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जीवन का उत्सव और आशा की डोर

सुरेश सेठ

अनेक रंगों और ऋतुओं से आभूषित भारत वह देश है, जहां अनेक धर्मों का संगम है जहां मानवीयता की धारा भी इसके नाना रूपों में बहती दिखाई देती है। अभी भीषण और ठिठुरा देने वाली सर्दी में पूरे देश ने उत्साह के साथ पहले क्रिसमस मनाया, उसके बाद नये वर्ष का स्वागत किया और अब ऋतु परिवर्तन के साथ मकर संक्रान्ति मनाने का इंतजार किया जा रहा है।

बहुत बार राजनीति विशारद और समाज शास्त्री कह देते हैं-हमारे एक भारत में दो हिन्दुस्तान बसते हैं। एक भव्य अट्टालिकाओं और ऊंचे कंगूरों वाले प्रासादों वाला भारत, जो अधिकांश धन सम्पदा और ऐश्वर्य पर काबिज है और दूसरी वह तबका जो झुग्गी-झोपडिय़ों और फुटपाथों पर जीती है। देश की संपदा और सकल घरेलू आय का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा इन्हें मिलता है। एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाला यह देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। लेकिन इसके सांसद और विधायक जब हमारे जन प्रतिनिधि बनने के लिए ‘अगर मध्यावधि चुनाव न हों’ तब हर पांच साल के बाद चुनाव अखाड़े में उतरते हैं तो उनका परिचय करोड़पतियों अथवा संभावित करोड़पतियों के रूप में ही रहता है। देश की तीन-चौथाई जनता का काम उम्र भर इन्हें वोटर बन जितवाना या हराना होता है।

कहा जाता है कि यह अजब देश है जहां चन्द धनी लोग करोड़ों लोगों का हित चिन्तन करते हैं, समाजवाद के नाम पर पूंजीवाद के चोर दरवाजे खोलने के प्रयास में लगे रहते हैं। इस पौन सदी की आजादी में अमीर और गरीब का भेदभाव और गहरा हो गया है। लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय चेतना और भारतीय संस्कृति के कुछ ऐसे गहन और साझे तत्व हैं, जो इस संपन्न और विपन्न भारत को दो युद्धरत खेमों में तबदील नहीं होने देते। इसका प्रमाण अभी मनाये गये क्रिसमस और इसके समानान्तर इसी दिन धरती से जुड़े हुए इस कृषक भारत में ‘बड़े दिन’ के उत्सव को समान उत्साह के साथ मनाते देखा गया। बड़ा दिन वह दिन है जब किसान के खेतों में बीजी गेहूं की बालियों में दाने का सिट्टा पड़ता है। जहांं क्रिसमस मनाते हुआ ईसाई समाज या युवा भारत खुशी और उल्लासमय हो रहा था, वहां खेतों में कृषक समाज भी अपने खेतों में सिर उठाती बालियों को देखकर खुशी से नाचता दिखा। इस इतनी भीषण सर्दी में भी हर्ष, उल्लास और स्वागत का एक-सा भाव हर वर्ग में देखा गया। पूरे देश ने नये वर्ष का स्वागत किया। इस स्वागत में धर्म, जाति, भाषा और प्रांत का कोई भेदभाव नहीं था। अब उसी उत्साह से मकर सक्रांति के उत्सव की प्रतीक्षा है।

मौसम के बिगड़े मिजाज और भारी बर्फबारी के बीच लोग नया वर्ष मनाने के लिए देश के दर्शनीय स्थानों की ओर सरपट भाग रहे थे, या घंटों धीरज के साथ हर जगह ट्रैफिक जाम खुलने का इंतजार कर रहे थे। होटलों से लेकर धर्मशालाओं तक, मंदिर, गुरुद्वारों से लेकर क्लब घरों तक में हर वर्ग के लोग जमा रहे और नये वर्ष की आमद का स्वागत कर रहे थे। इनमें कहीं भी समाज की विसंगति नहीं दिखाई दी। यह भीड़ कदम-कदम पर साबित कर रही थी कि यह उत्सव धर्मी लोगों का देश है, जिन्हें हर हाल में अपनी जिंदगी जी लेने का भाव है। हर परिस्थिति में अपनी जिंदगी जी लेेने का साहस शायद उनके अन्दर भरी धर्म, अध्यात्म और जीवन जीने की समझ ने दिया है, जो किसी भी हाल में?उन्हें हारने नहीं देती।

मुख्यत: यह देश जीवन जी लेने की प्रेरणा रखने वाले लोगों का देश है। अपने औसत से बदतर जीवन का बोझ ढोते हुए भी उनमें?से अधिकांश उस नैराश्य और भटकन की दिशाहीनता में डूबते दिखायी नहीं देते, जैसा कि आज विश्व का अधिकांश पश्चिमी समाज हमें दिखायी देता है।

इसका प्रमाण हमें इस वर्ष के अंत में आयी एक शोध कंपनी ‘इपसॉस’ की ताजा शोध रिपोर्ट में मिलता है। इस रिपोर्ट का कहना है कि बेशक आज भारत के 46 प्रतिशत लोग बेरोजगारी की समस्या को लेकर चिंतित हैं, लेकिन जब नवंबर मास में?हर क्षेत्र में मंदी ने अपना भयावह रूप दिखाया तो इस महीने केवल तीन प्रतिशत शहरी भारतीयों की चिन्ता बढ़ी कि बेकारी और गरीबी की इस बिगड़ती स्थिति में?अपने देश का क्या होगा? मत भूलिये कि अपने देश के लोग भाग्यवादी और कर्मकांड में विश्वास करने वाले भी हैं और उनका यह जन्मजात विश्वास ही उन्हें टूटन के इस वातावरण में बिखरने नहीं देता।

यह सही है कि आज गरीबी और सामाजिक असमानता सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है। इस चिन्ता में अपराध, हिंसा, वित्तीय और राजनीतिक भ्रष्टाचार, सेहत और लीक से उतरी हुई शिक्षा व्यवस्था भी आती है। भारतीयों को भी आज सबसे ज्यादा परेशान करने वाले विषयोंं में वित्तीय व राजनैतिक भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा, गरीबी और सामाजिक असमानता और पर्यावरण प्रदूषण शामिल है, जिसने पूरा वर्ष भारत को मौसमों का अतिरेक दिखाया है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2018-19 में भारत में बेरोजगारी की दर 3.5 प्रतिशत मानी थी, जो बीते वर्ष भी कम नहीं हुई।

लेकिन विश्व के अन्य देशों का राजनैतिक नेतृत्व जब इन समस्याओं से जूझने में असफल रहता है, तो जहां अमरीका में?ट्रम्प महाभियोग का सामना करते हैं और पाकिस्तान में पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को मौत की सजा सुना दी जाती है। यहां हम अपने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अन्य तक विश्वास के साथ शासन के लिए दूसरी पारी का मौका देते हैं। पंजाब में सरदार प्रकाश सिंह बादल को शासन के लिए दस बरस मिले और वह छह बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। हिमाचल में वीरभद्र सिंह को भी मुख्यमंत्री बनने के इतने ही अवसर मिले और अब हरियाणा में भी खट्टर सरकार को दूसरी पारी मिल गयी है।

विश्व हो या भारत, मुख्य आर्थिक और सामाजिक समस्याएं उसी प्रकार मुंह बाये हैं। लेकिन जहां विश्व की इकसठ प्रतिशत आबादी मानती है कि उनके देश की सरकार या नेतृत्व ने गलत राह पकड़ ली है, वहां इस हालत में भी 69 फीसदी शहरी भारतीय मानते हैं कि देश सही रास्ते पर चल रहा है। यह भविष्य के प्रति देश की जागरूक आबादी का प्रभावशाली बहुसंख्यक भाग ही है, जो उन्हें अपनी बदहाली में भी आशा का दामन नहीं छोडऩे देता। शिक्षित होती हुई युवा पीढ़ी में भी इस जागरूकता के चिन्ह दिखायी देने लगे हैं, इसीलिए पिछले दिनों नागरिकता संशोधन बिल और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर केवल एक धर्म के विश्वविद्यालयों के छात्रों को ही नहीं अन्य बहुत से विश्वविद्यालयों के छात्रों को भी सामूहिक रूप से सडक़ों पर आकर जुझारू तेवर अपनाते देखा गया। यहां हम देश के युवाओं में पैदा हुई राष्ट्रीय चेतना और अपने संविधान के मूल सिद्धांत धर्म निरपेक्षता से प्रतिबद्धता की बात कह रहे हैं। युवाओं के हर वर्ग ने अपना-अपना पक्ष सामने रखा, क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि हमारी भावी पीढ़ी को देश के लोकतंत्र, संविधान और मुखर अभिव्यक्ित की ताकत में कितना विश्वास है?

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