• dainik kshitij kiran

जासूसी को अब क्या याद करना

सहीराम


जासूसी में बेशक रोचकता होती है, उसमें सस्पेंस होता है, थ्रिल होता है। इसलिए जासूसी किताबें और कहानियां पढऩा तो बेशक अच्छा है, पर व्हाट्सएप की जासूसी को क्या याद करना। ऐसी जासूसी भी कोई जासूसी है लल्लू, जिसमें कोई कहानी ही न हो। हमारे यहां सरकारें जासूसी करवाती थीं तो कहानियां बनती थीं, सरकारें हिल जाती थीं और हिलकर कई बार तो गिर भी जाती थीं।

पर व्हाट्सएप की जासूसी में कोई कहानी नहीं बनी। जैसे अच्छी कहानी वाली जासूसी फिल्में हिट रहती हैं, वैसे ही कमजोर कहानी वाली पिट जाती हैं। समझो यह कमजोर कहानी वाली फिल्म थी, इसलिए पिट गयी। वैसे इसमें इस्राइली जासूसी थी, जो दुनिया में बड़ी हिट जासूसी मानी जाती है। कभी सीआईए और केजीबी की जासूसियां बड़ी हिट मानी जाती थी, पर अब इस्राइली जासूसी का कोई जवाब नहीं। लेकिन हमारी सरकार इस्राइल की सिर्फ इसलिए मुरीद नहीं है कि उसकी जासूसी हिट है, बल्कि इसलिए भी मुरीद है कि वैचारिक भाईचारा है। हो सकता है यह जासूसी भी भाईचारे की ही भेंट चढ़ गयी हो।

वैसे हम तो पनामा पेपर्स को ही याद नहीं करते, व्हाट्सएप की जासूसी को क्या याद करेंगे। जबकि पनामा पेपर्स के मामले में बेचारे नवाज शरीफ अभी भी जेल में पड़े हैं। खुशी की बात है कि हमारे यहां पनामा पेपर्स जैसे मामले में कोई जेल नहीं गया। हालांकि यह भी दुनिया की एक हिट फिल्म थी, जो हमारे यहां पिट गयी। सभी तो वही एक्टर्स हैं, कौन देखे भला। पर ऐसा नहीं है कि हमारे यहां ईडी, सीबीआई वगैरह नेताओं के पीछे नहीं पड़ती। चिदंबरमजी के पीछे तो ऐसी हाथ धोकर पड़ी कि बेचारे अभी तक मुश्किल में थे।

पर पनामा पेपर्स में कोई जेल नहीं गया। अपने विरोधी नेताओं को जेल भेजने के लिए हमारे यहां सरकारों के पास और बहुतेरे उपाय और रास्ते हैं। सरकारी एजेंसियां इस मामले में पूरी वफादारी से सरकार का साथ देती हैं। पर व्हाट्सएप की जासूसी तो सचमुच ही चार दिन की चांदनी निकली। सरकार तो खैर उसे क्यों याद करेगी। उस पर तो खुद शामिल होने का ही आरोप लग रहा है। सरकारों पर हमेशा ही इस तरह के आरोप लगते हैं। जब जिसकी सरकार होती है, उस पर यह आरोप लगते ही लगते हैं। पर आरोपों में भी रोचकता बन नहीं पाई। बड़ी उदासीनता है लोगों में। खुद नेताओं में है। सब यह मान बैठे हैं कि स्मार्टफोन है तो जासूसी होगी ही। इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हो तो जासूसी होगी ही। बचेगा कौन!

इसलिए व्हाट्सएप की जासूसी भी भूल में पड़ गयी है बीति ताही बिसार दे की ही तरह। कभी जासूसी का भंडाफोड़ होने पर सरकारें गिर जाया करती थीं, पर अब तो पत्ता तक नहीं खड़कता। सचमुच नया भारत बन रहा है। मुबारक!


0 views0 comments

Recent Posts

See All

सोने की लंका लुटी पांच सितारा उपचार में

आलोक पुराणिक कबीरदास सिर्फ संत ही नहीं थे, अर्थशास्त्री थे। उनका दोहा है—सब पैसे के भाई, दिल का साथी नहीं कोई, खाने पैसे को पैसा हो रे, तो जोरू बंदगी करे, एक दिन खाना नहीं मिले, फिरकर जवाब करे। सब पैस

पश्चिम बंगाल में चुनावी कटुता भुलाने का समय

कृष्णमोहन झा/ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र की मोदी सरकार के बीच टकराव का जो सिलसिला ममता बनर्जी के दूसरे कार्यकाल में प्रारंभ हुआ था वह उनके तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही पहले स

उत्पादकता बढ़ाने में सहायक हो ऋ ण

भरत झुनझुनवाला वर्तमान कोरोना के संकट को पार करने के लिए भारत सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेने की नीति अपनाई है। ऋण के उपयोग दो प्रकार से होते हैं। यदि ऋण लेकर निवेश किया जाए तो उस निवेश से अतिरिक्त आ