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टिड्डियों से निपटने को दूरगामी रणनीति बने

पंकज चतुर्वेदी


इस साल राजस्थान के थार में अभी तक कुछ खास बारिश हुई नहीं, रेत के धारों में उतनी हरियाली भी नहीं उपजी और जुलाई महीने में ही बीकानेर के आसमान में इतना बड़ा टिड्डी दल मंडराता दिखा कि दिन में अंधेरा दिखने लगा। बीकानेर के बाद चुरू, सरदार शहर तक के आंचलिक क्षेत्रों में जिस तरह टिड्डी दल पहुंच रहे हैं, उससे वहां के किसानों की मेहनत जरूर काली होती दिख रही है। जेसलमेर और बाडमेर भी कई बड़े टिड्डी दल सीमा पार से आकर डेरा जमा चुके हैं। पिछले दिनों बड़े-बड़े टिड्डी दल गुजरात के खेतों में भी डेरा जमा चुके हैं। इस बात की प्रबल आशंका है कि राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के तीन दर्जन जिलों में आने वाले महीनों में हरियाली पर संकट नजर आये। क्योंकि वहां अफ्रीका से पाकिस्तान के रास्ते आने वाले कुख्यात टिड्डों का हमला होने वाला है। टिड्डी दल का इतना बड़ा हमला आखिरी बार 1993 में यानी 26 साल पहले हुआ था।

राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाडमेर और गुजरात के कच्छ इलाकों में बारिश और हरियाली न के बराबर है। इस साल आषाढ़ लगते ही दो दिन धुआंधार बारिश हुई थी, जिसने रेगिस्तान में कई जगह नखलिस्तान बना दिया था। सूखी, उदास-सी रहने वाली लूनी नदी लबालब है। पानी मिलने से लोग बेहद खुश हैं, लेकिन इसमें एक आशंका व भय भी छिपा हुआ है। खड़ी फसल को पलभर में चट कर उजाडऩे के लिए मशहूर अफ्रीकी टिड्डे इस हरियाली की ओर आकर्षित हो रहे हैं और आने वाले महीनों में इनके बड़े-बड़े झुंडों का हमारे यहां आना शुरू हो जाएगा। पाकिस्तान ऐसे टिड्डी दल को देखते ही हवाई जहाज से दवा छिडक़वा देता है। ऐसे में हवा में टिड्डी दल भारत की ओर ही भागते हैं।

सोमालिया जैसे उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी देशों से ये टिड्डे बरास्ता यमन, सऊदी अरब और पाकिस्तान भारत पहुंचते रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि ये कीट एक बार इलाके में घुस गए तो इनका प्रकोप कम से कम तीन साल जरूर रहेगा। अतीत गवाह है कि 1959 में ऐसे टिड्डों के बड़े दल ने बीकानेर की तरफ से धावा बोला था, जो 1961-62 तक टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश) में तबाही मचाता रहा था। इसके बाद 1967-68, 1991-92 में भी इनके हमले हो चुके हैं। टिड्डी दलों के बढऩे की खबरों के मद्देनजर हाल ही में राजस्थान सरकार ने अफसरों की मीिटंग बुलाकर इस समस्या से निपटने के उपाय तत्काल करने के निर्देश दिए हैं।

वास्तव में मध्यम या बड़े आकार के वे साधारण टिड्डे (ग्रास होपर) हैं, जो हमें यदाकदा दिखलाई देते हैं। प्रकृति का अनुकूल वातावरण पाकर इनकी संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हो जाती है और तब ये बेहद हानिकारक होते हैं। रेगिस्तानी टिड्डे इनकी सबसे खतरनाक प्रजाति हैं। गिगेरियस जाति के इस कीट के मानसून और रेत के घोरों में पनपने के आसार अधिक होते हैं।

एक मादा हल्की नमी वाली रेतीली जमीन पर 40 से 120 अंडे देती है और इसे एक तरह के तरल पदार्थ से ढक देती है। कुछ देर में यह तरल सूख कर कड़ा हो जाता है और इस तरह यह अंडों के रक्षा कवच का काम करता है। सात से दस दिन में अंडे पक जाते हैं। बच्चा टिड्डा पांच बार रंग बदलता है। इस तरह हर दो-तीन हफ्ते में टिड्डी दल हजारों गुणा की गति से बढ़ता जाता है। ये दल दिन में तेज धूप की रोशनी होने के कारण बहुधा आकाश में उड़ते रहते हैं और शाम ढलते ही पेड़-पौधों पर बैठकर उन्हें चट कर जाते हैं। अगली सुबह सूरज उगने से पहले ही ये आगे उड़ जाते हैं। ताजा शोध से पता चला है कि जब अकेली टिड्डी एक विशेष अवस्था में पहुंच जाती है तो उससे एक गंधयुक्त रसायन निकलता है। इसी रासायनिक संदेश से टिड्डियां एकत्र होने लगती हैं और उनका घना झुंड बन जाता हैं। इस रसायन को नष्ट करने या उसके प्रभाव को रोकने की कोई युक्ति अभी तक नहीं खोजी जा सकी है।

संभावित टिड्डी हमले के खौफ से उससे सटे जिलों के किसानों की नींद उड़ गई है। पिछले कुछ दिनों में अभी तक कोई 155 हेक्टेयर फसल इनकी चपेट में आ चुकी है। पिछले टिड्डी हमलों के दौरान राजस्थान व मध्य प्रदेश सरकार ने मेलाथियान और बीएचसी का छिडक़ाव करवाया था और दोनों ही असरहीन रहे थे। यदि राजस्थान और उससे सटी पाकिस्तानी सीमा पर टिड्डी दलों के भीतर घुसते ही सघन हवाई छिडक़ाव किया जाए, साथ ही रेत के धौरों में अंडफली नष्ट करने का काम जनता के सहयोग से शुरू किया जाए तो फसलों की रक्षा हो सकती है। खबर है कि अफ्रीकी देशों से एक किलोमीटर तक लंबाई के टिड्डी दल आगे बढ़ रहे हैं। सोमालिया जैसे देशों में आंतरिक संघर्ष और गरीबी के कारण सरकार इनसे बेखबर हैं। जाहिर है कि इनसे निपटने के लिए भारत और पाकिस्तान को ही मिल-जुलकर सोचना पड़ेगा।

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