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ताकि दूर हो सुस्ती

भारतीय रिजर्व बैंक ने लगातार चौथी बार रेपो रेट घटाई है। इसे 0.35 फीसदी घटाकर 5.40 प्रतिशत पर ला दिया गया। रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर रिजर्व बैंक कमर्शल बैंकों को कर्ज देता है। अभी तक आरबीआई अपनी दरों में बदलाव चौथाई फीसदी को ही इकाई मानकर करता रहा है। इस बार 0.35 फीसदी का हेरफेर यह बता रहा है कि ब्याज दरें नीचे लाने के घोषित इरादे के बावजूद उसके हाथ किस कदर बंधे हुए हैं। हालांकि गवर्नर शक्तिकांत दास ने संकेत दिया है कि दरें आगे और घटाई जा सकती हैं। जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बजट में तय 7 प्रतिशत से घटाकर 6.9 फीसदी कर दिया जाना चिंताजनक है, हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए इसे भी आशावादी आकलन ही कहा जाएगा। रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति के काबू में रहने को एक बड़े फैक्टर के रूप में देख रहा है लेकिन इसकी एक वजह यह भी है कि बाजार में मांग नदारद है। लगातार ब्याज दरें घटाने के बावजूद औद्योगिक उत्पादन रफ्तार नहीं पकड़ रहा है। कोर सेक्टर में आने वाले आठ उद्योगों की वृद्धि दर जून में 0.2 प्रतिशत पर सिमटी रही। वाहन उद्योग में मंदी का रुख बरकरार है। जुलाई में प्रमुख ऑटोमोबील कंपनियों की बिक्री में दहाई की गिरावट दर्ज की गई। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ग्लोबल रैंकिंग में भारतीय अर्थव्यवस्था पांचवें से फिसलकर सातवें स्थान पर आ गई है। विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पैसे निकालना जारी है। लेकिन आरबीआई गवर्नर इन्हें ढांचागत के बजाय चक्रीय मंदी का ही लक्षण मानते हैं। दिक्कत सिर्फ एक है कि उनकी सकारात्मकता बाजार तक नहीं पहुंच पा रही। दरों में कटौती का माहौल पर कोई बड़ा असर अबतक नहीं देखने में आया है। बैंकों ने इसका लाभ उपभोक्ताओं तक कम पहुंचने दिया है और कर्ज लेने में लोगों की खास दिलचस्पी भी नहीं है। जो थोड़े बहुत लोन दिए जा रहे हैं वे उत्पादक नहीं साबित हो रहे, लिहाजा एक खतरा है कि इनका और सस्ता होना कहीं सट्टेबाजी और जमाखोरी का सबब न बन जाए। ज्यादातर बैंकों ने सस्ते कर्ज का इस्तेमाल अपना बट्टा खाता दुरुस्त करने में किया है लिहाजा न सिर्फ रिजर्व बैंक गवर्नर बल्कि वित्त मंत्री तक को बैंकों से कहना पड़ा है कि वे रेट कट का लाभ ग्राहकों को दें। एक बात तय है कि अभी की परिस्थितियों में ब्याज दरों के मोर्चे पर जितनी मदद की उम्मीद वित्त मंत्रालय को थी, उसे मिल रही है। लिहाजा अर्थव्यवस्था को गति पकड़ाने का जिम्मा अब उसे अपने कंधों पर ही लेना होगा। कुछ ऐसे फैसले उसको करने होंगे जिनसे कंस्ट्रक्शन जैसे ठहरे सेक्टरों का ठहराव टूटे और बाजार में मांग पैदा हो। हलचल अभी इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सरकारी निवेश से ही आ रही है तो कुछ बड़ी सड़क और रेल परियोजनाओं का जल्दी लोकार्पण होना चाहिए।


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