खाकी के दाग

डेढ़ दशक पहले एक परिवार का उत्पीडऩ करके उसे आत्महत्या के लिये मजबूर करने के आरोप में पुलिस के एक पूर्व डीआईजी व डीएसपी समेत पांच लोगों को सजा सुनाई गई है। दुखद है कि जिस पुलिस को नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी, वही लोगों की जान लेने का कारण बन रही है। मामले में रिपोर्ट दर्ज करने में देरी और जन दबाव के बाद अदालत के जरिये कार्रवाई होने के बाद न्याय मिलने में डेढ़ दशक का समय लगा। विडंबना यह है कि पूर्व डीआईजी को महज आठ साल की और सेवारत डीएसपी, जो घटना के समय पुलिस निरीक्षक थे, को चार साल की सजा मिली है। तमाम यंत्रणाओं के चलते एक हंसता-खेलता परिवार खत्म हो जाये और सिर्फ आठ-चार साल की सजा उस पर महज दस-बीस हजार का जुर्माना दरअसल, ऐसे मामलों में त्वरित अदालतों के जरिये उत्पीडऩ के मामले में तुरंत सुनवाई के साथ सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए। नि:संदेह पुलिस के निरंकुश व्यवहार पर नियंत्रण के लिये नियामक तंत्र वक्त की जरूरत है। शहरों में तो नागरिकों की जागरूकता और मानवाधिकार संगठनों की सक्रियता के चलते पुलिस उत्पीडऩ के खिलाफ स्वर मुखर हो जाते हैं, ग्रामीण इलाकों में पुिलस की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने का साहस कम ही लोग कर पाते हैं। फिर राजनीतिक आकाओं के संरक्षण के चलते पुलिस की मनमानी बदस्तूर जारी रहती है। विडंबना ही है कि आजादी के सात दशक के बावजूद पुलिस जनता की मित्र नहीं बन पायी। एक सभ्य आदमी आज भी थाने जाने में कतराता है कि कहीं थाने जाने पर लेने के देने न पड़ जायें। कहीं न कहीं पुलिस का वह औपनिवेशक चेहरा नहीं बदला है जो तब राष्ट्रीय आंदोलनकारियों को डरा-धमका कर ब्रिटिश सत्ता को अक्षुण्ण बनाने के लिये बना था।

पुलिस के निरंकुश व्यवहार के अलावा विभाग के निचले दर्जे के अधिकारियों की अपराधियों व नशा तस्करों से सांठ-गांठके किस्से भी सामने आते रहे हैं। हाल ही में नशा तस्करों से मोटी रकम लेकर उन्हें छोडऩे वाले पंजाब पुलिस के एक निरीक्षक को पकड़ा गया है। उससे नशे का सामान भी बरामद हुआ। यह घटनाक्रम जहां नैतिक पराभव की ओर इशारा करता है, वहीं विभाग की ऐसी काली भेड़ों के खिलाफ सख्ती की जरूरत को भी बताता है। इससे पहले भी नशे के कारोबार में संलिप्तता के कई मामले पंजाब में सामने आए हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर में एक डीएसपी द्वारा खतरनाक हथियारों से लैस आतंकवादियों का बचाव करने के मामले ने पूरे देश को चौंकाया। नि:संदेह आतंकवादी किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में थे, ऐसे में उन्हें संरक्षण देना राष्ट्र के प्रति अक्षम्यअपराध ही कहा जायेगा। कैसी विडंबना है कि जिन पर नागरिक सुरक्षा का जिम्मा है, जिसके लिये उन्हें तमाम सम्मान, वेतन-भत्ते और सुविधाएं मिलती हैं, वे चंद रुपयों के लिये अपना दीन-ईमान बेच देते हैं। कोई व्यक्ति जिम्मेदार पद पर बैठकर ऐसा घृणित कार्य कैसे कर सकता है, इसकी कोई तार्किक व्याख्या सामने नहीं आती। कहीं न कहीं पुलिस के प्रशिक्षण और परिवेश में कोई खामी जरूर है, जो पुलिस के गुण तो दूर की बात है, एक मानवीय व्यवहार लायक भी नहीं बना पायी। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश के राजनीतिक पराभव ने पुलिस तंत्र का इतना दुरुपयोग किया कि ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ पुलिस कर्मियों का काम करना मुश्किल हो गया।उनकी जगह बिना रीढ़ के जी-हजूरी वाले अधिकारियों ने ले ली। जब उनका इस्तेमाल राजसत्ताओं ने मनमाने व्यवहार और कानून-विरुद्ध कामों के लिये किया तो उन्हें भी निरंकुश व्यवहार की छूट मिल गयी। दागियों से भरपूर राजनीति से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। जिस तरह का दागदार नेतृत्व देश की राजनीति में उभर रहा है, उसकी प्रतिछाया पुलिस बल पर पडऩी स्वाभाविक है। यह एक गंभीर चुनौती है और गंभीरता से ही समाधान की मांग करती है।

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