चीन की गांठ हॉन्ग कॉन्ग

हॉन्ग कॉन्ग में छह महीने से जारी अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शनों के बीच वहां हुए स्थानीय चुनावों के नतीजे इन प्रदर्शनों के संदेश को और आगे ले जाने वाले साबित हुए हैं। रविवार को हुई 70 फीसदी से ज्यादा वोटिंग यह बताने के लिए काफी थी कि लोग इसे स्थानीय निकायों के एक सामान्य चुनाव के रूप में नहीं देख रहे थे। उन्होंने हालिया विरोध प्रदर्शनों और उनसे निपटने के शासन के तरीके को गंभीरता से लेते हुए इस पर अपनी सख्त टिप्पणी अपने वोटों के जरिए दी। नतीजा यह रहा कि कुल 18 में से 17 जिला परिषदों पर ऐसे उम्मीदवारों का कब्जा हो गया जो लोकतंत्र समर्थक माने जाते हैं और प्रदर्शनकारियों के पक्ष में हैं।

ये जिला परिषदें आम तौर पर बसों के रूट तय करने जैसे लोकल मसले ही देखती हैं, लेकिन पार्षदों की एक जिम्मेदारी ऐसी है जो इन चुनावों की प्रकृति को नितांत स्थानीय नहीं रहने देती। यही निर्वाचित पार्षद अपने बीच से 117 सदस्य चुनकर 1200 सदस्यों की उस समिति में भेजते हैं जिसका काम हॉन्ग कॉन्ग के चीफ एग्जीक्युटिव का चुनाव करना है। बाद में चीन सरकार इस पद पर उसकी नियुक्ति पर मोहर लगाती है। चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि इस बार इस रास्ते से उस समिति में पहुंचने वाले सभी 117 सदस्य लोकतंत्र समर्थक ही होंगे।

बहरहाल, इस तकनीकी पहलू को छोड़ दें तो भी इन चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया है कि हॉन्ग कॉन्ग और चीन की सरकारों द्वारा कही जा रही यह बात गलत थी कि आम जनता में प्रदर्शनकारियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। विरोध प्रदर्शनों को भले ही अमेरिका, ब्रिटेन और दुनिया भर के उदार लोकतांत्रिक मिजाज के लोगों का समर्थन प्राप्त रहा हो, लेकिन चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि यह मूलत: हॉन्ग कॉन्ग की जमीन से उपजा वहां के लोगों का आंदोलन है, जो शासन की जिद के चलते बढ़ता चला गया। हालांकि आंदोलन का मुद्दा बने प्रत्यर्पण बिल के पीछे कैरी लैम की सरकार जो वजह बता रही है, उसे खारिज करना मुश्किल है। 2018 में हॉन्ग कॉन्ग की एक लड़की पुन ह्यू विंग की उसके बॉयफ्रेंड ने ताइवान यात्रा के दौरान हत्या कर दी और हॉन्ग कॉन्ग लौट आया।

मौजूदा कानूनों के मुताबिक चीन, ताइवान और मकाऊ में किए गए अपराधों के लिए किसी भी हॉन्ग कॉन्ग वासी को न तो हॉन्ग कॉन्ग में सजा दी जा सकती है, न ही उसे प्रत्यर्पित किया जा सकता है। इस स्थिति में बदलाव के लिए कैरी लैम ने वह बिल पास करवाने की कोशिश की जिस पर बवाल शुरू हो गया। बहरहाल, इस पूरे प्रकरण का एक निष्कर्ष यह है कि 'विदेशी शक्तियों का हौआ अब आंदोलनों से निपटने का बहुत अच्छा हथियार नहीं रह गया है, और दूसरा यह कि चीन और उसकी छत्रछाया में चलने वाली हॉन्ग कॉन्ग सरकार सख्ती दिखाकर इस आंदोलन से नहीं निपट पाएगी। उम्मीद करें कि दुनिया का नंबर 2 मुल्क चीन अपने ही एक अंग हॉन्ग कॉन्ग को लेकर हठधर्मिता से बचेगा।

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