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गुजरात व छत्तीसगढ़ का सौहार्द्र सेतु-चम्पारण्य

मुकुन्द कौशल

यदि कोई प्रश्न करे कि छत्तीसगढ़ का वह स्थान बताएँ, जहाँ गुजरात की आत्मा बसती है, तो निश्चय ही इसका एक मात्र उत्तर होगा चम्पारण्य । यहाँ के विषय में जानने से पूर्व आइये समझ लें, कि इस स्थान का नाम चम्पारण्य क्यों पड़ा, क्योंकि 14वीं, 15वीं शताब्दी में यह सघन वनप्रान्तर चम्पा के वृक्षों से आच्छादित हुआ करता था, अत: चम्पा +अरण्य=चम्पारण्य। छत्तीसगढ़ी भाषा में अपभ्रंशित होकर यह शब्द चाँपाझर हो गया। चम्पारण्य का ग्रामीण नाम आज भी चाँपाझर ही है ।

हम भलीभाँति जानते हैं, कि प्रत्येक धर्म की अनेक शाखाएं हैं जिन्हें सम्प्रदाय कहा जाता है। सम्प्रदाय किसी गुरु विशेष द्वारा प्रतिपादित परम्परा की पुष्टि करते हैं, यही कारण है कि वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों को पुष्टिमार्गी कहा जाता है।

चम्पारण्य पुष्टिमार्गी तीर्थ कैसे बना?

कहा जाता है, कि सन् 1479 में आन्ध्र प्रदेश के लक्ष्मण भट्ट, अपनी गर्भवती पत्नी सहित चम्पारण्य मार्ग से काशी जा रहे थे। कुछ यात्री आगे बढ़ चुके थे, किंतु लक्षमण भट्ट व उनकी पत्नी इलम्मादारु को आठवें माह में ही प्रसव हो गया, किन्तु नवजात शिशु को उन्होंने संज्ञाहीन-नि:चेष्ट पाकर एक गड्ढे में रखकर पत्तों से ढंक दिया और आगे जाकर चौरानगर में रात्रि विश्राम किया। उस दिन तिथि थी चैत्रमास कृष्णपक्ष की एकादशी। रात्रि को इलम्मादारु को स्वप्न आया कि उसका पुत्र जीवित है। दूसरे दिन सुबह वे पुन: उसी स्थान पर लौटे तो देखा कि अग्नि परिधि के मध्य वह बालक हँसता हुआ खेल रहा है । अपने पुत्र को जीवित पाकर माँ की ममता जाग उठी व उनके स्तनो से दूध की धारा प्रवाहित होने लगी, जिससे अग्नि बुझ गयी और माता पिता अपने बेटे को लेकर गन्तव्य को चल पड़े। छुटपन से ही वह बालक अत्यन्त मेधावी कुशाग्र बुद्धि व प्रतिभाशाली था। बालक का नाम रखा गया वल्लभ। भविष्य में अनेक सद्ग्रन्थों का अध्ययन-मनन कर, इसी वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग संप्रदाय की नींव रखी। उन्होंने संपूर्ण भारत की पैदल यात्राएं कीं। जिन-जिन स्थानों पर उन्होंने श्रीमद्भागवत प्रवचन किया वहाँ वहाँ बैठक की स्थापना की गयी। यही कारण है कि वल्लभाचार्य का प्रागट्य स्थल चम्पारण्य, वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल बन गया है।

वर्तमान का चम्पारण्य

वर्तमान समय में चम्पारण्य एक विकसित व सुरम्य तीर्थ बन चुका है, छत्तीसगढ़ के व गुजरात के श्रद्धालु यहाँ नित्यप्रति दर्शनार्थ आते हैं । स्थापत्य कला से विभूषित यहाँ की दोनो बैठक(मंदिर), यहाँ की नयनाभिराम कलात्मक मूर्तियाँ, वल्लभाचार्य के संपूर्ण जीवन - घटनाओं को दर्शाती अनूठी चित्रशाला, भवनो का रंग-रोगन, साथ ही यहाँ की मनमोहक सजावट यात्रियों का ध्यान आकर्षित करती हैं । यात्रियों के लिए एक ओर जहाँ अनेक सुसज्जित विश्रामग्रहों की व्यवस्था है वहीं दूसरी ओर समीप ही एक जलधारा को यमुनामानकर एक यमुना मंदिर का भी निर्माण किया गया है । इस शान्त व सुंदर वातावरण में महाप्रसादी (भोजन) की भी समुचित व्यवस्था है। चम्पारण्य परिसर का भीतरी भाग संगमर्मर से निर्मित है जहाँ अनेक काष्ठद्वारों को चाँदी के पत्र से मढ़ा गया है ।

स्थापत्यकला की यह नयनाभिराम झाँकी व यहाँ की हरीतिमा मिलकर इस स्थान को और भी शांतिमय बना देते हैं । झाँझ - पखावज के साथ शास्त्रीय रागों के आधार पर गाये जाने वाले कीर्तन, प्रवासियों की आत्मा को अत्यंत सुकून प्रदान करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण की विशेषता

सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है, कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यहाँ वृक्षों के काटने पर पाबन्दी है । मंदिर के प्रांगण में जो भवन निर्मित किया गया है उसमें भी पहले के पेड़ों को यथावत रखकर निर्माण कार्य किया गया है ।होली पर्व की पूर्व रात्रि पर यहाँ के आसपास के गांवों में भी होलिका दहन के लिये पेड़ों की कटाई वर्जित है ।

यहाँ एक विशाल गौशाला भी है, जहाँ बड़ी संख्या में गोपालन होता है व गायों के खानपान व स्वास्थ्य का भी समुचित ध्यान रखा जाता है । छत्तीसगढ़ के निवासी, (बैठक के कर्मचारी ) भी गुजराती पर्यटकों के निरंतर सम्पर्क में रहकर गुजराती भाषा बोलना सीख गये हैं। लगता है, यह संपूर्ण क्षेत्र मानो छत्तीसगढ़ का वृन्दावन हो।

अन्य विशेषताएं

तपोभूमि छत्तीसगढ़ का यह कोसल क्षेत्र ,पद्मक्षेत्र भी कहलाता है । क्योंकि समीप ही राजिमनगर में प्रवाहित चित्रोत्पला (महानदी) में छत्तीसगढ़ का त्रिवेणी संगम है जहाँ राजीवलोचन का पौराणिक मन्दिर है । यहीं से पंचकोशी यात्रा भी आरंभ होती है । माघ पूर्णिमा में यहाँ चंपेश्वर महादेव का मेला भरता है, वहीं चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन वल्लभाचार्य का प्रागट्य महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें सम्मिलित होने गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान व छत्तीसगढ़ सहित देशविदेश से श्रद्धालुगण चम्पारण्य आते हैं । महाशिवरात्रि के दिन भी यहाँ काफी भीड़ एकत्र होती है । रायपुर से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंपारण्य जाते समय राह पर छत्तीसगढ़ मुक्तांगन को देखना भी एक अलग अनुभूति है ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि छत्तीसगढ़ व गुजरात की सांस्कृतिक एकता के मध्य चंपारण्य एक सेतु की भूमिका अदा कर रहा है । दोनो प्रदेशों में साम्य की दृष्टि से यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है, कि गुजरात के निवासी जितने सीधे-सादे व शान्तिप्रिय हैं, उतने ही सीधे-साधे व विनयशील छत्तीसगढ़ के लोग भी हैं ।

गुजरात व छत्तीसगढ़ का आतिथ्य सत्कार लगभग एक सा है। कलात्मकता से जितना लगाव गुजरात को है, उतना ही छत्तीसगढ़ को भी । अर्वाचीन आधुनिकीकरण के उपरांत अपने खानपान, वेशभूषा, रस्मोरिवाज़, ललितकलाओं सहित अपनी मूल अस्मिता के प्रति दोनो राज्यों के निवासियों का आग्रह एक सा है । यद्यपि छत्तीसगढ़ प्रदेश के निर्माण को अभी मात्र बीस वर्ष ही हुए हैं, किन्तु विकास के लिये छत्तीसगढ़ निरंतर गुजरात के नक्शेकदम पर चलकर प्रगति के नये सोपान गढ़ रहा है।

दोनो प्रदेशों के सिंहावलोकन से यह सुनिश्चित हो जाता है, कि यदि भाषा विकास, औद्योगिक क्रांति, कृषि,उत्पादन, विपणन एवं पर्यटन के क्षेत्र में उंचाइयाँ पाने के लिये छत्तीसगढ़ गुजरात की विकासशैली का अनुसरण करे, तो संभवत: इसे भी श्रेष्ठ भारत का उल्लेखनीय प्रदेश बनने में अधिक समय न लगेगा ।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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