गवाहों का संरक्षण सुनिश्चित करने की जरूरत


अनूप भटनागर

माननीय बनने की ख्वाहिश में अपराध की दुनिया का सहारा लेकर राजनीति की सीढिय़ां चढऩे का प्रयास करने वाले विकास दुबे की मुठभेड़ में मौत के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर यह व्यक्ति इतना दुर्दान्त कैसे बन गया इस सवाल का जवाब अक्तूबर, 2001 में शिवली थाने में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त संतोष शुक्ला की सरेआम गोली मार कर हत्या करने वाले विकास दुबे की अदालत से बरी होने की घटना में छुपा है। उसके खिलाफ थाने में मौजूद सिपाहियों तक ने गवाही नहीं दी थी।

आज भी हमारे देश में अपराध न्याय प्रणाली में गवाहों को पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है। अक्सर देखा गया है कि फौजदारी मामलों में गवाहों और सबूतों के अभाव में अपराधी बच निकलते हैं और अगर गवाहों ने हिम्मत करके गवाही दे भी दी तो ऐसे अपराधी जमानत या पेरोल या फर्लो पर जेल से बाहर आने पर उनका जीना दूभर कर देते हैं। यही वजह है कि बलात्कार, यौन हिंसा, हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी और अपहरण जैसे तमाम संगीन अपराधों के गवाहों की सुरक्षा लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।

कई सनसनीखेज मामलों में गवाहों के मुकरने या फिर उनके सामने नहीं आने से उत्पन्न स्थिति को देखते हुए ‘गवाह संरक्षण कार्यक्रम’ की आवश्यकता महसूस की गयी। गवाहों के संरक्षण का मामला देश की शीर्ष अदालत भी पहुंचा। शीर्ष अदालत ने गवाहों के संरक्षण के बारे में पांच दिसंबर, 2018 को अपने फैसले में केन्द्र सरकार गवाह संरक्षण योजना-2018 को मंजूरी दी थी। सरकार ने पिछले साल जुलाई में राज्यसभा को इस योजना के बारे में भी जानकारी दी थी। इस योजना के तहत गवाहों के खतरे के आंकलन के आधार पर उसे सुरक्षा प्रदान करने के उपायों का प्रावधान है। इस तरह के संरक्षण में गवाह की पहचान छुपाना, उसके ठिकाने को संरक्षित करना, ऐसे गवाहों के घर पर सुरक्षा उपकरण लगाना और ऐसे गवाहों के मामलों में विशेष रूप से बनाये गये अदालत कक्षों का इस्तेमाल शामिल है।

सरकार ने इस योजना में गवाहों के खतरे के आधार पर उन्हें तीन श्रेणियों में रखा है। पहली श्रेणी में ऐसे गवाहों को शामिल किया गया है, जिनमें जांच और मुकदमे की सुनवाई के दौरान और उसके बाद भी गवाह या उनके परिवार के सदस्यों की जान को खतरा होता है। दूसरी श्रेणी में ऐसे गवाहों को शामिल किया गया है, जिनमें उनकी या उनके परिवार के सदस्यों की जांच और मुकदमे की सुनवाई या फिर इसके बाद भी सुरक्षा, प्रतिष्ठा या फिर उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का खतरा होता है। तीसरी श्रेणी में ऐसे गवाहों को रखा गया है जहां तक गवाह और उसके परिवार के सदस्यों को डराने-धमकाने या परेशान करने और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का खतरा होता है। इस योजना के तहत गवाहों को सुरक्षा प्रदान करने पर होने वाला खर्च वहन करने के लिए राज्य सरकार या केन्द्र शासित प्रदेशों में गृह मंत्रालय या गृह विभाग द्वारा संचालित राज्य गवाह संरक्षण कोष का भी प्रावधान है।

अब सवाल उठता है कि गवाह संरक्षण योजना लागू होने के बाद गवाहों को किस प्रकार का संरक्षण प्रदान किया जा रहा है क्या यह योजना संगीन अपराधों के गवाहों में यह भरोसा पैदा कर सकी है कि अदालत में गवाही देने के बाद वे सुरक्षित हैं कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों के नरसंहार के बाद यह तथ्य सामने आया कि पुलिस ने ही दबिश देने वाली टुकड़ी की मुखबिरी करके विकास दुबे को सूचना दी थी। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अक्सर ही अपराधी सरगनाओं और माफिया द्वारा जेल से भी अपनी गतिविधियां जारी रखने की खबरें सामने आती रहती हैं।

इस सिलसिले में देवरिया जेल में बंद पूर्व सांसद और गैंगस्टर अतीक अहमद का मामला बहुत ही ताजा है। उच्चतम न्यायालय ने भी अतीक अहमद और उनके सहयोगियों द्वारा एक व्यापारी का अपहरण कर जेल में उसे प्रताडि़त करने के मामले का संज्ञान लेते हुए अप्रैल, 2019 में इसकी सीबीआई जांच का आदेश ही नहीं दिया था बल्कि इस बाहुबली को गुजरात की जेल में स्थानांतरित भी कर दिया था।

अगर हम चाहते हैं कि आपराधिक मामलों में गवाह निडर होकर अपनी गवाही दें तो सरकार और अदालत को उनकी सुरक्षा के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आपराधिक मुकदमों की सुनवाई तेजी से पूरी हो और दोषियों को यथाशीघ्र सजा मिले। इसके अलावा यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि संगीन अपराधों में सजा पाने या फिर न्यायिक हिरासत के दौरान जेलों में बंद अपराधी जेल के भीतर अपना हुक्म नहीं चला पायें। इसलिए जेल परिसर के भीतर से चलने वाली इन आपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने की भी जरूरत है।

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