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खूब लड़ी मर्दानी, वह भारत की बेटी

अरुण नैथानी



उनका सारा देश एकतरफ और वह एकतरफा। उनकी पार्टी ने उन्हें बाहर निकालने की धमकी दी। उन पर संशोधन प्रस्ताव वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया। उनके घर पर हमला हुआ, तोडफ़ोड़ की गई। उन्होंने पुलिस बुलायी तो वो दंगइयों के पक्ष में खड़ी मिली। उनसे देश छोडऩे के लिए कहा गया। संसद में बोलने के लिए खड़ी हुई तो उनका माइक बंद कर दिया गया। मार्शल बुलाकर उन्हें बाहर किया गया। मगर वह वीरांगना की तरह डटी रही। भारत के समर्थन में, भारत के खिलाफ मुखर होते नेपाल के सामने।

ऐसा साहस एक भारत की बेटी ही दिखा सकती है। यह बेटी है नेपाल में भारत के पक्ष में मुहिम चलाने वाली सरिता गिरि। उन पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वह नेपाल की सांसद होने के बावजूद भारत के पक्ष में खड़ी नजर आती हैं। हाल ही में जब के.पी. शर्मा ओली की सरकार ने भारतीय क्षेत्रों लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर अपना दावा जताते हुए नया नक्शा नेपाली संसद में पारित किया तो उसके खिलाफ एकमात्र सांसद के रूप में सरिता गिरि खड़ी नजर आई। वह एक शेरनी की तरह न केवल पार्टी बल्कि संसद के भीतर भी भारत विरोधियों के खिलाफ मुखर रही।

समाजवादी पार्टी की सांसद और मधेश नेता सरिता गिरि ने संसद के भीतर और बाहर सरकार के फैसले का जमकर विरोध किया। उनका मानना था कि नेपाल की जनता भारत के साथ बेहतर संबंध चाहती है और यह नक्शा विवाद चीन के ?इशारे पर किया जा रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल सरकार के पास पर्याप्त साक्ष्य तक नहीं हैं। उनका मानना था कि बजाय नक्शा बनाने के भारत के साथ शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत की जानी चाहिए। उन्होंने संविधान संशोधन प्रस्ताव पर अपना अलग से संशोधन प्रस्ताव अपनी पार्टी के विरोध के बावजूद पेश किया। जब संविधान संशोधन बिल पर प्रतिनिधि सभा में चर्चा हुई तो सरिता को बोलने नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद में एक महिला का अपमान किया गया। उनकी आवाज दबाने की कोशिश हुई है। उन्होंने बेबाक टिप्पणी की कि नेपाल की हालत बांग्लादेश जैसी हो सकती है जहां महिलाओं के अपमान की वजह से अलग देश बना?था। समाजवादी पार्टी ने उन्हें चेतावनी दी कि संविधान संशोधन पर अपना संशोधन बिल वापस ले, अन्यथा वे न केवल अपना सांसद का दर्जा खो देंगी, वरन उन्हें पार्टी से भी निकाल बाहर किया जायेगा। लेकिन सरिता अपने इरादे से नहीं डिगी। उन्होंने प्रतिनिधि सभा में संविधान संशोधन का जमकर विरोध किया। उनका माइक बंद कर दिया गया। बाद में स्पीकर ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करके सरिता के प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

नेपाल की राजनीति की बेहतर समझ रखने वाली सरिता गिरि तेज-तर्रार नेता के रूप में जानी जाती हैं। भारत मूल के मधेशी समुदाय के हितों के लिए वह लंबे समय से संघर्ष करती रही हैं। कालांतर वर्ष?2007 में वह नेपाल की राजनीति में दाखिल हुई।

दरअसल, नेपाल के तराई के इलाके से भारत का गहरा रिश्ता रहा है। मैथिली भाषी इन मधेशियों की संख्या सवा करोड़ से अधिक बतायी जाती है। हिंदी व नेपाली भाषी इन लोगों में से करीब पचास लाख लोगों को नेपाल की नागरिकता नहीं मिल पायी है जो अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे हैं। इन्हीं के बीच काम करके सरिता ने नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनायी है।

दरअसल, सरिता गिरि हिंदुस्तानी मूल की नेपाली सांसद हैं। उनके पास भारतीय नागरिकता भी है। उनका जन्म बिहार के चम्पारण में हुआ है। कालांतर में उन्होंने नेपाली मूल के एक व्यक्ति से शादी कर ली। लेकिन आज भी उनका मन भारत में बसता है। वर्तमान में वह फरसा संसदीय सीट से सांसद हैं। गिरजा प्रसाद कोइराला की सरकार में वह परिवहन मंत्री रह चुकी हैं। उन्होंने नेपाल में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के लिए जोरदार अभियान भी चलाया था। यह भी रोचक है कि तेज-तर्रार वक्ता सरिता अभी तक कोई चुनाव नहीं हारी हैं।

सरिता गिरि के साहस की तारीफ की जानी चाहिए। उन्हें देश छोडऩे की धमकी दी जा रही है। उनके घर पर तोडफ़ोड़ हुई, काले?झंडे लगाये गये, हमलावरों ने अपमानजक भाषा का प्रयोग उनके खिलाफ किया। लेकिन सरिता अपने पथ से डिगी नहीं। वे कहती हैं कि विपक्षी आवाज को दबाया जा रहा है। ये सब सरकार के इशारे पर हो रहा है। ऐसी मुश्किलों से बेपरवाह सरिता अपनी मुहिम में डटी है। वे नेपाली सरकार को चेता रही हैं कि जब जातीय भावना को राष्ट्रीयता में मिलाया जाता है और असहमति रखने वालों को डराया जाता है तो इसके राष्ट्रीय एकता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि भारत द्वारा गत आठ मई को उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे को धारचुला से जोडऩे वाले अस्सी किलोमीटर लंबी सडक़ के उद्घाटन के बाद नेपाल इस इलाके को अपना बता रहा है। उसका कहना है कि यह सडक़ नेपाली क्षेत्र से होकर गुजरती है।


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