सीख दी है कि दो-चार पैसे में भी बहुत ताकत होती है। वैसे ही लोग भी दो-चार पैसे की बचत कर सकते हैं। ऐसे समय में, जब नौकरियां जा रही हैं, काम-धंधे छूट रहे हैं, आदमनी घट रही है, तेल की धार के जरिए दो-चार पैसे की वैल्यू सरकार समझा रही है। थोड़े बहुत लहूलुहान भी हो जाएं, तो यह गर्व का विषय है, इसे राष्ट्रवादी भावों की तरह अंगीकार किया जा सकता है।

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