चीन ठहर अब तेरी खैर नहीं

अंशुमाली रस्तोगी


बहुत सोच-विचार के उपरांत मैंने डिसाइड किया है कि मैं अपने चाइनीज फोन से चीन का विरोध एवं बहिष्कार करूंगा। उसे उसकी ‘औकात’ दिखाकर ही रहूंगा। आखिर वह खुद को ‘समझता’ क्या है?

वह यह अच्छी तरह समझ ले, उसे मैं ‘घर में घुसकर’ मारूंगा। जैसे हिंदी फिल्म का हीरो विलेन को मारा करता है। मारूंगा भी और पानी तक न पीने दूंगा। अव्वल तो मेरा हाथ किसी पर उठता नहीं, लेकिन जब उठता है तो सामने वाले को बैठाकर ही दम लेता है।

लेखक हूं तो क्या, अपने इलाके का ‘भाई’ भी हूं। लेखन और भाइगीरी दोनों साथ-साथ चलती है। चीन सुन ले तू, तुझ पर व्यंग्य ही नहीं कविता भी लिख सकता हूं। कविता के बहाने अपना विरोध दर्ज करवा सकता हूं। कविता भी चाइनीज फोन से ही लिखूंगा। ऐसी कविता लिखूंगा कि दुनिया ‘कांप’ जाएगी। विश्वभर के कवि मेरी कविता का ‘लोहा’ मानेंगे। और हां, तुझ पर लिखी कविता तेरे ही अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में छपवाऊंगा।

दबी-ढकी नहीं खुली चुनौती देने में विश्वास रखता हूं मैं। आज और अभी से घर में रखे हर चीनी सामान को निकालकर फूफा के यहां रखवा आऊंगा। चाउमीन के पैकेट ठेले वालों को दे दूंगा। अभी हाल ही में खरीदा चीनी टीवी पूर्व प्रेमिका को ‘उपहार’ में दे दूंगा।

बहुत हुआ अब तुझे ‘झेल’ पाना किसी भी भारतवासी के लिए संभव नहीं। सोशल मीडिया पर कल से ‘बॉयकॉट चाइनीज प्रोडक्ट’ ट्रेंड कर रहा है। अभी इसे हमें और बढ़ाना है। जानता हूं कि यह कठिन निर्णय है। भारत की आधे से अधिक आबादी के हाथों और जेबों में चाइनीज फोन ही पाए जाते हैं। तो क्या, देश सर्वोपरि।

तू सुन, इन सोशल मीडिया पर ‘बायकॉट चीन’ कहने-लिखने वालों को ‘ठलुआ’ मत समझना। ये ‘असली वीर’ हैं। ट्विटर या फेसबुक पर बैठकर ‘कागजी धमकियां’ नहीं देते, जरूरत पड़ती है तो सीधा घर में घुसकर मारते हैं। पाकिस्तान को तो दिन में जाने कितनी दफा धूल चटवा देते हैंैं।

सुन ले चीन अगर हम अपनी पर आ गए न तो तेरी अर्थव्यवस्था को कहीं का न छोड़ेंगे। जब हमारे सामने अमेरिकी अर्थव्यवस्था कोई मायने नहीं रखती तो तू क्या है। विश्वभर की अर्थव्यवस्था को तेरे वायरस ने चौपट कर डाला। हमारा सेंसेक्स अच्छा-खासा चल रहा था। उसे गर्त में ला दिया। जाने कितने बेरोजगार हो गए। कितनों के पास पैसों की तंगी हो गई। वाकई ऐ चीन, तू है बड़ा ही औघड़ मुल्क। हाथी के दांत अब दिखेंगे भी और खाएंगे भी। समझ रहा है न तू।

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