• dainik kshitij kiran

ठेके को ठेंगा

हरियाणा मंत्रिमंडल की बैठक में लिये गये उस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि यदि गांव के दस प्रतिशत लोग भी चाहें तो गांव में शराब का ठेका नहीं खुलेगा। नि:संदेह यह समय की जरूरतों का फैसला है। कई बार दस फीसदी ही नहीं, ज्यादा प्रतिशत में लोगों के चाहने के बाद भी फैसला उनके अनुकूल नहीं आता। एक तो अब तक ऐसे फैसलों का अधिकार ग्राम पंचायतों के पास रहा है, दूसरे उनके फैसले पारदर्शी नहीं रहते। फिर शराब लॉबी प्रलोभन व दबाव के चलते ग्रामीणों की आवाज को दबा देती थी। एक बात यह भी है कि समाज में प्रतिरोध के स्वर मद्धम ही नजर आते हैं। तटस्थ लोगों की संख्या ज्यादा होती है जो किसी बात को गलत मानते हुए भी प्रतिरोध के साथ खड़े नहीं होते। अक्सर देखने में आता है कि कई गांवों में शराब के ठेकों के खिलाफ महिलाएं लामबंद होती हैं, मगर उन्हें गांव के मर्दों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाता। निश्चय ही हरियाणा सरकार के फैसले से ऐसी महिला आंदोलनकारियों को संबल मिलेगा। व्यापक अर्थों में देखें तो यह भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता के अधिकारों को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण फैसला कहा जा सकता है। यदि बड़े विवादों पर जनता की राय का एक आदर्श प्रतिशत तय किया जाये तो नकारात्मक प्रभाव वाली स्थितियों से बचा जा सकेगा। नि:संदेह शराब का तेजी से बढ़ता प्रचलन समाज को खोखला कर रहा है। युवा पीढ़ी शराब के सेवन से पथभ्रष्ट होती नजर आ रही है। शराब की लत के कितने घातक प्रभाव हो सकते हैं, उन्हीं परिवारों को इसका अहसास होता है, जो इसकी तबाही से दो-चार हैं। इसमें दो राय नहीं कि शराब और अपराध का सीधा रिश्ता भी है। यौन हिंसा व हत्याओं से जुड़े मामलों में अक्सर खुलासा होता है कि अपराधी शराब पीये था।

यह बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि मनोहर सरकार ने यह कदम जजपा के दबाव में उठाया या फिर यह मुद्दा उसके एजेंडे में पहले से ही था। समाज में सही दिशा में उठे प्रतिरोध?के सुरों को तरजीह दी ही जानी चाहिए। फिर जब मुद्दा युवा पीढ़ी को तबाही की तरफ ले जाती शराब का हो तो उसे सुना जाना चाहिए। यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि क्या राज्य शराबबंदी की ओर बढ़ रहा है। हरियाणा में बंसीलाल सरकार के दौरान वर्ष 1996 में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, जिसके सार्थक परिणाम नहीं निकले। बल्कि शराब बिक्री का एक समानान्तर तंत्र विकसित हो गया, जो सरकार के मुनाफे को अपनी जेब में डालने लगा। उस फैसले के दूसरे कई तरह के नकारात्मक परिणाम भी सामने आए थे। जब हरियाणा से लगे राज्यों की सीमाओं में शराब खुली हो तो राज्य में शराबबंदी का सफल होना संदिग्ध ही माना जायेगा। ऐसे में सरकार वैकल्पिक प्रयासों से शराब की बिक्री को नियंत्रित कर सकती है। फिर दूध-दही के खाने वाले हरियाणा में शराब का प्रचलन घातक ही माना जाएगा, जहां से देश को उम्दा खिलाड़ी व सैनिक मिलते हैं। इतना ही नहीं, सरकार को अन्य तरह के नशों के हरियाणा में प्रसार को नियंत्रित करने के प्रयास करने चाहिए। पड़ोसी राज्य पंजाब में पाकिस्तान की साजिशों के चलते जिस तरह नशे का कारोबार फल-फूल रहा है, उसके प्रति भी हरियाणा सरकार को सतर्क रहना चाहिए। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गये तो कालांतर स्थिति चिंताजनक हो सकती है। यह अच्छी बात है कि हरियाणा सरकार ने अगले साल मार्च के महीने में जारी होने वाली आबकारी नीति में बदलाव करने का फैसला कर लिया है। भले ही शराब सरकार की आय का बड़ा जरिया है मगर जब समाज ही स्वस्थ नहीं रहेगा तो ऐसे फायदे का क्या औचित्य। सरकार को इस दिशा में और रचनात्मक कदम उठाने की जरूरत है।


0 views0 comments

Recent Posts

See All

सोने की लंका लुटी पांच सितारा उपचार में

आलोक पुराणिक कबीरदास सिर्फ संत ही नहीं थे, अर्थशास्त्री थे। उनका दोहा है—सब पैसे के भाई, दिल का साथी नहीं कोई, खाने पैसे को पैसा हो रे, तो जोरू बंदगी करे, एक दिन खाना नहीं मिले, फिरकर जवाब करे। सब पैस

पश्चिम बंगाल में चुनावी कटुता भुलाने का समय

कृष्णमोहन झा/ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र की मोदी सरकार के बीच टकराव का जो सिलसिला ममता बनर्जी के दूसरे कार्यकाल में प्रारंभ हुआ था वह उनके तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही पहले स

उत्पादकता बढ़ाने में सहायक हो ऋ ण

भरत झुनझुनवाला वर्तमान कोरोना के संकट को पार करने के लिए भारत सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेने की नीति अपनाई है। ऋण के उपयोग दो प्रकार से होते हैं। यदि ऋण लेकर निवेश किया जाए तो उस निवेश से अतिरिक्त आ