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चंदूलाल चंद्राकर की 100 वीं जयंती पर विशेष

गांधी परिवार के चहेते थे दाऊजी


विमल शंकर झा

प्रसिद्ध कांग्रेस नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और अपने जमाने के मशहूर पत्रकार चंदूलाल चंद्राकर यदि आज जीवित होते तो सौ वर्ष के होते। अपने ठेठ देशज व्यक्तित्व, विश्व दृष्टि और अपनी मिट्टी के प्रति गहरा जुड़ाव रखने के कारण वे न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देश के उन विरले नेताओं में शुमार थे, जिनकी सादगी और विद्वता की पूरी दुनिया कायल थी। उन्हें गांधीवादी नेता और इस परिवार के करीबी होने के साथ छत्तीसगढ़ राज्य के प्रणेता और अमरीकी राष्ट्रपति की जीत के भविष्यवक्ता के रुप लोग याद करते हैं। बापू के प्रिय रहे आधी सदी से अधिक समय तक कई राजनेताओं के साथ सियासत के पायदान दर पायदान शिखर तक पहुंचने वाले इस अनूठे बहुआयामी राजनेता का सफर जितना संघर्षपूर्ण है उतना ही प्रेरक भी है।

अपने आकर्षक व्यक्तित्व और प्रेरणास्पद कृतित्व से राष्ट्रीय सियासी फलक में एक अलग मकाम बनाने वाले दाऊजी के नाम से लोकप्रिय बुजुर्ग कांग्रेस नेता चंदूलाल चंद्राकर की दुर्ग से दिल्ली तक की यात्रा के कई यादगार पड़ाव की यादें परिजनों और बुद्धिजीवियों के जेहन में अब तक तरोताजा हैं। अपने दीर्घ सियासी और पत्रकारिता की स्वर्णिम यात्रा में उन्होंने एक पत्रकार, राजनीतिज्ञ, खिलाड़ी, कृषिवेत्ता और छत्तीसगढ़ की दो सियासी पीढिय़ों के राजगुरु आदि न जाने कितनी भूमिकाओं में उन्होंने लोगों के दिलो-दिमाग में अल्हदा स्थान बनाया । परिजनों ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि लिखने पढऩे और देश दुनिया को जानने की उत्कंठा और अपने साथ देश के लिए कुछ कर गुजरने की ललक के चलते विवाह का मंडप छोड़ कर दिल्ली कूच करने वाले चंदूलाल चंद्राकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रिय होने के साथ इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे कई दिग्गज राजनेताओं के खासमखास होते हुए एक दिन खुद इतने बड़े राजनेता हो जाएंगे। दुर्ग से पांच बार के सांसद, कांग्रेस महासचिव, राष्ट्रीय प्रवक्ता, केंद्रीय नागरिक उड्ययन मंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री, इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रेस कौंसिल आफ इंडिया के 2 बार चेयरमैन,बहुभाषाविद, आदि कई बड़े ओहदों पर रह कर छत्तीसगढ़ को कई नेमतें दिलाने वाले 145 देशों की यात्रा करने वाले व 15 विदेशी भाषाओं के ज्ञाता स्वर्गीय चंद्राकर 23 वर्ष तक सांसद रहने के पहले भी सालों तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर छाए रहे। उन्होंने अपनी जन्मभूमि अछोली फिर कर्मभूमि, कोलिहापुरी से लेकर समूचे छत्तीसगढ़ व दिल्ली तक अपने राजनीतिक और बौद्धिक गहन अनुभव से अपने राज्य व देश को बहुत कुछ दिया। 1 जनवरी 1920 में जन्मे समाजसेवा के लिए अविवाहित चंदूलाल चंद्राकर 75 वर्ष की आयु में 2 फरवरी 1995 में अपने गृहग्राम कोलिहापुरी दुर्ग में देहावसान तक कर्मक्षेत्र में सक्रिय रहे। परिजनों के मुताबिक 1939 में दाउजी के पिता रामदयाल चंद्राकर उन्हें विवाह के बंधन में बांधना चाहते थे लेकिन सेवा के लिए वे इसके लिए तैयार नहीं थे, मंडप से सीधे प्रेस जा पहुंचे और पत्रकारिता से जुड़े गए। स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी की भूमिका पर उनके लेख से गांधीजी इतने मुतासिर हुए कि हिंदुस्तान समाचार अखबार में अपने संपादक पुत्र देवदास गांधी को उन्हें बुलाने भेजा। प बापू ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और लेखनी की समझ की प्रशंसा करते हुए उन्हें 31 जनवरी मार्ग बिड़ला हाउस दिल्ली में अपनी नित्य की प्रार्थना सभा का कव्हरेज करने कहा। स्वतंत्रता आंदोलन व सांप्रदायिक का संदेशपरक प्रार्थन सभा को वे रोज हिंदुस्तान समचारा पत्र में रिपोर्टिंग करते जिसे उनकी शिष्या मनु पढ़ कर बापू को सुनाती थीं। अमरीका में पढ़े चंदूलाल चंद्राकर के पौत्र अमित चंद्राकर बताते हैं कि बबा चंदूलाल जी के लिए यह दुर्भाग्य कहा जाए या सौभाग्य कि जब गांधीजी की गोली मार कर 30 जनवरी 1948 को हत्या की गई, उस वक्त वे बापू निकटस्थ खड़े हो कर रिपोर्टिंग कर रहे थे। रक्तरंजित बापू हे राम कहते गिर पड़े । बापू व चंदूलाल चंद्राकर के खून से सने कपड़े आज भी बिड़ला हाउस गांधी म्यूजियम में रखे हैं। पत्रकार और संपादक के रुप में उन्होने एक समर्पित व ईमानदार पत्रकार की पहचान बनाते हुए देश के साथ कई देशों के चुनाव, युद्ध, खेल आदि कई बड़ी घटनाओं को कवर किया। एशिया, यूरोप,अफ्रीका आदि महाद्वीपों में हुए चार ओलंपिक गेम की रिपोर्टिंग की। 1945 में हिटलर के जर्मनी सहित कई देशों में जाकर विश्वयुद्ध की खोजी व साहसिक रिपोर्टिंग करते कई बार बाल बाल बचे। जब भारत को उपेक्षा से देखा जाता था और वीजा पासपोर्ट भी आसानी से नहीं मिलता था, ऐसे दौर में उन्होंने 1967 में अमरीकी राष्ट्रपति प्रत्याशी रिचर्ड निक्सन का बतौर भारतीय पहले भारतीय पत्रकार इंटरव्यू लेकर और और अपने हिंदुस्तान अखबार में उनके जीतने की भविष्यवाणी कर पुरी दुनिया को चौंका दिया था। राष्ट्रपति बने निक्सन ने उनसे कहा कि जब सारी परिस्थितियां मेरे खिलाफ हैं, तब जीतने की बात कैसे जान गए। चंदूलाल चंद्राकर ने कहा कि अमरीका के जनमानस का रुख पहले ही भांप लिया था। इसके बाद वे संपादक बने। आज भी हिंदुस्तान प्रेस में चेयरमैन शोभना भरतिया ने उनकी तस्वीर लगा रखी है।

स्वतंत्रता आंदोलन व देश दुनिया की गहरी समझ रखने वाले चंदूलाल चंद्राकर बतौर पत्रकार महात्मा गांधी के तो प्रिय बन ही चुके थे, लिहाजा उनकी सेवाभावी प्रतिभा से पीएम इंदिरा गांधी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहीं और उन्होंने बापू सहयोगी व स्वतंत्रता सेनानी घनश्याम दास बिड़ला से उन्हें 1970 में चंदूलाल चंद्राकर को उनके गृहग्राम दुर्ग के सांसद विश्वनाथ यादव तामस्कर के निधन होने पर उप चुनाव में कांग्रेस से टिकट देने की इच्छा जताई। जीत के साथ ही उनकी दूसरी पारी के स्वर्णकाल की शुरुआत हुई। उनके पौत्र अमित चंद्राकर बताते हैं कि इसके बाद कृषि व प्रकृतिप्रेमी चंदूलाल चंद्राकर का सियासी व समाजोन्मुखी कद बढ़ता गया और उन्होंने दुर्ग से 9171, 75, 80, 84, 91 का लोकसभा चुनाव जीता। 89 व 77 की जनता लहर में वे मोहन भैया व पुरुषोत्तम कौशिक से पराजित भी हुए। इस दौरान पीएमम इंदिरा, राजीव व नरसिंह राव के केबिनेट में चार मर्तबा केंद्रीय मंत्री व प्रवक्ता व महासचिव सहित अन्य अहम पदों पर रहते हुए गांधी परिवार से निकटता का लाभ छत्तीसगढ़ को दिलाया। गंगरेल बांध के निर्माण के समय जब केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला ने बड़े बजट के जल्द मंजूरी पर इंदिरा गांधी से बात करने में चंदूलाल चंद्राकर सेे सहयोग मांगा तो उन्होंने तुरंत बात छग की लाइफ लाइन बताते बजट रिलीज करने आग्रह किया और बुनियाद के लिए आमंत्रित भी किया। भिलाई में बीआरपी के लिए भी पहल करवाई । 1993 के चुनाव के घोषणा पत्र में छग राज्त गठन की घोषणा को शामिल करने के साथ बतौर संयोजक छग राज्य आंदोलन संघर्ष समिति के बैनर तले पृथक राज्य लिए पूर्व अजीत जोगी को उप संयोजक बना कर आंदोलन छेड़ा और विस में तिहाई बहुमत से इसका विधेयर पारित करवाया । इतिहासकार डां. रमेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं कि चंदूलाल चंद्राकर का छग राज्य बनाने और राज्य के उन्नयन व समर्पण के लिए अद्भुत भाव था। जनकवि सुरेंद्र मिश्रा से भेंट के दौरान वे छग के इतिहास, संस्कृति लेकर जब भी रायपुर आते विमर्श करते थे।

संजय गांधी से उनके इतने अच्छे सबंध थे कि उन्होंने 1982 में एक मारुति वेन वीआईपी नंबर डीआईयूव -1 व डीआईजेड -8 नंबर की मारुति कार उन्हें बतौर उपहार भेंट करवाई थी। मामा कह कर बुलाने वाले संजय गांधी द्वारा दी गई यह कार में मारुति वेन वीआईपी नंबर डीआईयू-1 कार उनके ग्राम कोलिहापुरी में बतौर स्मृति रखी गई है। परिजनों के मुताबिक संजय गांधी के प्रति उनका पुत्र की तरह स्नेह था। इंदिरा के साथ जगदलपुर आए संजय जब प्लेन उड़ाने चले गए तब उन्होंने इंदिरा के सामने उन्हें स्नेह से सबके सामने डांटा था। राष्ट्रपति शंकरदायल शर्मा से उनकी इतनी दोस्ती थी कि दोनों सुरक्षा गार्ड से बचते राष्ट्रपति भवन से गुपचुप खाने निकल जाते थे। वासुदेव चंद्राकर के साथ सीएम भूपेश बघेल सहित तीन चार दशकों में कई छग के मंत्रियों को उन्होंने सियासत के गुरु सिखाए। अफ्रीका के गाय को गौमांस के लिए उपयोग करने वाले अफ्रीकी देश में उन्होंने निवासियों को दूध दुह कर का महत्व भी बताया तो लोग हैरत में पड़ गए थे। किसानी और बागवानी के विशेषज्ञ छग को पानी व मेहनत मांगने वाले धान की फसल से बाहर निकालना फायदेमंद खेती व जैविक खेती की ओर मोडऩा चाहते थे। चंदूलाल चंद्राकर के बड़े बाई चु्न्नीलाल चंद्राकर को वे भगवान की तरह मानते थे। एक बार संसद हाल में उनके पहुंचने पर सबके सामने दंडवत किया तो लोग छग के संस्कार देख विभोर गए। उनके भाई चुन्नी लाल चंद्राकर के सातों पुत्र स्वर्गीय पुरुषोत्तम चंद्राकर, खिलावन, हिमकर, प्रहलाद, विनय मोहन, हेमलाल व परमेस्वर चंद्राकर को वे खेती व बागवानी के कई प्रयोग कर उपज बढ़ाने प्रोत्साहित करते थे।


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