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जनमत की अवहेलना का जनतंत्र

विश्वनाथ सचदेव

चुनाव जनतंत्र की सफलता की कसौटी भी है और मतदाता के विवेक की परीक्षा भी। पिछले सात दशक में जिस तरह हमारे देश में समय पर और कुल मिलाकर शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव होते रहे हैं, सरकारें बनती-बदलती रही हैं, उस पर हम संतोष भी कर सकते हैं। पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना ज़रूरी है कि जनतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव ही नहीं होता, जनतंत्र चुनावों से बढ़कर कुछ और भी है। यही 'कुछ और हमारे जनतंत्र को महत्वपूर्ण और सार्थक बनाता है। इस 'कुछ और का मतलब मतदाता की जागरूकता और राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा मतदाता को उचित एवं समुचित सम्मान देना है। लेकिन जिस तरह का राजनीतिक माहौल आज देश में बना है, कहना चाहिए, बनाया जा रहा है, उसमें दिखाई यह दे रहा है कि या तो हमारे राजनीतिक दल हमारे मतदाता को विवेकहीन मानते हैं, या फिर इतना भोला कि उसे बरगलाया जा सकता है।

पिछले आम चुनाव में मतदाता ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए को शानदार अभूतपूर्व समर्थन दिया था। पहले की एनडीए सरकार की उपलब्धियों का भी इसमें निश्चित योगदान रहा होगा और यह भी स्वीकारना होगा कि मतदाता को चुनावी वादे पूरे करने का भरोसा दिलाने में भी भाजपा सफल रही होगी। लेकिन इस शानदार विजय के बाद जिस तरह के संयत और गरिमापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा मतदाता को थी, उसका अभाव उसे जल्दी ही दिखने लगा। आम चुनावों के बाद हुए राज्यों के चुनावों में सरकारी पक्ष और विपक्ष, दोनों, ने मतदाता के प्रति वह सम्मान दिखाना ज़रूरी नहीं समझा, जिसका मतदाता अधिकारी होता है। इस दौरान एक के बाद दूसरे राज्य में चुनाव होते रहे और हमारी सारी राजनीति चुनावी मूड या मोड में ही रही। वादों की बरसात और दावों की दुहाई में हमारी सारी राजनीति जैसे डूबी रही। राजनीतिक दल यह मानते रहे कि मतदाता को बहलाना मुश्किल नहीं है।

पहले हरियाणा में चुनाव हुए। फिर महाराष्ट्र में हुए। अब झारखंड में और इसके बाद फरवरी के प्रारंभ में ही दिल्ली में चुनाव होंगे। इसी बीच कर्नाटक में हुआ पंद्रह सीटों वाला उपचुनाव भी हमने देखा। क्या हुआ इन चुनावों में क्या मतदाता ने स्वयं को अधिक ताकतवर होता हुआ अनुभव किया क्या सत्ता के मोह से हमारे राजनीतिक दल अपने आप को कुछ बचा पाये क्या मतदाता की भावनाओं का सम्मान हुआ यदि नहीं, तो हम यह कैसे मान लें कि हमारा जनतंत्र मज़बूत हो रहा है

हरियाणा के चुनावों से शुरू करें। वहां मतदाता ने भाजपा की खट्टर सरकार को निर्णायक बहुमत नहीं मिला। दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी ने चुनाव भाजपा का विरोध करते हुए लड़ा था, पर रातोंरात वह भाजपा की समर्थक पार्टी बन गयी। चुनाव में मतदाता ने भाजपा को समर्थन नहीं दिया था। चौटाला की पार्टी को इसीलिए वोट मिले थे कि वह खट्टर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का विकल्प देने की बात कर रही थी। लेकिन मतदाता को अंगूठा दिखाते हुए खट्टर को समर्थन देकर दुष्यंत के दल ने मिली-जुली सरकार बना ली। दुष्यंत के पिता अजय चौटाला को रातोंरात जेल से रिहाई भी मिल गयी। दुष्यंत और खट्टर ने सौदेबाजी पर किसी प्रकार का पर्दा डालने की ज़रूरत भी नहीं समझी। मतदाता क्या सोचेगा, यह बात तो हमारे राजनीतिक दलों के लिए कुछ माने ही नहीं रखती।

महाराष्ट्र में भी मतदाता के अपमान और अवहेलना की यही कहानी दोहरायी गयी। यहां भाजपा और शिवसेना के गठबंधन को मतदाता ने स्पष्ट बहुमत दिया था। इसी गठबंधन की सरकार बननी चाहिए थी। पर हुआ क्या पहले भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार फडऩवीस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता अजित पवार का दामन थामा और फिर नाटकीय परिवर्तन में शिवसेना ने शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी और कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बना ली। अर्थात् किसी भी राजनीतिक दल को मतदाता की राय से जैसे कोई मतलब ही नहीं है। कठोर हैं यह शब्द पर कहना पड़ता है कि हमारे राजनीतिक दल या तो मतदाता को अपनी जेब में समझते हैं या यह मानते हैं कि मतदाता जाए भाड़ में! मतदाताओं के प्रति राजनेताओं और राजनीतिक दलों का यह रुख कुल मिलाकर जनतांत्रिक मूल्यों और भावनाओं का अपमान ही है। मज़े की बात यह है कि कुर्सी के इस किस्से में सारे राजनीतिक दल दुहाई मतदाता के हितों की ही देते हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह कहा यही गया कि राज्य की जनता पर फिर से चुनाव का बोझ न पड़े इसलिए यह राजनीतिक समझौते किये गये हैं। इससे पहले कश्मीर में भी भाजपा और महबूबा मुफ्ती की पार्टी ने यही कहकर बेमेल गठबंधन किया था। परिणाम हमारे सामने है। अब भाजपा शिवसेना पर आरोप लगा रही है, उसने बेमेल गठबंधन किया है। क्या मतदाता को यह पूछने का अधिकार नहीं है कि उसे मु_ी में क्यों समझा जाता है

कर्नाटक के उपचुनावों की बात भी कर ली जाये। वहां पंद्रह दलबदलुओं को भाजपा ने इस आश्वासन के साथ अपना उम्मीदवार बनाया कि वे जीत गये तो उन्हें मंत्री बनाया जायेगा। इनमें से बारह दलबदलू भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत गये हैं। ये सब दलबदलू कांग्रेस और जेडीएस से भाजपा के पाले में आये हैं। प्रधानमंत्री ने इस चुनाव-परिणाम को कर्नाटक के मतदाता द्वारा कांग्रेस को सबक सिखाना बताया है और यह भी कहा है कि जो भी जनादेश के खिलाफ जायेगा जनता उसे सज़ा देगी। पूछा जाना चाहिए कि हरियाणा में जनादेश के खिलाफ जाते समय भाजपा को 'सज़ा का डर क्यों नहीं लगा

उत्तर यही है कि हमारे राजनीतिक दल मतदाता को बरगलाने लायक मानते हैं। मानते हैं कि मतदाता को प्रलोभन देकर खरीदा जा सकता है। यह धारणा जनतंत्र का अपमान है। और यह स्थिति जनतंत्र की असफलता का संकेत है। भावनात्मक मुद्दे उछालकर सच्चाई को परदे में रखने की राजनीति सत्ता तक पहुंचने में मददगार हो सकती है, पर जनतांत्रिक मूल्यों का तकाज़ा है कि मतदाता को खिलौना न समझा जाये, उसके निर्णय का सम्मान किया जाये। यहीं, मतदाता को भी अपने विवेक पर भरोसा करने की आवश्यकता है। क्यों वह सत्ता की भूख को नहीं पहचानता क्यों वह अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से पूछता नहीं कि उसकी अवहेलना का अधिकार उन्हें किसने दिया है यह सबको याद रखना होगा कि स्वतंत्र और सशक्त मतदाता ही जनतंत्र की ताकत होता है, जनतंत्र की सफलता की कसौटी भी।

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