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खामोशी से शिखर की कामयाबी

अरुण नैथानी

भारत के स्टार क्यूइस्ट पंकज आडवाणी पिछले छह साल में पांचवीं बार विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन बने, चौथी बार लगातार। कुल मिलाकर 22 बार विश्व?खिताब जीता है। मगर उनकी इस बड़ी कामयाबी की चर्चा वैसे नहीं हुई जैसे क्रिकेट के खिलाडिय़ों की सफलता पर होती है। वैसा पैसा भी नहीं बरसा जैसा अन्य?खेलों के खिलाडिय़ों के लिये विश्व स्पर्धाओं में जीतने के बाद बरसता है। मीडिया ने भी कंजूसी दिखायी। हां, प्रधानमंत्री ने जरूर हौसला बढ़ाया, कहा, 'देश को आपकी उपलब्धि पर गर्व है।

माना भारत में बिलियर्ड्स बहुत चर्चित खेल नहीं है, मगर विश्व स्तर की कामयाबी हासिल करने वाले कई खिलाड़ी भारतीय हैं। यह आश्चर्यजनक ही है कि पंकज आडवाणी ने छह साल में पांच और लगातार चार विश्व खिताब भारत की झोली में डाले। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे स्नूकर बिलियर्ड्स में बाइस विश्वस्तरीय खिताब जीत चुके हैं। दूर-दूर तक कोई खिलाड़ी उनके आसपास नहीं है। जीत के बाद वे कहते हैं, 'सफलता के बाद भी मैं हर बार सोचता हूं कि मेरे से अच्छा खेलने वाला कोई होगा। कभी हार जाने पर उनका सोचना होता है कि मैं इसे सबक मानकर अगली प्रतियोगिता की तैयारी में जुट जाऊं।

भारत के स्टार क्यूइस्ट पंकज ने गत रविवार को आईबीएसएफ वर्ल्ड बिलियर्ड्स चैंपियनशिप का खिताब जीता। चौंतीस वर्षीय पंकज का बिलियर्ड्स के शॉर्ट फॉर्मेट में छह साल में यह पांचवां विश्व खिताब है। म्यांमार में खेले गये इस मुकाबले में उन्होंने इसी देश के नाए थावे को लगातार दूसरे वर्ष हराया। पंकज ने विश्व चैंपियनशिप में पहला स्वर्ण 2003 में जीता था। वर्ष 2006 और 2010 के एशियाई खेलों में देश के लिये स्वर्ण पदक भी जीता। ??फिर वे अपने ताज पर साल-दर-साल नये नगीने जोड़ते चले गये। उन्होंने वर्ष 2009 में विश्व पेशेवर बिलियर्ड्स चैंपियनशिप जीती और नौ बार के चैंपियन मार्क रसेल को हराया। इस तरह इस प्रतियोगिता में जीत के साथ पंकज बिलियर्ड्स के 139 साल के इतिहास में इस खिताब पर कब्जा करने वाले दूसरे भारतीय बन गये। इससे पहले वर्ष 1992 में यह खिताब गीत सेठी ने जीता?था।

पंकज जीवन के प्रति गंभीर दार्शनिक अंदाज रखते हैं। वे कहते हैं कि हर विश्व प्रतियोगिता में भाग लेते वक्त में सोचता हूं कि मेरी प्रेरणा में कोई कमी नहीं है। मेरा मनोबल ऊंचा रहे। जीत इस बात का सबूत होती है कि सफलता की भूख मेरे अंदर की आग की तरह बरकरार है। यही वजह है कि इस भारतीय खिलाड़ी ने वर्ष 2014 के बाद बिलियर्ड्स और स्नूकर में हर साल कोई न कोई खिताब जीता। इस तरह अपने खेल में लगातार निरंतरता बनाये रखने वाले वह भारत के सबसे सफल खिलाड़ी हैं।

पंकज स्वीकारते हैं कि जब मैंने बिलियर्ड्स खेलना शुरू किया था तो तब अंदाजा नहीं था कि इस मंजिल तक पहुंच पाऊंगा। पंकज कहते हैं कि हर खिताब जीतने के बाद मैं सोचता हूं कि मुझे और अच्छा खेलना है, कोई?और अच्छा खिलाड़ी भी होगा। वहीं जब हारता हूं तो किस्मत पर यकीन करते उस वक्त सोचता हूं कि जीवन में और अच्छे मौके मिलेंगे। हमें अपना हुनर दिखाने का अवसर जरूर मिलता है।

24 जुलाई 1985 में पुणे में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे पंकज का बचपन कुवैत में बीता। फिर खाड़ी युद्ध के चलते उनका परिवार बेंगलुरु आ गया। ग्यारह साल की उम्र में पंकज ने इस खेल की शुरुआत की। शुरू में परिवार उनके इस खेल में समय खर्च करने पर नाखुश था मगर फिर उनकी कामयाबी से परिवार ने उनका संबल बढ़ाना शुरू किया। उन्होंने अपनी पढ़ाई और खेल में संतुलन बनाने का प्रयास किया।

शुरुआत में पंकज ने क्रिकेट में भी हाथ आजमाने की कोशिश की, मगर उन्हें लेदर की गेंद से डर लगता था। वे इस बात से इनकार करते हैं कि देश में क्रिकेट के प्रति जुनून के चलते उनकी उपलब्धियों की अनदेखी की वजह सेे उन्हें क्रिकेट से ?ईर्ष्या होती है। वे कहते हैं कि बीसीसीआई की तारीफ करनी होगी कि उसने क्रिकेट को ऊंचाइयां दी। अन्य खेल के आयोजकों को सीखना चाहिए कि खेलों को कैसे लोकप्रिय करना है, कैसे प्रायोजक तलाशने हैं, कैसे सूचना तंत्र का प्रयोग करना है।

बिलियर्ड्स में अपनी कामयाबी को वे भारतीय जीवन दर्शन से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि शारीरिक प्रदर्शन वाले खेलों में भारतीय भले ही पश्चिमी देशों को टक्कर न दे सकें, मगर बिलियर्ड्स व स्नूकर में हम सफलता हासिल कर सकते हैं। दरअसल हम भारतीय मानसिक रूप से बहुत मजबूत होते हैं। एकाग्रता को हासिल कर लेते हैं।?यह भी सोचते हैं कि जो होता है, अच्छे के लिये होता है। असफलता हासिल होती है तो सोचते हैं कि हमारा अवसर भी आयेगा। वास्तव में जिन खेलों में एकाग्रता और धैर्य की जरूरत होती है, वहां हम अच्छा प्रदर्शन करते हैं। फाइनल मैच के बारे में भी ज्यादा नहीं सोचता ताकि दबाव से खेल प्रभावित न हो।



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