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चीन: टकराव टलना बड़ी बात


पिछले महीने की 15 तारीख को हुई हिंसक झड़प के बाद से ही भारत-चीन सीमा पर कायम तनाव में कमी आने के ठोस संकेत पहली बार मिले हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को फोन पर हुई बातचीत के दौरान दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति बनी कि सीमा पर सैनिकों को अलग करने और तनातनी कम करने की प्रक्रिया जल्दी पूरी करना दोनों देशों के हित में है।

इसके बाद यह खबर आई कि दोनों देशों के सैनिक अपने-अपने स्थान से कुछ पीछे हटने शुरू हुए हैं। हालांकि इस प्रक्रिया के ब्यौरे अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किए गए हैं। सूत्रों के हवाले से मीडिया में आई खबरों में एकसूत्रता का अभाव है। कहा जा रहा है कि दोनों पक्षों में सीमा पर 3 किलोमीटर का बफर जोन बनाने पर सहमति हुई है। यानी दोनों देशों की सेनाएं डेढ़-डेढ़ किलोमीटर पीछे हटेंगी और बीच के तीन किलोमीटर खाली इलाके में कोई हरकत करने से पहले उन्हें दूसरे पक्ष को इसकी जानकारी देनी होगी।

खबरों में यह स्पष्ट नहीं है कि डेढ़ किलोमीटर पीछे हटना वे कहां से शुरू करेंगी- दोनों सेनाओं की मौजूदा स्थिति से, या ताजा विवाद शुरू होने के पहले अप्रैल में दोनों सेनाओं की जो स्थिति थी, वहां से? यह भी समझना बाकी है कि यह विश्वास बहाली के मकसद से उठाया जा रहा एक तात्कालिक कदम भर है, या इसे देर तक कायम रखने का इरादा है। एक महत्वपूर्ण सवाल भारतीय सीमा के अंदर चल रहे निर्माण कार्यों का भी है। बफर जोन बनाने के लिए भारतीय सेना अपनी मौजूदा स्थिति से डेढ़ किलोमीटर पीछे हटती है, तो क्या उसकी जद में ये प्रॉजेक्ट भी आएंगे? जाहिर है इस इलाके में सडक़ों और पुलों का निर्माण भारत के दूरगामी राष्ट्रीय हितों से जुड़ा है और इनका किसी वजह से अटकना देश के लिए रणनीतिक नुकसान साबित होगा।

बहरहाल, भारत-चीन सीमा पर शांति की जरूरत से किसी भी स्थिति में इनकार नहीं किया जा सकता। यह अच्छी बात है कि दोनों पक्षों ने इस बात को स्वीकार करते हुए शांति की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू किए हैं। सीमा पर न्यूनतम समझ कायम करने के बाद बातचीत के जरिए आपसी विवाद सुलझाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। हिंसक झड़प की घटना के बाद तनावपूर्ण माहौल के बीच भी भारत ने अलग-अलग तरीकों से यह बात स्पष्ट कर दी है कि अपनी एक-एक इंच जमीन को लेकर वह पूरी तरह सजग है। इसलिए चीन को या किसी को भी इस मामले में कोई गफलत नहीं पालनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि चाहे कुछ भी हो जाए, पर भारत और चीन हमेशा एक-दूसरे के पड़ोसी ही रहेंगे। लड़ाई दोनों को विकास की दौड़ में बहुत पीछे धकेल देगी, जबकि आपसी दोस्ती के जरिये वे अब भी इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी बना सकते हैं।

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