• dainik kshitij kiran

जर्जर चिकित्सा तंत्र में संवेदनहीन व्यवहार

अनूप भटनागर


बीमा निगम का एक नारा है : ‘जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी’ यह नारा हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त गरिमा के अधिकार के बारे में भारतीय दर्शन को उजागर करने के साथ ही नागरिकों और शासन को उसके दायित्वों के प्रति आगाह करता है। यही वजह है कि देश की सर्वोच्च अदालत की व्यवस्था है कि अनुच्छेद 21 में प्रदत्त गरिमा का मौलिक अधिकार सिर्फ जीवित व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसकी मृत देह को भी उपलब्ध है।

न्यायालय की इस व्यवस्था के बावजूद देश में अक्सर मृत देह का अनादर करने की घटनायें सामने आती रहती हैं। लेकिन कोरोना महामारी के दौरान मृत देह के प्रति अनादर, मरीजों के साथ ही वार्ड में बिस्तरों पर शव रखे होना तथा शवगृहों में मृतकों के शव की अदला-बदली की घटनायें हमारी जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं और संवेदनहीनताओं को उजागर कर रही हैं। जो मृत देह का भी सम्मान करने की हमारी प्राचीन परंपराओं को ठेंगा दिखा रही हैं। अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मी और शवगृहों में व्यवस्था देखने वाले कर्मचारी संवेदनहीनता का परिचय देने के साथ ही मृतक देह की गरिमा के अधिकार की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

सर्वोच्च अदालत ने कई व्यवस्थाओं में स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त गरिमा का मौलिक अधिकार सिर्फ जीवित व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसकी मृत देह को भी उपलब्ध है। मृत देह को भी गरिमा के साथ अंतिम संस्कार का अधिकार है। संक्रमण से अस्पतालों में जान गंवाने वाले मरीजों के परिजनों को जहां अपने प्रियजन का चेहरा अंतिम बार देखने की इजाजत नहीं दी जा रही, जिसकी वजह से गलत शवों का अंतिम संस्कार किये जाने की घटनायें सामने आ रही हैं। दूसरी ओर, उनके अंतिम संस्कार में अनेक बाधायें पैदा की जा रही हैं। यही नहीं, अस्पतालों के शवगृहों की बदहाली, वहां बेतरतीब रखे शवों की स्थिति मृत देह के प्रति सरकार के उदासीन और गैर-जिम्मेदार रवैये को दर्शा रही है।

हाल ही में दिल्ली से लेकर मुंबई तक के सरकारी अस्पतालों में कोरोना से संक्रमित मरीजों के वार्ड में ही बिस्तरों पर शव रखे होने की घटनायें सामने आयी हैं जबकि पश्चिम बंगाल में लाश को घसीटे जाने का वीडियो क्लिप सुर्खियों में रहा है।

ये घटनायें बता रही हैं कि सरकारी अस्पतालों में कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए चल रहे संघर्ष में अग्रिम पंक्ति के चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मी और सहायक कर्मचारी, कितने संवेदनहीन होते जा रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने जनवरी, 1995 में एक फैसले में इस बात से सहमति व्यक्त की थी कि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त गरिमा और सम्मान का अधिकार सिर्फ जीवित व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसकी मृतकाया को भी उपलब्ध है। इसी तरह, शीर्ष अदालत ने 2002 में भी अनुच्छेद 21 में प्रदत्त गरिमा के अधिकार के बारे में एक अन्य फैसले में कहा था कि बेघर मृतकों को भी उनकी धार्मिक आस्था के अनुसार सम्मानपूर्वक तरीके से अंतिम संस्कार का अधिकार है और यह सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है। इन व्यवस्थाओं के बावजूद कोरोना संक्रमण की वजह से जान गंवाने वाले व्यक्तियों के शवों के प्रति अनादर की घटनायें हो रही हैं। स्थिति यह है कि दिल्ली, मद्रास और बंबई उच्च न्यायालय इस तरह की घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने के लिए बाध्य हो गये।

उच्च न्यायालयों ने अस्पतालों में शवों के साथ हो रहे अनादर की घटनाओं को हृदयविदारक करार देते हुये राज्य सरकारों और संबंधित अस्पतालों को उनके रवैये के लिए आड़े हाथ भी लिया। लेकिन ऐसा लगता है कि न्यायिक आदेशों के बावजूद स्थिति में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। अभी भी इलाज के लिए परिजनों को सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराने वाले कई परिवार उनके कुशलक्षेम की जानकारी के लिए दर-दर भटक रहे हैं। आखिर में उन्हें अपने प्रियजन के इस दुनिया में नहीं रहने की सूचना मिलती है। कोरोना संक्रमण से शव ग्रस्त होने की वजह से उसे अच्छी तरह से पैक करके परिवारों को सौंपा जा रहा है, जहां बाद में पता चलता है कि अस्पताल ने गलत शव दे दिया, जिसका अंतिम संस्कार भी कर दिया जाता है।

इसमें संदेह नहीं है कि कोरोना महामारी ने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की चरमरा चुकी व्यवस्था को उजागर कर दिया है, इसके बावजूद उम्मीद की जाती है कि अस्पतालों में इलाज के दौरान जान गंवाने वाले मरीजों की मृत देह के प्रति सरकार और अस्पतालों के स्वास्थ्यकर्मी संवेदनशीलता दिखायेंगे।

0 views0 comments

Recent Posts

See All

सोने की लंका लुटी पांच सितारा उपचार में

आलोक पुराणिक कबीरदास सिर्फ संत ही नहीं थे, अर्थशास्त्री थे। उनका दोहा है—सब पैसे के भाई, दिल का साथी नहीं कोई, खाने पैसे को पैसा हो रे, तो जोरू बंदगी करे, एक दिन खाना नहीं मिले, फिरकर जवाब करे। सब पैस

पश्चिम बंगाल में चुनावी कटुता भुलाने का समय

कृष्णमोहन झा/ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र की मोदी सरकार के बीच टकराव का जो सिलसिला ममता बनर्जी के दूसरे कार्यकाल में प्रारंभ हुआ था वह उनके तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही पहले स

उत्पादकता बढ़ाने में सहायक हो ऋ ण

भरत झुनझुनवाला वर्तमान कोरोना के संकट को पार करने के लिए भारत सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेने की नीति अपनाई है। ऋण के उपयोग दो प्रकार से होते हैं। यदि ऋण लेकर निवेश किया जाए तो उस निवेश से अतिरिक्त आ