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टिड्डी: हवा में उड़ती आफत


पहले टिड्डी दलों के गुडग़ांव पहुंचने और दिल्ली के कुछ हिस्सों समेत एनसीआर के कई इलाकों में छा जाने से टिड्डियां अचानक खबरों में आ गईं, लेकिन हकीकत यही है कि देश के आठ-दस बड़े राज्यों में जारी उनका उत्पात अभी उस हद तक राष्ट्रीय अजेंडे पर नहीं आ पाया है, जितना इसे आना चाहिए था। पिछले डेढ़ महीने से पाकिस्तान की ओर से राजस्थान के रास्ते टिड्डी दल देश में घुसते चले आ रहे हैं।

इससे पहले इन्होंने राजस्थान, गुजरात और पंजाब के किसानों को संकट में डाला था, लेकिन इस बार के धावे में इन्होंने हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ही नहीं, महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे दूर के राज्यों में भी किसानों का जीना हराम कर रखा है।

कोरोना, लॉकडाउन, और सीमा पर तनाव जैसी चौतरफा चुनौतियों से जूझती केंद्र सरकार के लिए अपनी पूरी ऊर्जा और ध्यान टिड्डी दलों से मुकाबले पर केंद्रित करना फिलहाल संभव नहीं है। लेकिन इससे मिलती-जुलती समस्याएं अभी दुनिया के कई और देशों के सामने भी हैं, जिससे टिड्डी दलों का खतरा बहुत बड़ा हो गया है। सबसे बुरी स्थिति पूर्वी अफ्रीका के देशों में है, जहां पिछले 70 सालों के सबसे भीषण टिड्डी हमलों ने केन्या, युगांडा, सूडान, साउथ सूडान, इथियोपिया, सोमालिया, इरीट्रिया और जिबूती जैसे देशों में अकाल की नौबत ला दी है।

यहां 50 लाख से भी ज्यादा लोगों के सामने भुखमरी का खतरा पैदा हो गया है। भारत में इसको पिछले 25 वर्षों का सबसे घातक हमला बताया जा रहा है लेकिन कोई नहीं जानता कि अगर जल्द ही इनका सफाया नहीं किया गया तो इनसे होने वाला नुकसान कहां जाकर थमेगा। ध्यान रहे कि जुलाई-अगस्त के महीने ही भारत में टिड्डियों के हमले के लिए जाने जाते रहे हैं। ऐसे में आशंका यह है कि आने वाले दिनों में टिड्डी दल अफ्रीका से निकलकर भारत का रुख करेंगे।

गैर रेगिस्तानी इलाकों में टिड्डियों के अंडे देने का समय भी यही होता है। बारिश से गीली और ढीली हुई मिट्टी इन्हें अंडे देने का सुनहरा मौका मुहैया कराती है। लेकिन टिड्डियों की चुनौती सिर्फ भारत के लिए नहीं है। संयुक्त राष्ट्र को भी इनके सफाये की मुहिम को अपनी प्राथमिकता में शामिल करना होगा। यूएन फूड ऐंड ऐग्रिकल्चर ऑर्गनाइजेशन आगाह कर चुका है कि समय रहते काबू नहीं पाया गया तो टिड्डी दलों की यह समस्या कई साल तक दुनिया का पीछा करती रह सकती है। उस स्थिति में सबसे अच्छी सूरत में भी 30 से 40 फीसदी खाद्यान्न का नुकसान अवश्यंभावी है।

सूरत उतनी अच्छी नहीं रही तो यह 50 से 70 फीसदी तक भी जा सकता है। जब कोरोना के चलते दुनिया खाद्य वस्तुओं की कमी और सप्लाई चेन टूटने के कारण पहले से ही खाद्य संकट के मुहाने पर खड़ी है, तब टिड्डियों की समस्या के विकराल रूप धरने की गुंजाइश भला कैसे छोड़ी जा सकती है।

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