चमकी के अंधेरे भी तलाशिए

उमेश चतुर्वेदी



इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहा जाएगा कि वैश्विक मंचों पर पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर कदम बढ़ाते भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लग रहे हैं, वहीं घरेलू मोर्चे पर सिर्फ एक टीके की कमी के चलते मासूम मौत की गोद में सोने को मजबूर होते जा रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर और उससे सटे जिलों में जून महीने में हुई बच्चों की मौतों ने भारतीय स्वास्थ्य और पोषण व्यवस्था की पोल ही खोली है। एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम वाले दिमागी बुखार यानी चमकी ने राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 157 बच्चों की जान ली है।

जिन मासूमों की किलकारियां हाल तक उनके घरवालों को सुकून पहुंचाती थीं, वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। दुर्भाग्य यह है कि पांच खरब डॉलर के क्लब में शामिल होने की ओर बढ़ रही हमारी अर्थव्यवस्था के कारकूनों को इन हूकों की परवाह कम ही है। यदि परवाह होती तो उन्होंने चमकी बुखार की चमक को रोकने के लिए पहले से तैयारियां करी होती। इसके लिए अस्पतालों में दवाओं का इंतजाम रहता, मासूमों के पोषण पर ध्यान दिया गया होता और अस्पतालों में दूसरी सहूलियतें पहले से ही तैयार रखी जातीं।

बिहार के जिस मुजफ्फरपुर इलाके में चमकी बुखार फैला, वह इलाका करीब छह महीने तक पानी से भरा रहता है। इस इलाके में हर दो किलोमीटर पर एक न एक छोटी नदी या नाला जरूर है। बेशक इन दिनों विकासवाद की भेंट चढ़ रही अपनी व्यवस्था के चलते इन नाले-नदियों में पानी नहीं है, लेकिन छह महीने तक लगातार रहने वाला पानी इस इलाके को धान, आम, लीची, हल्दी, लाल मिर्च आदि की उपज से नवाजता है तो मच्छरों की खतरनाक सौगात भी देता है। ये मच्छर ही दिमागी बुखार के वायरस के वाहक होते हैं। जैसे ही जाड़ा खत्म होता है, इन मच्छरों की बन आती है। फिर शाम होते ही उनके झुंड के झुंड हमलावर होकर यहां की जनसंख्या को अपना निशाना बनाते हैं। चूंकि बच्चे कमजोर होते हैं, इसलिए उनमें चमकी बुखार का वायरस जल्द प्रभावी हो जाता है।

इस बुखार पर काबू पाने के लिए इलाज से ज्यादा जरूरी उससे बचाव है। जिनके पास पैसे हैं, वे तो निजी अस्पतालों में अपने बच्चों को मस्तिष्क ज्वर से बचाव वाले टीके लगवा लेते हैं लेकिन यहां की काफी जनसंख्या की कोशिश यही रहती है कि पहले पेट भरने का इंतजाम हो, फिर बाकी जरूरतों की तरफ ध्यान दिया जाए।

याद कीजिए दो साल पहले गोरखपुर में इसी तरह की मची त्रासदी को। वहां भी दिमागी बुखार ने सैकड़ों बच्चों की जान ली थी। इसे लेकर राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था की आलोचना हुई थी। लेकिन अब वहां हालात सामान्य हैं। दोबारा मस्तिष्क ज्वर की महामारी नहीं फैल पाई। इसकी वजह यह रही कि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने मासूम बच्चों के टीकाकरण का अभियान चलाया। हालात खराब होते हैं तो बड़े अस्पताल में भेजा जाता है।

जांच में पाया गया है कि मुजफ्फरपुर और आसपास जिन बच्चों की एईएस से मौतें हुई हैं, उनमें से ज्यादातर बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर तबके के हैं। उनमें से भी ज्यादातर बच्चियां हैं। इसकी खास वजह यह है कि इस इलाके में अब भी बेटा और बेटी में फर्क किया जाता है। इसलिए बेटियों के पोषण पर बेटों की तुलना में कम ही ध्यान दिया जाता है। दूसरे बच्चों की तुलना में उनकी कमजोरी बढऩे लगती है। कमजोर बच्चों पर इस बुखार का दुष्प्रभाव बढ़ता है। इससे वे अचेत हो जाते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इससे दिमाग में ज्वर, सिरदर्द, ऐंठन, उल्टी और बेहोशी जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। रोगी का शरीर कमजोर हो जाता है। वह प्रकाश से डरने लगता है। कुछ रोगियों की गर्दन में जकडऩ आ जाती है। डॉक्टरों के मुताबिक यहां तक कि रोगी लकवा के भी शिकार हो जाते हैं। ये सभी लक्षण मस्तिष्क की सुरक्षा प्रणाली के क्रियाशील (एक्टिव) होने के कारण प्रकट होते हैं क्योंकि सुरक्षा प्रणाली संक्रमण से मुक्ति पाने के लिये क्रियाशील हो जाती है। इसलिए बेहतर है कि बचाव के लिए पहले से ही टीकाकरण का काम हो।

उत्तर प्रदेश में टीकाकरण पर जोर दिया गया तो अब ऐसी घटनाएं सामने नहीं आ रहीं। उसी तरह बिहार को भी कदम उठाना पड़ेगा। पांच खरब की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाकर दस या पंद्रह खरब की अर्थव्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी इन्हीं मासूमों के कंधे पर होगी। जिस दिन यह सोच विकसित होगी तभी प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर मासूमों को मौत के मुंह में धकेलने वाली व्यवस्था से निजात पाने की ठोस कोशिश होगी। सवाल यह है कि सिर्फ अपना स्वार्थ देखने वाली हमारी प्रशासनिक व्यवस्था इस तरीके से सोच पाएगी?

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