खेती में नई पहल

पिछले हफ्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अध्यादेश जारी करके कृषि से जुड़े तीन अहम फैसलों पर अमल का रास्ता साफ कर दिया। इनमें 65 साल पुराने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करना और अनाज, दालों, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची में से हटाना, किसानों को अपनी फसल अधिसूचित मंडी क्षेत्र से बाहर बेचने की छूट देना और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए किसानों को सीधे अपनी उपज की मार्केटिंग में उतरने की इजाजत देना शामिल है।

ये फैसले न केवल राष्ट्र हित के गंभीर मसलों से जुड़े हैं बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच कार्यक्षेत्र के विभाजन को भी छूते हैं। इसलिए सामान्य स्थितियों में अध्यादेश इसके लिए उपयुक्त रास्ता नहीं था। लेकिन आज देश की स्थितियां सामान्य नहीं हैं। कृषि क्षेत्र में और खासकर किसानों के लिए तत्काल राहत की व्यवस्था करना जरूरी है।

सरकार की दलील यही है कि इन कदमों से न केवल कृषि क्षेत्र में निजी निवेश की राह खुलेगी बल्कि किसानों को लाभ के ज्यादा मौके भी मुहैया कराए जा सकेंगे। ऐसे में अध्यादेश की मजबूरी समझी जा सकती है। लेकिन याद रहे कि न केवल आवश्यक वस्तु अधिनियम बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडी की व्यवस्था के पीछे भी दो मुख्य उद्देश्य रहे हैं। एक यह कि ज्यादा उत्पादन की स्थिति में किसानों को अपनी फसल कौडिय़ों के मोल न बेचनी पड़े और दूसरा यह कि सरकार के पास अनाज का पर्याप्त भंडार रहे ताकि देश में 1970 के दशक से पहले की तरह बार-बार खाद्यान्न संकट की स्थिति न पैदा हो। इसमें दो राय नहीं कि इन दोनों उद्देश्यों को साधने में ये प्रावधान पूरी तरह सफल रहे। लेकिन मामले का दूसरा पहलू यह है कि संकट के उस पुराने दौर से हम काफी आगे निकल आए हैं।

बदले माहौल के मुताबिक नए प्रयोग करके देखने में कोई हर्ज नहीं है। हां, इन नए प्रयोगों के दौरान हमें इनके साथ जुड़े जोखिमों पर भी लगातार नजर रखनी होगी। मसलन यह कि जिन फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का कवच हासिल नहीं है उन्हें आज भी किसान हर दूसरे-तीसरे साल सडक़ों पर फेंकने को मजबूर हो जाते हैं क्योंकि जो कीमत उन्हें बाजार में मिल रही होती है उससे आने-जाने का भाड़ा तक नहीं निकलता। ऐसे ही, खरीदारों के साथ किसानों के कॉन्ट्रैक्ट के भरोसे किसानों का हित सुरक्षित मान लेने की दलील स्वीकार करने से पहले हमें इस हकीकत पर भी नजर डालनी होगी कि गन्ने के किसान अपनी तौली हुई फसल चीनी मिलों में पहुंचा आने और बिक्री की रसीद हासिल कर लेने के बावजूद दो-दो साल तक उसका भुगतान हासिल नहीं कर पाते।

यानी एक बात साफ है कि भारत के किसानों को अभी बाजार के विवेक और सदिच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। देश के कई किसान संगठन इन बदलावों को लेकर अपनी आशंका जता चुके हैं। ऑर्डिनेंस लागू होने के बाद भी सरकार को अपनी तरफ से किसान हितों की सुरक्षा के बंदोबस्त करने ही होंगे।



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