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किसान की कीमत पर शहरियों की सस्ती थाली

भारत में आम आदमी की थाली में भोजन की कीमत क्या है, इसको लेकर 27 पेजों का एक अध्ययन छपा है, वर्ष 2020 के आर्थिक सर्वे के अनुसार इसमें दिए आंकड़े उन तथ्यों की पुन: पुष्टि करते हैं कि पूरे भारत वर्ष में एक आम नागरिक अपनी खुराक पर औसतन कितना खर्च कर पाता है। पड़ताल से केवल एक ही निष्कर्ष निकलता है कि लोगों के भोजन को सस्ता बनाए रखने की कीमत खुद किसान को ही पूरी तरह वहन करनी पड़ती है।

आम आदमी की आर्थिक स्थिति को नापने के लिए उसके खाने की थाली में रोजमर्रा के भोजन पर आए औसत खर्च से बेहतर कोई और पैमाना नहीं हो सकता। इस अध्याय की मार्फत पढ़े-लिखे शहरियों को यह बताने का प्रयास किया गया है कि कैसे सरकार की आर्थिक नीतियां ‘खाद्य-मुद्रास्फीति’ को प्रभावशाली ढंग से नियंत्रण में रखे हुए हैं ताकि घरेलू बजट उनके आय संसाधनों के भीतर समा सके। लेकिन इसके बदले में यह आलेख बड़ी सफाई से उन करोड़ों किसानों की मुश्किलों को छिपा गया है, जो इस भोजन को सस्ता रखने की एवज अपने ऊपर ढोने को मजबूर हैं।

चार साल पहले की बात है, वर्ष 2016 के आर्थिक सर्वे में भी किसानों की दयनीय हालत के बारे में इंगित किया गया था। देश के 17 राज्यों में यानी लगभग आधे देश में किसान की औसत वार्षिक आय महज 20,000 रुपये प्रतिवर्ष थी। अन्य शब्दों में कहें तो एक कृषक परिवार केवल 1700 रुपये प्रतिमाह पर किसी तरह गुजर-बसर कर रहा है, जिसके लिए मैं अक्सर कहा करता हूं कि इस तुच्छ रकम में वे एक गाय तक को पालना गवारा नहीं कर सकते। तो यह है असल सच्चाई आम लोगों का भोजन सस्ता बनाए रखने के पीछे। किसान के अलावा अन्य उपभोक्ता खुश दिखें, इसके लिए सारा बोझ किसानों पर स्थानांतरित कर दिया जाता है। दरअसल यह ‘अन्न-दाता’ ही है जो उपभोक्ता को मिल रही सब्सिडी मुहैया करवा रहा है, तथ्य तो यह है कि नीति-निर्धारक भी आमतौर पर कृषकों की अनदेखी करना चाहते हैं।

आइए पहले यह देखते हैं कि यह ‘थाली-इकॉनोमिक्स’ क्या कहना चाहती है। यह ‘सिद्धांत’ लुटीयंस दिल्ली वालों की खाने की मेज पर होने वाली बातचीत हो या फिर सुदूर गांवों में सडक़ किनारे बने ढाबे में चली चर्चा में उठे सवाल का जवाब देने की कोशिश है। आर्थिक सर्वे-2020 बताता है कि थाली चाहे शाकाहारी हो या मांसाहारी, कैसे सरकार ने उसकी कीमत पिछले सालों में आसानी से वहन करने योग्य बनाकर रखी हुई है। इसके लिए राष्ट्रीय पौष्िटकता संस्थान के खुराक दिशानिर्देशों और उपभोक्ता कीमत सूचकांक का इस्तेमाल करते हुए देश के लगभग 80 केंद्रों से खाने की थाली पर औसत खर्च का आकलन किया गया है। बतौर एक उपभोक्ता ‘थाली-इकॉनोमिक्स’ हमें बताती है कि खाद्यान्नों की कीमत कम रखने से उसे कितना लाभ होता है, तो इसके लिए यह मानते हुए कि यदि पांच सदस्यों वाला परिवार एक दिन में दो थाली जितना भोजन ग्रहण करता है तो उस परिवार को वर्षभर में शाकाहारी भोजन पर होने वाले खर्च में 10,887 रुपये का लाभ होता है, तो मांसाहार युक्त खुराक पर यह मुनाफा 11,787 रुपयों का होता है।

ऊपरी तौर यह बचत भले ही दिखने में उतनी प्रभावशाली न लगे लेकिन इस तरह की क्लिष्ट आंकड़ेबाजी करने के बावजूद, जिसमें किसी खुराक की कीमत तय करने में अमुक सब्जी, दाल या मांसाहार बनाने में जो मसाला लगा है, उसका तक मूल्य जोड़ा गया है—इसके जरिए बताया गया है कि वर्ष 2015-16 के बाद वाले समय में यह फायदा महज 3 रुपये प्रति थाली बनता है। किंतु अब इसको प्रभावशाली आंकड़ा दिखाने हेतु इस मद को पहले एक परिवार के औसत सदस्यों की संख्या से गुणा कर दिया गया, फिर एक साल के दिनों से, ताकि एक वर्ष में किसी परिवार की खुराक पर हुई कुल बचत का आंकड़े सम्माननीय स्थिति में पेश किया जा सके। वहीं एक उद्योग मजदूर के वार्षिक वेतन में हुई सालाना बढ़ोतरी को आधार बनाकर यह हमें बताया गया है कि वर्ष 2006-07 से 2019-20 के बीच शाकाहारी थाली की ‘वहनीय क्षमता’ 26 प्रतिशत बढ़ी है तो मांसाहारी थाली की 18 फीसदी।

देखते हैं अब यह सर्वे कहां गलत रहा है कहा जा रहा है कि थाली की ‘वहनीयता’ में इसलिए इजाफा हुआ है क्योंकि वर्ष 2014-15 के बाद से कृषि क्षेत्र की उत्पादता बढ़ाने हेतु शुरू किए गए अनेकानेक आर्थिक सुधारों के साथ-साथ कृषि मंडियों में उत्पाद का मूल्य निर्धारण ज्यादा पारदर्शी तरीके से करते हुए मंडियों की कार्यप्रणाली की कुशलता बढ़ाई गई है। अगर यह वास्तव में सच होता तो कोई वजह नहीं थी कि देशभर में किसान आंदोलनों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होती। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक उस साल 687 कृषक प्रदर्शन हुए थे, जो अगले साल 2015 में बढक़र 2,683 और वर्ष 2016 में 4,837 का आंकड़ा छू गए थे। हालांकि, पूरा आधिकारिक आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है, किसान आंदोलनों की संख्या आगे कई गुणा बढ़ती चली गई है। आपको महाराष्ट्र में हुआ वह मीलों लंबा किंतु शांतिप्रिय कृषक रोष-मार्च तो याद होगा ही वह भी याद होगा जब उचित भाव न मिलने पर जब-तब किसान सडक़ों पर टमाटर, प्याज और आलू के ढेर लगाते दिखाई देते हैं।

अगर कृषि मंडियों ने अपने काम को सही ढंग से अंजाम दिया होता तो वास्तव में कृषि उत्पाद की कीमत बेहतर मिलती। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार, को बताना होगा कि क्यों और कैसे किसानों की आय की अधोगति हो रही है, जो वर्ष 2018 में पिछले 14 सालों के सबसे निचले स्तर पर है, आ गई थी। जबकि उसी साल उपभोक्ता खाद्य सूचकांक ऋणात्मक होकर 2.65 फीसदी रहा था। जब-जब खाद्य मूल्य गिरता है तब-तब नीति निर्धारकों के चेहरे खिल उठते हैं लेकिन वहीं किसान को अपनी आय में हुए भारी घाटे की मार सहनी पड़ती है। आखिरकार उनके भी घर-परिवार हैं, जिन्हें पालना है। मत भूलें कि शहरी लोगों की तरह उनकी भी हसरतें हैं। लेकिन उनके उत्पाद की वह कीमत न देना, जिसके वे असल में हकदार हैं, वह भी साल-दर-साल, इसकी वजह से कृषि संकट लगातार गहराता गया है। अब हालात यह बन गए हैं कि जब एक किसान बीज बोता है तो उसे अहसास नहीं होता कि दरअसल वह अपने कृषि घाटे की बुवाई कर रहा होता है।

एक थाली की आर्थिकी को सैद्धांतिक आंकड़ेबाजी से निकालने की बजाय यह सर्वे तब ज्यादा न्यायोचित होता यदि इसने उस संकट पर ध्यान केंद्रित किया होता, जिससे मौजूदा कृषि गुजर रही है। कुछ नहीं तो कम से कम इसमें यह समझने का प्रयास किया गया होता कि कैसे वास्तव में किसान के घाटे की एवज पर राष्ट्रीय आर्थिकी ‘बनाई’ जा रही है। वर्ष 2000-01 से लेकर 2016-17 की अवधि में ओईसीसीडी-ईसीआरआईईआर का एक अध्ययन बताता है कि कृषि उत्पादों के कम लगाए गए मूल्यों की वजह से कृषकों को इन 16 वर्षों में ही लगभग 45 लाख करोड़ रुपये की हानि उठानी पड़ी है जबकि ठीक इसी दौरान आम उपभोक्ता को अपनी खुराक पर 25 फीसदी कम मूल्य खर्चना पड़ा है। इस तरह किसान प्रति वर्ष 2.65 लाख करोड़ रुपये की हानि उठाते हैं ताकि शहरियों की थाली सस्ती बनी रहे, इसलिए यह एकदम साफ है किन कारणों से आज कृषि अत्यंत संकट की स्थिति में है।

खाद्य पदार्थों की कीमत सस्ती रखने की मार इसे पैदा करने वाले कृषकों पर पड़ रही है। समय आ गया है कि किसानों के उत्पादन की समुचित आमदनी सुनिश्चित करने वाली नीतियां बनाई जाएं।

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