घातक है संकट पर शुतुरमुर्गी रवैया


विश्वनाथ सचदेव

देश में शायद पहली बार एक तिमाही में विकास दर में चौबीस प्रतिशत की कमी आयी है। पिछले पांच-छह महीने में लगभग दो करोड़ नौकरियां छिन गई हैं। देश में काम कर रही एक बड़ी आई.टी. कंपनी ने घोषणा की है कि आने वाले कुछ महीनों में उसे लगभग दस हज़ार कर्मचारियों को हटाना पड़ सकता है। राज्यों के पास अपने स्टाफ को वेतन देने के लिए पर्याप्त राशि नहीं है। राज्य केंद्र से अपने हिस्से की जीएसटी की मांग कर रहे हैं और केंद्र सरकार राज्यों से कह रही है कि रिजर्व बैंक से ऋण लेकर अपनी आवश्यकता की पूर्ति करें। बेरोजगारी का आलम यह है कि रेलवे में लगभग डेढ़ लाख रिक्त स्थानों के लिए एक करोड़ से अधिक युवाओं ने आवेदन किया है। और साल-भर लग गया है रेलवे को इन आवेदन पत्रों की छंटाई करने में! जहां तक औद्योगिक उत्पादन का सवाल है, मार्च के महीने में इसमें 17 प्रतिशत की कमी आई थी। पिछले पंद्रह सालों में इतनी कमी कभी नहीं हुई।

यूं तो सारी दुनिया कोरोना से जूझ रही है, हमारी लड़ाई शायद सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति में है। कोविड से ग्रसित लोगों की संख्या की दृष्टि से कल तक हमारा स्थान दुनिया में तीसरा था। हम सिर्फ ट्रंप के अमेरिका के पीछे हैं और यह दूरी भी अधिक से अधिक महीने भर में पाट ली जायेगी! पिछले छह महीनों में कोरोना के बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण आदि के क्षेत्रों में जो हालात बिगड़े थे, उनमें कोई ठोस सुधार होता दिख नहीं रहा।

और देश की वित्त मंत्री इस सब के लिए भगवान को दोषी ठहरा रही हैं। अंग्रेजी में इसे 'एक्ट ऑफ गॉड कहते हैं। यही कहा है उन्होंने। वह सफाई दे सकती हैं कि उनके कथन का गलत मतलब निकाला जा रहा है। अंग्रेजी के इन शब्दों का अर्थ प्रकृति का काम हुआ करता है। होता होगा यह अर्थ, पर इस सारी स्थिति पर जिम्मेदार तत्वों का जो रुख दिखाई दे रहा है, उसका मतलब तो यही निकलता है कि स्थिति को सुधारना हमारे बस का नहीं है। देश हताशा की एक गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। स्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं और सुधरने के कोई आसार नहीं दिख रहे।

सच तो यह है कि एक ओर सरकारें अपनी शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति का परिचय दे रही हैं और दूसरी ओर सरकारों को चेताने वाला भी कोई नहीं दिख रहा। जनतांत्रिक व्यवस्था में यह काम विपक्ष और मीडिया का होता है। हमारी त्रासदी यह है कि विपक्ष अपनी भूमिका निभाने लायक नहीं रहा और मीडिया चौकीदारी की अपनी भूमिका को निभाना ही नहीं चाहता। जिस तरह मीडिया में, खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक कलाकार की संदिग्ध मृत्यु का मुद्दा चौबीसों घंटे छाया हुआ है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि देश में इस गुत्थी को सुलझाने के अलावा और कोई समस्या ही नहीं बची। अगर ऐसा नहीं है तो इस स्थिति का एक ही मतलब निकलता है कि या तो हमारा मीडिया इतना नासमझ है कि उसे सही-गलत का पता ही नहीं चल रहा, या फिर कुछ तत्व हैं जो अपने निहित स्वार्थों के लिए मीडिया को अपने इशारों पर नचा रहे हैं। ये दोनों ही स्थितियां हमारे जनतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं।

हैरानी और पीड़ा होती है यह देखकर कि हमारे मीडिया को देश की बेरोजगारी, खस्ताहाल आर्थिक स्थिति, युवाओं की निराशा, मजदूरों की त्रासदी, किसानों की बदहाली आदि से जैसे कोई लेना-देना नहीं है। अपवाद हैं कुछ, पर कुल मिलाकर हमारा मीडिया सवाल तो पूछ रहा है। पर सवाल यही है कि सुशांत को किसने मारा। एक कलाकार ही नहीं, देश के किसी भी नागरिक की आत्महत्या या हत्या समूची व्यवस्था के लिए एक चुनौती होनी चाहिए। हमारा संविधान हर नागरिक को जीने का अधिकार देता है और इस अधिकार की रक्षा का दायित्व व्यवस्था पर होता है। ऐसी स्थिति में सवाल तो उठने ही चाहिए, उत्तर भी मिलने चाहिए पर जब सवाल पूछने वाले अपना संतुलन खोते दिखने लगें और उत्तर देने के लिए जिम्मेदार तत्व इसे लोगों का ध्यान बंटाने की दृष्टि से देखें, तो विवेकशील नागरिकों का दायित्व बनता है कि वे स्थिति की गंभीरता को उजागर करें।

बहरहाल, आज स्थिति गंभीर लग रही है। चीन हमारी उत्तरी सीमा पर आंखें गड़ाये बैठा है, पाकिस्तान कश्मीर में खुराफात करने की फिराक में है, आर्थिक मोर्चे पर हम चुनौतियों को समझ ही नहीं पा रहे अथवा समझना ही नहीं चाहते; देश के युवा जो हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं, निराशा-हताशा के दौर से गुजर रहे हैं। मजदूर भूखा है, किसान परेशान। कोरोना के चलते सारा भविष्य अनिश्चित-सा लग रहा है। जिनके कंधों पर बोझ है स्थिति सुधारने का, वे या तो आंख चुरा रहे हैं या फिर राह भटका रहे हैं।

स्थिति की भयावहता को समझना जरूरी है। कबूतर की तरह आंख बंद करके यह मान लेना आत्महत्या ही होगा कि बिल्ली नहीं है। खतरा सामने है। इससे आंख चुराकर नहीं, इससे आंख मिलाकर इसका मुकाबला करने की आवश्यकता है। हमारे यहां खतरों को न समझने अथवा टालने की जो प्रवृत्ति काम कर रही है, या लोगों का ध्यान बांटकर अपना हित साधने का जो खेल चल रहा है, उसे समाप्त करना ही होगा। नेतृत्व से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समस्याओं को सुलझाने की राह दिखाये, बरगलाये नहीं।

एक चुनावी सभा में बोले गए कुछ शब्द दोहराना चाहता हूं 'वादा था एक करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष देने का, क्या हुआ उसका? झूठे वादे करने वालों पर क्यों भरोसा करें हम? आज नौजवानों के सामने कोई भविष्य नहीं दिख रहा। माताएं-बहनें अपने आप को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहीं। ऐसे में वोट मांगने की हिम्मत कैसे कर रहे हैं लोग। ये अथवा कुछ ऐसे ही शब्द थे जो सन् 2014 के चुनाव-प्रचार में बोले गये थे। और बात जनता को अच्छी लगी थी। नेताजी को सफलता भी मिली। आज यही शब्द दोहराने का मन हो रहा है। जिस तरह स्थितियों को अनदेखा किया जा रहा है, जिस तरह समस्याएं गहराती जा रही हैं, जिस तरह जनता को यह लग रहा है कि नेतृत्व बरगलाने की कोशिश में लगा है, उसे देखकर यह पूछने का मन होता है कि अनुसनी की कोई हद होती है कि नहीं? यह बात सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व से ही नहीं पूछी जानी चाहिए, मीडिया के उन कर्णधारों से भी पूछी जानी चाहिए जो सवाल पूछना अपना अधिकार मानते हैं।

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