चमड़ी तक सिमटी सोच


गोरापन बढ़ाने का दावा करने वाली एक चर्चित ब्यूटी क्रीम की निर्माता कंपनी ने उसके नाम से ‘फेयर’ शब्द हटाने का फैसला किया है। कोई कंपनी अपने किसी प्रॉडक्ट के नाम में क्या बदलाव करती है, यह आम तौर पर उसका अपना मामला होता है लेकिन इस फैसले की पृष्ठभूमि इसे एक कंपनी का अंदरूनी मामला भर नहीं रहने देती। कुछ समय पहले अमेरिका में एक अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा दिनदहाड़े हत्या की घटना के बाद जिस तरह से न केवल अमेरिका में बल्कि पूरी दुनिया में रंगभेद के खिलाफ माहौल बना है और ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ के नारे के साथ यह आंदोलन फैलता चला गया है, उसका असर भारत पर भी पडऩा लाजिमी है।

हमारे यहां इस नारे के साथ कोई बड़ा आंदोलन तो नहीं शुरू हुआ, लेकिन पहले से रंगभेद के मसले पर उठ रही आवाजों को इस माहौल ने एक नई ताकत दे दी है। वैसे, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में रंगभेद और नस्लभेद का जो रूप रहा है, वह भारत में कभी नहीं रहा। यह भी रेखांकित किया जाता रहा है कि हमारे यहां राम और कृष्ण जैसे भगवान के रूप भी सांवले ही रहे हैं। एक घर में अपने ही बच्चों के अलग-अलग रंग को लेकर खुद मां-बाप और परिवारजन भी हंसी-मजाक करते रहते हैं। इसका इसका मतलब यह नहीं होता कि वे अपने बच्चों के साथ या भाई-बहनों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार के हिमायती हैं। लेकिन इन दलीलों से इस हकीकत का कुछ नहीं बिगड़ता कि भारतीय समाज में भी गोरेपन को लेकर जबर्दस्त आग्रह है। इसकी झलक हमें त्वचा के रंग के आधार पर लोगों के लिए प्रयोग किए जाने वाले विशेषणों में ही नहीं, शादी के लिए दिए जाने वाले विज्ञापनों में भी साफ-साफ मिलती है। यह आग्रह निश्चित रूप से काली या सांवली त्वचा वालों के मन में एक तरह का हीनताबोध पैदा करता है।

इसी हीनताबोध को भुनाने की सफल कोशिश गोरापन बढ़ाने वाली क्रीमों के लगातार बढ़ते बाजार के रूप में देखी जा सकती है। इसके लिए गढ़े जाने वाले विज्ञापन भी युवाओं की इसी असुरक्षा को निशाना बनाते हैं जिससे क्रीम की बिक्री बढऩे के साथ-साथ समाज में त्वचा के रंग को लेकर मौजूद पूर्वाग्रह की जड़ें भी मजबूत होती हैं। इसीलिए देश-विदेश में रंगभेद के खिलाफ बढ़ती चेतना ने अगर कंपनी को इस प्रॉडक्ट के नाम में बदलाव करने के लिए प्रेरित किया है तो यह अच्छी बात है। इस अर्थ में नहीं कि इससे समाज में गोरे-काले का भेद रातोंरात समाप्त हो जाएगा। सिर्फ इस अर्थ में कि जिस प्रक्रिया ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को यह अहसास कराया कि समाज की उन्नत चेतना के खिलाफ खड़े दिखना उसके हित में नहीं है, वही प्रक्रिया समाज के पूर्वाग्रही हिस्सों को यह सिखा सकती है कि चमड़ी का रंग पकड़ कर बैठे रहने में अब कोई समझदारी नहीं है।

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