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खट्टर की दूसरी पारी

आखिरकार बहुमत से कुछ दूर रहने के बावजूद मनोहर लाल खट्टर दूसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बन गये हैं। वे दोबारा सूबे के मुख्यमंत्री बने हैं, मगर इस बार उनकी ताकत पहले के मुकाबले कुछ कम रहेगी। इस बार निर्दलीयों और जननायक जनता पार्टी यानी जजपा की मदद से सरकार जो बनी है। रविवार को खट्टर के साथ ही दुष्यंत चौटाला ने भी उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। नि:संदेह मनोहर लाल खट्टर की आगे की राह पहले की तरह मखमली नहीं रहेगी, लेकिन वे जजपा के साथ साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमति से इस राह को आसान बना सकते हैं। इसमें दो राय नहीं कि दोनों पार्टियों का ही मकसद राज्य को विकास के पथ पर ले जाना ही है। चुनाव तक जजपा भाजपा की मुखर विरोधी रही है, मगर जब वह सत्ता में साझेदार है तो नि:संदेह अधिकारों की आकांक्षा के साथ दायित्वबोध भी होगा। जहां मनोहर लाल खट्टर के पास पांच साल की निष्कंटक पारी का अनुभव है, वहीं युवा दुष्यंत चौटाला की ऊर्जा व उत्साह मददगार होगी। यह बात अलग है कि दो अलग-अलग राजनीतिक संस्कृतियों से संबंध रखने वाले दोनों राजनेताओं के नजरिये में कुछ फर्क हो सकता है, मगर साथ मिलकर सरकार चलाने का दायित्वबोध राजनीतिक संयम भी देता है। नि:संदेह हर राजनीतिक दल का मकसद राज्य का विकास और लोककल्याणकारी शासन देना होता है। फिर बात श्रेय लेने की भी आती है। सरकार की आर्थिक सीमाएं भी हैं। विपक्ष में रहकर जनता को सब्जबाग दिखाना आसान होता है मगर जब हकीकत की पथरीली जमीन से वास्ता पड़ता है तो व्यावहारिक पक्ष लक्ष्यों का परिसीमन कर देते हैं। इस बात का अहसास देर-सवेर दुष्यंत चौटाला को भी होगा, जिनके पास कई दशक पुरानी राजनीतिक विरासत का अनुभव भी है। खुद की जमीन तैयार करने के संघर्ष का अनुभव उनका राजनीतिक कौशल बढ़ाएगा जो उनकी उपमुख्यमंत्री की पारी में मददगार साबित हो सकता है।

नि:संदेह, भाजपा के मजबूत संगठन का लाभ मनोहर लाल खट्टर को दूसरी पारी में पहले की तरह मिलेगा। केंद्र में भी भाजपा सरकार होने का अतिरिक्त लाभ उन्हें मिलेगा। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कृपापात्र होने के कारण राज्य की बड़ी विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में संसाधनों की कमी नहीं होनी चाहिए। जब भाजपा और जजपा सत्ता में साझेदार बने हैं तो जाहिर है कि किसी सीमा तक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर सहमति बनी होगी। कुछ मुद्दों को लेकर असहमति और अंतर्विरोध हो सकते हैं, मगर जनता का कल्याण भी दोनों दलों का लक्ष्य होना चाहिए। बावजूद इसके कि दोनों दलों द्वारा अपनी राजनीतिक अस्मिता को अलग दिखाने की कोशिश जरूर होगी। समय के साथ-साथ कई तरह के अंतर्विरोध गाहे-बगाहे विभिन्न राजनीतिक दलों की साझा सरकारों में नजर आते भी रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि जनादेश के अपूर्ण स्वरूप के बावजूद दोनों दलों में सरकार बनाने की सहमति समय रहते बन गई और महाराष्ट्र से पहले सरकार बनाने का निर्णय ले लिया गया। वैसे यह समय भाजपा के लिये आत्ममंथन का भी होगा कि उससे कहां चूक हुई जो मनोहर लाल खट्टर को दूसरी पारी में जजपा की मदद लेनी पड़ी। यह भी कि उसके मंत्रियों को जनता ने क्यों नकारा है। बहरहाल, इसके बावजूद उम्मीद की जानी चाहिए कि जजपा व निर्दलीयों के समर्थन से बनी सरकार जनाकांक्षाओं पर खरी उतरेगी। दोनों दलों में हरियाणा के विकास के मुद्दों, बेरोजगारी दूर करने, बुजुर्गों की पेंशन और किसानों के मुद्दों पर समझ बनेगी, जिससे हरियाणा विकास की राह पर पहले जैसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहेगा। आने वाले दिनों में मनोहर सरकार का स्वरूप तय होने के बाद शासन की रीतियों-नीतियों की बानगी नजर आएगी। यह देखना रोचक होगा कि भाजपा, जजपा और निर्दलीयों में से किस-किस को मनोहर लाल खट्टर मंत्रिमंडल में जगह मिलती है।

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