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गांधी के राम


शशांक शर्मा

प्रभु राम के जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण का कार्य 5 अगस्त से प्रारंभ हो गया, मंदिर निर्माण का भूमिपूजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करकमलों से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर उन्होंने अपने सम्बोधन में महात्मा गांधी के राम राज्य की परिकल्पना का स्मरण किया। महात्मा गांधी के अनुयायियों ने स्वतंत्रता के बाद गांधी के रामराज्य को आकार देना भूल गए। गांधी के राम को लेकर भ्रम भी फैलाया गया, यह समूह बार बार महात्मा गांधी के राम और संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति की याद दिला रहे थे। क्या वाकई महात्मा गाँधी जिस राम का नाम जपते थे वे रामायण के राम से अलग थे?

जबकि वास्तविकता यह है कि महात्मा गाँधी रामायण के दशरथनंदन राम की ही बात लगातार करते हैं और रामनाम की शक्ति और महिमा बताते वे धर्म-अध्यात्म से देश व समाज की परिस्थिति से जोड़ते हैं। उनका मानना था कि रामनाम की ताकत ऋषि मुनियों की परखी हुई है इसलिए इस पर संदेह नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं, ‘नाम – स्मरण पर मेरी अटूट श्रद्धा है । नाम – स्मरण का शोध करने वाला व्यक्ति अनुभवी था और यह शोध अत्यन्त महत्व की है । ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है । अनपढ़ व्यक्ति के लिए भी शुद्धि का द्वार खुला होना चाहिए । यह नाम स्मरण से संभव है । माला आदि तल्लीन होने में , गिनती करने में , साधन रूप हैं । जब कहीं से सहायता नहीं मिलेगी , तब भी इससे तो अवश्य मिलेगी ।’

गांधी जी रामनाम को ईश्वर की भक्ति का सबसे बड़ा माध्यम मानते थे, भगवान राम का नाम वे तुलसीदास के साथ लेते हैं, वे लिखते हैं कि रामनाम और ऊँकार दोनों एक ही चीज है । जप करते हुए मन स्थिर नहीं रहता , इसी कारण तो तुलसीदास ने नाम की महिमा गायी है । यदि श्रद्धापूर्वक कोई भी आदमी जपेगा तो अंत में वह स्थित चित होगा ही , ऐसा सब शास्त्रों की प्रतिज्ञा है और ऐसा जप करने वालों का अनुभव है । मुझमें जो भी बल है , वह राम का है मेरा अपना कुछ नहीं है । राम और कृष्ण के लाखों भक्तों के जीवन इन्हीं नामों से , ईश्वर की उपासना करते – करते बिल्कुल बदल गए हैं । यह कैसे होता है , मुझे नहीं मालूम । यह एक रहस्य है।

गांधी जी के लिए रामनाम भारत की जनता के लिए एक ताकत है जो स्वतंत्रता की लड़ाई में उपयोगी साबित होगी। आज पौराणिक कथा की चर्चा करें तो अवैज्ञानिक करार दे दिया जाता है लेकिन गांधी जी ने पौराणिक कथाओं की सत्यता को स्वीकार किया। वे लिखते हैं, ‘अजामिल का उदाहरण झूठ है , मानने का कोई कारण नहीं । बल्कि यह है कि ईश्वर का नाम लेता वह पार हो गया या नहीं । पौराणिकों ने मनुष्य जाति के अनुभवों का जो वर्णन किया है उनकी अवहेलना करना इतिहास की अवहेलना है । माया के साथ संघर्ष तो चल ही रहा है । अजामिल जैसों ने युद्ध करते हुए नारायण नाम का जप किया है । मीरा बाई उठते – बैठते सोते – जागते , खाते – पीते , गिरिधर का नाम जपती थी ।’

हमारे देश के राजनैतिक बुद्धिजीवी धर्म-अध्यात्म की चर्चा शुरू होते ही नाक भौं सिकोडऩा शुरू कर देते हैं। राम मंदिर आंदोलन के समय या रामसेतु का प्रकरण हो राम को एक मिथक बताने का प्रयास करते हैं। कई बार भगवान राम की राजनैतिक व्याख्या भी गांधी की दृष्टि से कर एक अलग राम की कल्पना करते हैं, जबकि गांधी का राम अयोध्या और एडम्स ब्रिज रामसेतु वाले ही राम थे। उन्होंने यंग इंडिया में इस बात की पुष्टि भी करते हैं, राम से बड़ा नाम है अर्थात देहधारी राम से देहातीत , अरूपी , अनामी राम बड़ा है । दशरथनन्दन सीतापति सही तदपि हमारी कल्पना के पूर्ण पुरूषोत्तम राम हैं । क्योंकि ( अव्यक्त है अत: ) अव्यक्त भी व्यक्त से भिन्न नहीं हैं । अव्यक्त की यह सब माया है । राम शब्द पर मेरा कोई आग्रह नहीं – ओंकार , कृष्ण , ईश्वर कुछ भी कहें ।

गांधी जी के रामनाम पर कुछ अन्य विचार इस प्रकार हैं,

रामनाम जपने के लिए कहते हुए मैं आपको एक ऐसा नाम दे रहा हूँ जिसकी पूजा इस देश की जनता न जाने कितनी पीढिय़ों से करती आ रही है । एक ऐसा नाम जो हमारे पशओं पक्षियों , वक्षों और पाषाणों तक के लिए हजारों – हजार वर्ष से परिचित रहा है ।

मेरे लिए तो रामनाम ही सब कुछ है । ईश्वर की जितनी भी विभूतियाँ है उतने ही उसके नाम हैं । भक्तों द्वारा लिए जाने वाले इन नामों की कल्पना ऋषियों ने अपनी आजीवन तपस्या के बल पर इस लिए की है कि नामहीन परमेश्वर के साथ हम आत्मीयता का नाता जोड़ सकें। यह मेरे जीवन का अंग बन गया है यह अभ्यास ( राम जप ) ही मेरा स्वाभाव बन गया है । मैं यह भी कह सकता हूँ कि यह शब्द मेरे जीभ पर भले ही न हो , चौबीसो घंटे मेरे मानस पटल पर अंकित रहता है । यह सदैव मेरा त्राण – कर्ता रहा है और मैंने सदैव इस पर भरोसा किया है ।

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