खुदकुशी समाज की साझी विफलता का प्रतीक

अविजीत पाठक

जैसे ही मुझे फातिमा लतीफ द्वारा खुदकुशी करने की खबर लगी, मुझे लगा मानो मेरा अपना शरीर जख्मी हुआ है। चूंकि बतौर एक अध्यापक मैं उस लड़की जैसे अंतर्मन वाले हजारों विद्यार्थियों से बावस्ता रहा हूं, इसलिए मुझे इस घटना से एक संभावना का आसामयिक दुखद अंत होने जैसा महसूस हुआ है। एक ऐसा सपना, जिसने केरल की इस युवा, मेधावी छात्रा को आईआईटी-चेन्नई में दाखिला लेने को प्रेरित किया था जहां वह दर्शन शास्त्र एवं समाज शास्त्र में उच्च शिक्षा ले रही थी। अफसोस, टूट गया यह स्वप्न जो आत्म-अन्वेषण का मार्ग था। ऐसी यात्रा जो किताबों की दुनिया से होकर जाती थी, जहां मनन और विचार की राहें थी, जो अतींद्रिय और सामाजिक गतिशीलता से भरी थीं। लेकिन यहां केवल फातिमा के मामले को अलग करके देखना गलत होगा। एक अध्यापक होने के नाते मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि एक विद्यार्थी द्वारा आत्महत्या करना कॉलेज जीवन में छात्रों को दरपेश समस्याओं के अलावा शिक्षण संबंधी तौर-तरीकों में व्याप्त अनेकानेक विद्रूपता भरी परतों का सूचक भी है।

फातिमा मेधावी थी या यूं कहें कि टॉपर बनने लायक सभी गुण उसमें थे। तो फिर क्या उसमें अपनी काबिलियत सिद्ध करने संबंधी कोई ऐसी आशंका घर कर गई थी, जिससे हमेशा अव्वल रहने का दबाव बना था या फिर उसे हमेशा टॉपर रहने के पायदान से कमतर कुछ कबूल नहीं था? मैं अपने बाकी छात्रों को भी फातिमा की तरह मेधावी किंतु सुनहरे सपनों से लबरेज देखता हूं। ज्यादातर देखने में आया है कि उच्च अपेक्षाएं पालने वाले हमारे जैसे समाज में, जहां अनेक विद्यार्थी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेते वक्त इस अतिरिक्त बोझ से लदे होते कि उन्हें खुद को समाज में अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध कर दिखाना है। मानो उन्होंने अभिभावकों से लेकर पड़ोसियों तक और स्कूल के प्रिंसिपल ने यही घुट्टी पिलाई हो कि हर हाल में आगे रहना ही सफलता है। छात्रों के लिए अक्सर पढ़ाई में अच्छे ग्रेड के आधार पर सफलता पाना सामाजिक-आर्थिक रुतबा पाने का जाना-माना जरिया होता है वहीं असफल रहने का मतलब है शर्मिंदा होना। उच्च शिक्षा के केंद्र एक तरह से युद्ध लडऩे वाले मैदान बन गए हैं। हालांकि इसमें कोई विजेता नहीं होता, एक तरह से देखा जाए तो सभी हारे हुए होते हैं। बेशक उन्हें लगता है कि यदि असफल हुए तो बेइज्जती होगी और विफलता का ठप्पा जड़ जाएगा, लेकिन यह नहीं जानते कि अगर विजयी होते हैं तो भी सर्वोच्च स्थान पर बने रहने के भारी दबाव की वजह से एक तरह से उनकी मनोवैज्ञानिक और रूहानी रूप से मौत हो चुकी होती है। ऊंचे पायदान से जरा-सी भी फिसलन से जिंदगी उन्हें दयनीय और बेमानी लगने लगती है। यही कारण है कि आज की अत्यंत प्रतिस्पर्धात्मक और प्रदर्शन-उन्मुखी शैक्षणिक संस्कृति, मनोवैज्ञानिक चिंताएं और एकाकीपन झेल रहे कई युवा मनों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालते हैं।

इससे भी आगे, शिक्षा के नामी-गिरामी कई केंद्रों में पढ़ाने वाले हम अध्यापक भी अपने छात्रों पर जाने-अनजाने में बहुत तरह के दबाव बना डालते हैं। उच्च अकादमिक शिक्षण में किसी किस्म के हल्के-फुल्के क्षण नहीं होते, न ही कोई मस्ती भरे लम्हे, बस होते हैं तो केवल ट्यूटोरियल्स, सेमीनार, इम्तिहान, किताबें और पेपर, जो पूरी तरह से छात्रों की दिनचर्या को यंत्रवत और लकीर का फकीर बना देते हैं, नित दिन परोसी जाने वाली जानकारी वे खुराक की गोली की माफिक निगलते जाते हैं। इस दिनचर्या में फुर्सत के पलों का कोई स्थान नहीं है, न ही दिमाग को शांति और सुकून देने की संभावना रखी गई है। जिंदगी की अन्य आम नैसर्गिक नियामतों से उनका संपर्क कटा रहता है। मसलन खुले आसमान को निहारना या फुर्सत के पलों का आनंद लेना जैसे सुलभ-सुखद नजारे लेने का समय तक नहीं बचता। हमने अपने युवा मस्तिष्कों को रेस में दौडऩे वाले घोड़े जैसा बना दिया है। जो ज्ञान उन्हें सीखने पर मजबूर किया जाता है, वह उन्हें स्वतंत्र नहीं वरन जीवन की बाकी चुनौतियों का सामना धैर्य और सौम्यता से करने में अपाहिज कर देता है। यह हमारी आज की शैक्षणिक प्रणाली की तल्ख हकीकत है।

यहां एक अन्य कारक को भी समझने की जरूरत है, जैसा फातिमा की आत्महत्या के मामले में हुआ है, सोशल मीडिया में आई जानकारियों से पता चलता है कि हो सकता है शिक्षकों में किसी द्वारा असहज बर्ताव करने के बाद उसके मन में अपनी धार्मिक पहचान को लेकर मनोवैज्ञानिक या प्रतीकात्मक दिमागी हिंसा जैसा भाव जगा हो। अक्सर हमारे जैसे बहु-संस्कृति एवं बहु-स्तरीय सामाजिक ताने-बाने में नाना प्रकार की खींचतान भरी हिंसा होती रहती है। जाति, वर्ग, धर्म, लिंग और वर्ण के नाम पर प्रताडि़त करने की कहानियां नित सुनने में आती हैं। इससे बहुत जटिल परिदृश्य बन गया है, तिस पर हर किसी घटना में साजिश की बदबू सूंघने के फेर में अगर हम अपनी धारणा तत्काल बना लेंगे तो कारण ढूंढऩे में गहरे तक नहीं जा सकते। अनेकानेक अध्ययन बताते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि हमारे शैक्षणिक केंद्रों पर भी वह माहौल असरअंदाज होता है जो बाहर समाज में व्याप्त होता है, जैसे कि अल्पसंख्यकों को हाशिए पर ढकेलने की कोशिशें करते देखना। इसके अतिरिक्त हर अध्यापक देवता स्वरूप नहीं होता। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि पुरुष या अगड़े वर्ण से होने के कारण श्रेष्ठता का भ्रम पाले बैठा अध्यापक ऐसे संकेत अथवा हरकतें करता हो, जिससे छात्र बेइज्जत महसूस करते हों। ऐसे में किसी भुक्तभोगी संवेदनशील युवा मानस पर इस किस्म की अपरोक्ष हिंसा खतरनाक सिद्ध हो सकती है।

तथापि यह अहसास होना जरूरी है कि समाज की इस विद्रूपता के प्रति अति मोह रखना, दूसरे धर्म-समाज को अपने धर्म-वर्ण से बाहर अन्य को काबिल नहीं समझना इत्यादि ने ऐसी जहरीली धारणा को जन्म दिया है जहां दूसरों के लिए सदा संशय और शक बना रहता है। नतीजतन वे यह देखने में असमर्थ रहते हैं कि घिसी-पिटी मान्यताओं को हर जगह लादने की अपनी सीमाएं हैं, ऐसे लोगों का इस बात पर यकीन नहीं है कि शिक्षा इनसानी संभावनाओं को प्रफुल्लित करने का माध्यम है, जो किसी व्यक्ति विशेष की जाति, लिंग और धर्म से परे होती है। फिर भी इस भयावह-हिंसक दुनिया में भी ऐसे लोग हैं जो अपने ऊंचे ओहदों पर घमंड करने के बजाय इससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। दूसरों से सदा आशंकित रहने और बहुत ज्यादा शक करने वाले मौजूदा माहौल में यह भी मान लिया जाता है कि अगड़ी जाति से संबंध रखने वाला अध्यापक स्वयमेव जाति-धर्म के आधार पर वैर रखने वाला होगा ही। यह भी सोच लिया जाता है कि एक पुरुष अध्यापक पुरुष-प्रधान मानसिकता रखने से बाज नहीं आ सकता। ऐसी धारणा बनाना भी एक किस्म की अतिरंजित प्रतिक्रिया है, जो उस प्रक्रिया को नष्ट कर देती है, जिससे दूसरों पर विश्वास, संवाद और आपसी संबंध रखने वाली संस्कृति पनपती है। सनद रहे, तोडऩे वाले विकृत संवाद और दूसरों के मंतव्य पर लगातार शक करने वाले माहौल में अर्थपूर्ण शिक्षण संभव नहीं हो सकती और एक अध्यापक के तौर पर मैं इससे बहुत चिंतित हूं।

प्रत्येक खुदकुशी हमारे समाज की संयुक्त विफलता का द्योतक होती है, खासकर जब हम फातिमा जैसे युवा छात्रों को मौत के आगोश में जाने से नहीं रोक पाते हैं। एक विद्यार्थी, चिंतातुर नागरिक और अध्यापक के तौर पर हमें चीजों को सनसनीखेज बनाने में लिप्त होने की बजाय इन्हें मानवीय, तनाव-मुक्त, सबको साथ लेकर चलने वाली शिक्षण संस्कृति बनाने पर ध्यान देना चाहिए, जो प्रत्येक विद्यार्थी की विशिष्टता का मूल्यांकन करे और आपसी संबंधों में गर्मजोशी एवं नफासत का संचार करे। इस तरह के प्रयास सही मायने में फातिमा के लिए श्रद्धांजलि होंगे।

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