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खेती पर किसान का नियंत्रण बना रहे

राजेन्द्र चौधरी


जून, 2020 में जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था, तब भारत सरकार ने खेती में तीन बड़े कानूनी बदलाव अध्यादेश जारी करके कर दिए क्योंकि देर सवेर ये अध्यादेश संसद में पारित करने के लिए रखे जायेंगे, इसलिए इन पर पुनर्विचार करने का अभी भी एक मौका बाकी है।

सब से महत्वपूर्ण है अनुबंध खेती अध्यादेश। आमतौर पर अनुबंध खेती का मतलब है कि बुआई के समय ही बिक्री का सौदा हो जाता है ताकि किसान को भाव की चिंता न रहे। परन्तु सरकार द्वारा पारित कानून में अनुबंध की परिभाषा को बिक्री तक सीमित न करके, सभी किस्म के कृषि कार्यों को शामिल किया गया है। इस तरह से परोक्ष रूप में कम्पनियों द्वारा किसान से ज़मीन लेकर खुद खेती करने की राह भी खोल दी है। धारा 2 एच 2 के अनुसार कम्पनी किसान को किसान द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए भुगतान करेगी। यानी किसान अपनी उपज की बिक्री न करके अपनी ज़मीन और अपने श्रम का भुगतान पायेगा।

आज़ादी की लड़ाई के समय से यह मांग रही है कि खेती पर किसान का नियंत्रण रहे, न कि व्यापारियों का। इसलिए आज़ादी के बाद किसी व्यक्ति द्वारा रखी जाने वाली कृषि भूमि की अधिकतम सीमा तय कर दी गई। इससे पहले छोटू राम के काल में यह कानून बनाया गया था कि गैर-कृषक या साहूकार खेत और खेती के औजारों पर कब्ज़ा नहीं ले सकता। इन कानूनों का उद्देश्य यही था कि खेती पर चंद लोगों का अधिकार न होकर यह आम लोगों की आजीविका का साधन रहे। कोरोना काल ने इस नीति की ज़रूरत को फिर से रेखांकित किया है। अनुबंध पर खेती कानून ग्रामीण इलाकों के इस अंतिम सहारे को छीनने का क़ानून है।

नए कानून को बनाने वाले भी इस बदलाव की भयावहता को जानते हैं। इसलिए इसे इसके असली नाम ‘कम्पनियों द्वारा खेती’ का नाम न देकर अनुबंध खेती का रूप दिया है। एक ओर धारा 8-ए में कहा गया है कि इस कानून के तहत ज़मीन को पट्टे पर नहीं लिया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर धारा 8-बी में भूमि पर कम्पनी द्वारा किये स्थाई चिनाई, भवन निर्माण या ज़मीन में बदलाव इत्यादि का जि़क्र है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि ज़मीन अनुबंध की अवधि के दौरान अनुबंध करने वाले के नियंत्रण में है। यानी कि खेती किसान नहीं, अनुबंध करने वाला कर रहा है।

अन्य दो कानूनी बदलावों द्वारा सरकार ने कृषि क्षेत्र से नियमन, विशेष तौर पर मंडी कानून को बहुत हद तक ख़त्म कर दिया है। कई बार किसान भी यह सवाल उठाते हैं कि सरकार क्यों फसलों के मूल्य तय करती है। ऊपरी तौर पर यह बात ठीक भी प्रतीत होती है पर वास्तव में यह ठीक नहीं है। सरकार तो न्यूनतम बिक्री मूल्य निर्धारित करती है। कृषि में सरकारी नियमन कृषि की प्रकृति के कारण है। एक तो बुनियादी ज़रूरत होने के कारण भोजन की मांग में कीमत या आय बढऩे पर ज्यादा बदलाव नहीं होता और दूसरा मौसम पर निर्भरता के कारण कृषि उत्पाद में बहुत ज्यादा बदलाव होते हैं। आपूर्ति में बहुत ज्यादा बदलाव और मांग का बेलचीला होने का परिणाम यह होता है कि अगर बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया जाए तो कृषि की कीमतों में बहुत ज्यादा बदलाव होते हैं। ऐसा न किसान के हित में होता है और न ग्राहक के हित में। जब फसल नष्ट होने के कारण कीमतें बढ़ती हैं तो जिस किसान की फसल ही नष्ट हो गई, उसको कोई फायदा नहीं होता और जब अच्छी पैदावार के कारण कीमतें इतनी घट जाती हैं कि खड़ी फसल की जुताई करनी पड़ती है तो भी किसान को कोई फायदा नहीं होता। इसलिए ही दुनिया भर में सरकारें कृषि बाज़ार का नियमन करती हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कृषि मंडी की वर्तमान व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत है। अभी भी सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी जिंसों में और सभी इलाकों में नहीं मिलता, और ऐसा सरकार खुद मानती है। मंडी में किसानों को और भी कई तरह की दिक्कतें आती हैं, पर इसका इलाज़ कृषि मंडी नियमन को ख़त्म करने में नहीं है। इसका उपाय है मंडी कमेटी को किसानों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए; उस में सभी हितधारकों के चुने हुए प्रतिनिधि हों, जैसा कि अब भी कानूनी प्रावधान है। अगर नियमन के बावज़ूद छोटे छोटे व्यापारियों और आढ़तियों से सरकार किसानों को नहीं बचा सकती, सरकारी खरीद का भी पैसा सीधे किसानों के खातों में नहीं पहुंचा सकती, तो अब जब बड़ी-बड़ी दैत्याकार वाली विशाल देशी-विदेशी कम्पनियां बिना किसी सरकारी नियंत्रण या नियमन के किसान का माल खरीदने लगेंगी तो फिर किसान को कौन बचाएगा?

जब संपन्न किसान अनाज मंडी से बाहर चला जाएगा, तो सरकारी स्कूलों की तरह अनाज मंडियां भी बंद होने लग जायेंगी, और फिर छोटे, आम किसान के लिए कोई राह नहीं बचेगी।

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