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जांच की आंतरिक व्यवस्था की जरूरत


अनूप भटनागर

कहीं ऐसा तो नहीं है कि अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के नाम पर उच्चतर न्यायपालिका के सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का अब फैशन बनता जा रहा है। यह सवाल उठने की एक वजह है कि इस तरह के अभियान को अब स्वतंत्र और निर्भीक न्यायपालिका की रक्षा करने के बजाय उसे डराने-धमकाने की कवायद के रूप में भी देखा जाने लगा है। न्यायालय ने अपने कई फैसलों में इस प्रवृत्ति का जिक्र किया है।

इस संबंध में पूर्व प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के मामले का जिक्र करना अनुचित नहीं होगा क्योंकि उनकी कार्यशैली को लेकर शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने प्रेस कानफ्रेंस की थी। कुछ राजनीतिक दलों के सांसदों ने उन्हें पद से हटाने के लिये बाकायदा राज्यसभा के सभापति को याचिका भी दी थी। पर इन राजनीतिक दलों को इसमें सफलता नहीं मिली।

देखा जा रहा है कि कदाचार और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिये निर्धारित विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन करने की बजाय न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए किसी न्यायाधीश का नाम लिये बगैर सोशल मीडिया पर अनर्गल आरोप लगाये जा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर न्यायपालिका और इसके सदस्यों के बारे में प्रयुक्त भाषा भी काफी अपमानजनक होती है। ऐसे ही एक मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने वाईएसआर कांग्रेस के एक सांसद और कई नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की है। माइक्रो ब्लागिंग के माध्यम से ट्विटर पर अपलोड पोस्ट को लेकर अधिवक्ता प्रशांत भूषण दूसरी बार विवादों में आये हैं। इसी तरह, उच्चतम न्यायालय में नवंबर, 2009 से अधिवक्ता प्रशांत भूषण के खिलाफ लंबित अदालत की अवमानना का मामला ही लें। यह प्रकरण एक पत्रिका को दिये गये प्रशांत भूषण के इंटरव्यू से संबंधित है, जिसमें उन्होंने उच्चतम न्यायालय के कुछ पीठासीन और पूर्व प्रधान न्यायाधीशों पर गंभीर आरोप लगाये थे।

शीर्ष अदालत में यह मामला विचाराधीन है और अब न्यायालय ने इस मामले में विचार के लिये अब तीन सवाल तैयार किये हैं। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए बयान दिये जा सकते हैं और ऐसे मामले में क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। उच्चतर न्यायपालिका के सदस्यों पर आरोपों के बारे में पुख्ता दस्तावेजों के साथ प्रधान न्यायाधीश को शिकायत मिलती है तो उनकी जांच करायी जाती है।

इसी व्यवस्था के माध्यम से ही देश में पहली बार मई 1993 में नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश वी. रामास्वामी को पद से हटाने की कार्यवाही संसद में हुई थी लेकिन मतदान के समय कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इसमें हिस्सा नहीं लेकर इस प्रस्ताव को गिरा दिया था। रामास्वामी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे।

इसके विपरीत, कदाचार के एक मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को पद से हटाने के लिये अगस्त, 2011 में राज्यसभा में एक प्रस्ताव पारित हुआ था। लोकसभा में इस प्रस्ताव पर बहस से पहले ही न्यायाधीश ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। सिक्किम उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरण पर भी गंभीर आरोप थे। उन्होंने जुलाई, 2011 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे ही कई मामले हुये, जिनमें उच्च न्यायालय न्यायाधीशों ने अपने पद से इस्तीफे दिये। इनमें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शमित मुखर्जी भी शामिल थे। इसके अलावा, भ्रष्टाचार के आरोप में ही प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एसएन शुक्ला के खिलाफ मामला दर्ज करने की सीबीआई को अनुमति भी दी थी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार विधि मंत्रालय को 2018 से 2020 के दौरान शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों के खिलाफ 122 और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के खिलाफ 412 शिकायतें मिलीं थीं। शिकायतों को संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया जाता है।

बहरहाल, उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीश को पद से हटाने के बारे में हमारे संविधान और न्यायाधीश जांच आयोग में विस्तृत प्रावधान हैं लेकिन अभी तक उच्चतर न्यायपालिका के किसी भी न्यायाधीश को इस प्रकिया के माध्यम से पद से हटाया नहीं जा सका।

पूर्व प्रधान न्यायाधीश वीएन खरे ने एक बार कहा था कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि न्यायपालिका भी इसी समाज का हिस्सा है और इसमें आने वाले सदस्य भी हमारे समाज से ही आते हैं। बेहतर हो कि ऐसे मामलों की जांच की आंतरिक व्यवस्था का रास्ता अपनाया जाये।


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