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चमके धूनी का धंधा, बाकी सब मंदा


आलोक पुराणिक

कोरोना ने सारे धंधे हिला दिए हैं। बस बाबागिरी का धंधा तेजी पर है। बाबाओं के प्रताप से भारतवर्ष हिल गया है। बाबाओं पर कई सवाल-बवाल उठ रहे हैं। बाबाओं से जुड़ी जानकारियों पर एक वृहद प्रश्नोत्तरी बनायी गयी है, ताकि आम जनमानस का ज्ञानवर्धन हो सके।

सवाल : सब तरफ बाबा-बाबा की धूम मची है, यह क्या है।

जवाब : बाबा की महिमा अनंत है। बाबा ही प्रारंभ है, बाबा ही अंत है। बच्चा जब पैदा होता है, छोटा होता है, उसे बाबा कहा जाता है। संजू बाबा, बंटी बाबा टाइप्स बच्चा जब बहुत ही बुजुर्ग हो जाता है, तो भी उसे बाबा कहा जाता है। बाबाजी। बच्चे और बड़े दोनों को बाबा कहने का आशय यही है कि दोनों की हरकतें एक जैसी हो जाती हैं। हालांकि, कई बाबाओं की हरकतें सिर्फ बचकानी नहीं रहतीं, वो कतई शक्ति कपूराना हो जाती हैं। हालांकि, शक्ति कपूर आमतौर पर जो सिर्फ पर्दे पर करते थे, कतिपय बाबा ऐसी हरकतों के लिए परदे की प्रतीक्षा नहीं करते।

सवाल : क्या अब भी सब कुछ छोड़-छाडक़र लोग बाबा बनते हैं।

जवाब : नहीं, सब कुछ छोडक़र बाबा बनने के दिन गये, अब तो बाबा बनकर ही सब मिल जाता है। श्रेष्ठतम जगहों पर आश्रम हेतु प्लाट, सुंदरियां, श्रेष्ठ ब्रांड पेय, सब कुछ बाबा बनकर ही मिलता है। धूनी रमाता है। फिर उससे बहुत कुछ कमाता है। धूनी से धन निकलता है । धूनी ही धन है। बाबा बनकर अब सब कुछ मिल जाता है। बाबा नाम केवलम्।

सवाल : बाबा के पास नेता क्यों जाते हैं।

जवाब : नेता हर उस जगह जाते हैं जहां पर वोट और नोट होते हैं। बाबा के पास वोट भी होते हैं और नोट भी होते हैं। बाबा अपने आश्रम में गाय पालता है और भेड़ें भी पालता है, जो इनसानी शक्ल में होती हैं। बाबा के पास वोट होते हैं। नेता इन वोटों की चाह में बाबा के पास जाता है। नेता वोट से नोट बनाता है। बाबा बाबागिरी से नोट भी बनाता है और वोट भी बनाता है।

सवाल : पब्लिक को ऐसी क्या मजबूरी है कि वह बाबाओं के पीछे जाती है।

जवाब : इस मुल्क का हाल यह है कि साफ पानी भी मिलने लगे, तो बंदा समझता है कि प्रभु किरपा हो गयी है। पुलिस हवलदार तमीज से बोलने लगे तो लगता है कि परम पिता परमात्मा की अतीव कृपा है। सरकारी अस्पताल में जाकर जिंदा वापस आ जाये और निजी अस्पताल में जाकर भी भिखारी न बने तो बंदा ऊपर वाले की जय-जय बोलता है। बाबा ऊपर वाले के डीलर होते हैं। इन डीलरों के यहां भीड़ इसलिए बढ़ती जाती है कि पब्लिक को यह भरोसा खत्म हो गया है कि कुछ भी उसके साथ अच्छा या शुभ सामान्य तौर पर भी हो सकता है। वह आशंका में जीता है। आशंकाओं की बढ़ोतरी और ऊपर वाले के डीलरों के कारोबार में बढ़ोतरी साथ-साथ हो रही है। आशंकाएं हर किस्म के बाबाओं के लिए मनरेगा ही हैं। सब के बवाल, सबसे कमाई, बाबा नाम केवलम्।



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