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किसान असंतोष के राजनीतिक निहितार्थ


राजकुमार सिंह

कोई आंदोलन अनंतकाल तक नहीं चलता। मान लेना चाहिए कि सवा दो महीने से देश की राजधानी दिल्ली की दहलीज पर जारी किसान आंदोलन भी एक दिन समाप्त होगा ही। कृषि सुधार के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये तीन नये कृषि कानूनों को समाप्त करने की मांग को लेकर दिल्ली की दहलीज पर डटे किसान तो शुरू से ही लंबे आंदोलन की तैयारी बताते रहे हैं। गणतंत्र दिवस के घटनाक्रम के बाद से केंद्र सरकार दिल्ली की सीमाओं की जैसी किलेबंदी कर रही है, वह भी लंबी रस्साकशी का ही संकेत है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चौतरफा दबाव में सरकार और झुकते हुए समझौते का कोई रास्ता निकालती है या अंतत: असंतुष्ट किसान ही अपने संघर्ष की कोई दूसरी रणनीति तय कर लौट जाते हैं। एक बात तय है कि इसके राजनीतिक निहितार्थ गहरे और दूरगामी होंगे। लोकतंत्र में सरकार के कामकाज या फैसले का विरोध जताने के दो ही तरीके होते हैं: शुरू में धरना-प्रदर्शन, और उसका वांछित परिणाम न निकलने पर चुनाव में जवाब। बेशक कई दौर की बातचीत में केंद्र सरकार ने पीछे हटने के संकेत दिये, पर कानून वापसी की जिद पर अड़े किसान डेढ़ साल कानून स्थगित रखने भर के प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार नहीं। सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस प्रस्ताव को दोहराने से आगे नहीं बढ़े।

इसलिए हाल-फिलहाल केंद्र सरकार के और अधिक झुकने के आसार ज्यादा नजर नहीं आते। पराजित और हताश विपक्ष को किसान आंदोलन से अचानक ही संजीवनी मिल गयी है। संसद से सड़क तक विपक्ष के तेवर बताते हैं कि मोदी सरकार के विरुद्ध बमुश्किल खड़े हो पाये इस आंदोलन के अवसर को वह अपने हाथ से नहीं जाने देगा। ऐसे में संभावना यही बन रही है कि दिल्ली की दहलीज पर यह किसान आंदोलन जितना भी लंबा चले, इसकी निर्णायक भूमिका आगामी चुनावों में नजर आयेगी। यही कारण है कि आंदोलनरत किसानों का समर्थन करते एक से दूसरे धरनास्थल घूम रहे विपक्षी नेताओं की सक्रियता गणतंत्र दिवस प्रकरण के बाद तेज हो गयी है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के गणतंत्र दिवस की गरिमा पर आंच की साजिश किसने रची, इसका खुलासा तो विश्वसनीय निष्पक्ष जांच से ही हो पायेगा, लेकिन 26 जनवरी की रात से अपने तेवर खो रहे किसान आंदोलन में सरकारों की अति उत्साहित सक्रियता ने नये उत्साह और संकल्प का ही संचार किया है। दिल्ली की दहलीज पर शांतिपूर्ण धरना दे रहे किसानों को लाल किले के शर्मनाक प्रकरण के बाद, येन केन प्रकारेण खदेडऩे की पटकथा जिसने भी लिखी हो, उसने हालात को और उलझाया ही है। ऐसी उलझनें अक्सर सरकारों की परेशानी बढ़ाने वाली ही साबित होती हैं। इसके संकेत मिलने भी लगे हैं।

अपने पिता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत के नाम पर किसान राजनीति कर रहे राकेश टिकैत की पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भी चंद जिलों के बाहर नाम से इतर कोई पहचान नहीं थी, लेकिन आदित्यनाथ योगी सरकार ने जिस तरह गाजीपुर बॉर्डर पर धरनारत किसानों की पानी-बिजली आपूर्ति बंद कर उन्हें आधी रात को ही खदेडऩे के लिए भारी संख्या में पुलिस-अर्ध सैनिक बल भेज दिये, उसके बाद निकले उनके आंसुओं वाले वीडियो ने उन्हें रातोंरात किसान नेता बना दिया। किसान ही नहीं, राजनीतिक दलों-नेताओं के लिए भी गाजीपुर बॉर्डर तीर्थ-सा बन गया है। हरियाणा-पंजाब के राजनेता भी वहां जाकर राकेश टिकैत को समर्थन दे रहे हैं तो जींद में उन्हें सुनने-देखने के लिए भारी भीड़ जुटी। ध्यान रहे कि हरियाणा-पंजाब में किसान यूनियनें तो कई सक्रिय हैं, पर किसी किसान नेता का कद इतना बड़ा नहीं है कि वह राजनीति या चुनाव की दिशा बदल सके। बेशक खुद महेंद्र सिंह टिकैत भी यह भूमिका नहीं निभा पाये थे। किसानों ने उन्हें अपना नेता तो माना, पर राजनीतिक नेतृत्व अजित सिंह के पास ही रहा। यह विस्तृत अध्ययन का विषय है कि जिन चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक नेतृत्व को उत्तर प्रदेश से लेकर ओडिशा तक के किसानों ने स्वीकार किया, उनके पुत्र अजित सिंह की राजनीति पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चंद जाट बहुल जिलों तक क्यों सिमट गयी और आखिरकार भाजपा ने बचा-खुचा जनाधार भी अजित से छीन लिया। जमीन से उठाकर कार्यकर्ताओं को सांसद-विधायक बनाने वाले चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह और उनके भी पुत्र जयंत चौधरी तक पिछले चुनाव में हार गये।

अजित कुल दो बार लोकसभा चुनाव हारे, और दोनों ही बार उसकी बिसात भाजपा ने बिछायी। बेशक अपनी दूरगामी रणनीति के चलते सपा-बसपा भी इसमें मोहरा बने, पर इस बिसात में टिकैत परिवार और उनकी किसान राजनीति ने निर्णायक भूमिका निभायी। पिछले चुनाव में भाजपा को वोट देने की बात तो रोते हुए राकेश टिकैत भी स्वीकार कर चुके हैं, पर पिछले सप्ताह मुजफ्फरनगर की महापंचायत में उनके भाई नरेश टिकैत ने मंच से ही प्रायश्चित के अंदाज में कहा: हमने अजित सिंह को हरा कर गलती कर दी। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अगर नये कृषि कानूनों पर उद्वेलित-आंदोलित उत्तर भारत के अन्य किसान भी भाजपा को जिताने पर ऐसा ही सोच रहे हों। नहीं भूलना चाहिए कि पूर्ववर्ती जनसंघ हो या फिर मौजूदा भाजपा, इनका परंपरागत जनाधार मूलत: शहरी उच्च वर्ग ही रहा है। बेशक राम मंदिर आंदोलन और अटल बिहारी वाजपेयी की छवि से उस परंपरागत जनाधार का विस्तार हुआ, लेकिन उसे अकेलेदम विजयी आकार दिया नरेंद्र मोदी की लहर ने। उस लहर के मूल में मनमोहन सिंह सरकार की शिथिल शासनशैली से लेकर मोदी की प्रचारित छवि तक अनेक कारकों की भूमिका रही। चुनाव राजनीति की सामान्य समझ रखने वाला भी मानेगा कि शहर-गांव, जाति-वर्ग की विभाजक रेखाओं से परे जाकर मोदी को मिले जनसमर्थन के बिना भाजपा को 2014 में 282 और 2019 में 303 लोकसभा सीटें संभव नहीं थीं। माना कि अगले लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल से भी ज्यादा समय बाकी है, पर समय तो बंद मु_ी से रेत-सा फिसल जाता है। फिर इस बीच कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी होने हैं। अगर नरेश टिकैत की प्रायश्चितनुमा स्वीकारोक्ति की भावना किसान समुदाय में फैली, तब क्या होगा

उत्तर प्रदेश से ही शुरू करें। बेशक विपक्ष बुरी तरह विभाजित है और यही भाजपा की असली ताकत है, पर अस्तित्व का संकट दुश्मनों को भी साथ आने पर मजबूर कर देता है। परिणाम भले ही वांछित नहीं निकलें, पर 2019 में चिर-प्रतिद्वंद्वी सपा-बसपा मिल कर भाजपा के विरुद्ध लड़ ही चुके हैं। सपा और अजित सिंह के रालोद में दोस्ती अब भी बरकरार है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में किसानों के दबाव में ही सही, अगर विपक्ष एकजुट हो गया तो नतीजे दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ हैं। अगले ही साल पंजाब में विधानसभा चुनाव होंगे। जिस शिरोमणि अकाली दल के कंधे पर बैठकर भाजपा पंजाब में सत्ता–सुख भोगती रही, उससे गठबंधन टूट चुका है। आम आदमी पार्टी पंजाब में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पा चुकी है। किसान आंदोलन के चलते कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह भी सत्ता विरोधी भावना से काफी हद तक उबरते नजर आ रहे हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबले में भाजपा कहां होगी हिमाचल और उत्तराखंड की दो ध्रुवीय राजनीति में तो वैसे भी उसके लिए हालात बहुत अनुकूल नहीं होंगे। उसके बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की बारी है। राजस्थान के निकाय चुनावों को संकेत मानें तो किसान आंदोलन ने असर दिखाया है। हां, हरियाणा में अवश्य विधानसभा चुनाव में अभी साढ़े तीन साल से भी ज्यादा का समय है, पर लहर में भी स्पष्ट बहुमत से चूक गयी भाजपा के लिए बहुकोणीय चुनाव में राह आसान नहीं होगी, क्योंकि वर्तमान किसान आंदोलन में हिस्सेदारी भले ही पड़ोसी राज्यों की ज्यादा हो, पर केंद्र हरियाणा ही है। दूसरे, इस बार जिस नवजात जननायक जनता पार्टी के 10 विधायकों के सहारे सरकार बन गयी, अगले चुनाव में उसका अस्तित्व ही दांव पर होगा, जबकि कांग्रेस और इनेलो अधिक आक्रामक मुद्रा में होंगे। अगर उत्तर भारत ने मुंह फेरा तो भाजपा के लिए अंतत: दिल्ली भी दूर होती जायेगी, बशर्ते ऐन चुनाव के वक्त कोई भावनात्मक मुद्दा हाथ न लग जाये।


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