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कृषि संस्कृति में बेहतर भविष्य की आस

सुरेश सेठ

बहुत शानो-शौकत के साथ देश ने अपने गणतंत्र दिवस की इकहत्तरवीं वर्षगांठ मनाई। राष्ट्रपति से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक ने अपने वक्तव्यों और टिप्पणियों में देश के गणतंत्र की मूल भावना को अपनाने पर बल दिया। सर्वेक्षणों में अंतर्राष्ट्रीय फलक पर भारत की गरिमा के कम होने के समाचार प्रसारित हुए हैं। सबसे पहला समाचार तो विश्व में भारत के प्रजातंत्र की स्थिति के बारे में है। विश्व के 156 देशों के इस अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण में यह बताया गया है कि भारत में बीते वर्ष में आम आदमी के लिए लोकतंत्र का चेहरा बदला है। इस सूची में जहां नार्वे, डेनमार्क और स्वीडन शीर्ष पर हैं, लेकिन हम कहीं मध्य में दस पायदान नीचे सरक कर देश की एक सौ तीस करोड़ की आबादी को एक कामचलाऊ गणतंत्र परोस रहे हैं।

अब इस बात से क्या संतोष करें कि इस सूची में पाकिस्तान, चीन और किम जोंग का उत्तर कोरिया इससे कहीं नीचे हैं, क्योंकि वहां तो तानाशाही का हमेशा बोलबाला रहा, लेकिन हमारे देश के सत्ताधीश सदा अपने देश को दुनिया का सबसे बड़ा और गरिमापूर्ण गणतंत्र कहते रहे हैं। फिर यहां लोकतंत्र का चेहरा धुंधला क्यों होता जा रहा है अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षकों ने इसके तीन मुख्य कारण बताये हैं, देश में नागरिकता संशोधन कानून का पारित होना, देश की महिलाओं के शाहीन बाग दिल्ली से लेकर लखनऊ और मुम्बई तक इसके विरुद्ध लगे धरनों और प्रदर्शन का लगातार चलते रहना, सरकार द्वारा इस कानून को लागू करने की पैरवी और राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर बनाने के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने के प्रयास की आशंका का बनना। इसके साथ कश्मीर में अनुच्छेदों 370 और धारा 35-ए का खात्मा और जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापित रखने के लिए देर तक जारी रही पाबंदियां। यह दीगर बात है कि इस अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के मद्देनजर अब घाटी और जम्मू में पाबंदियां ढीली की जा रही हैं, जिसके लिए पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत ने भी चेतावनी दी थी। इसके साथ ही भारतीय गणतंत्र के विरूप होते चेहरे का एक बड़ा कारण भारतीय चुनावों में धन का बढ़-चढक़र प्रयोग और चुनावी अखाड़े में करोड़पति उम्मीदवारों के बोलबाले के साथ अपराधों से दागी उम्मीदवारों पर अभी तक नियंत्रण न कर पाना है। लेकिन यहां शोचनीय बात यह है कि ‘आरोपित जब तक दण्डित न हों, अपराधी नहीं कहला सकता’ के नियम की आड़ में आज भी केंद्रीय और राज्यों के चुनावों में दागी उम्मीदवारों का बोलबाला है और देश की जनता इन्हीं उम्मीदवारों में से चयन कर उन्हें अपने भाग्य विधाता बनाने के लिए मजबूर होती है। भारतीय गणतंत्र के इस दाग को मिटाने में चुनाव आयोग असमर्थ नजर आया है, इसीलिए उन्होंने इस समस्या को देश के सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दिया है कि वह इसका समाधान निकाले।

भारतीय गणतंत्र के इस उत्सव को सहज श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाने के बावजूद जब गणतांत्रिक माहौल में देश का आम आदमी अपने जीवन के बेहतर हो जाने का आकलन करता है तो तभी ‘ट्रांसपेरेसी अंतर्राष्ट्रीय’ का भ्रष्टाचार सूचकांक उसे चौंका देता है। इस वर्ष के 180 देशों के सर्वेक्षण में भारत का दर्जा और भी कम हो कर यहां दो पायदान नीचे चला गया है। पिछले वर्ष भारत 78वें स्थान पर था, अब 80वें पायदान पर चला गया है। हमने अपने गणतंत्र के संविधान में भारतवासियों को एक भ्रष्टाचार रहित समाज देने की परिकल्पना दी थी! लेकिन अभी प्रसारित एक स्वदेशी सर्वेक्षण बताता है कि देश की आधी आबादी को अगर कोई छोटा या बड़ा सरकारी काम करवाना होता है तो उसे रिश्वत देनी पड़ती है, शेष आधी आबादी को अपना काम करवाने के लिए संपर्क और रसूख का कोई चोर दरवाजा तलाश करना पड़ता है।

कभी पंजाब सरकार ने अपनी जनता को सेवा का अधिकार होने और सरकारी काम करने की समयबद्ध सीमा तय करने की घोषणा की थी। उसके लिए सांझ केंद्र बनाने के वादे किये थे। राज्य में जगह-जगह सांझ केंद्रों की इमारतें खड़ी हो गयीं, लेकिन फिर भी बोलबाला सत्ता के दलालों का रहा। जहां तक स्थानीय स्तर तक सांझ केंद्रों को विकेंद्रित करने का प्रश्न था, इमारतें बनीं तो उनकी बागडोर संभालने के लिए कोई आगे नहीं आया। वैसे सेवा के अधिकार की सूचना प्रशासनिक केंद्रों के सूचना पट्ट पर आज भी लिखी मिलती है। आम आदमी आज भी नौकरशाहों की लालफीताशाही से उसी तरह संत्रस्त नजर आता है।

भारतीय संविधान में देश को एक कल्याणकारी समाज बना देने की घोषणा की गयी थी। लेकिन विश्व की खुशहाली का सूचकांक बता रहा है कि इस देश का आम आदमी 71वीं गणतंत्र दिवस वर्षगांठ मनाने के बावजूद खुशहाल नहीं है। ‘हर पेट को रोटी और हर चेहरे पर मुस्कान’ आज भी देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए आकाश कुसुम है। अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार पंजाब के कैप्टन शासन के इन तीन बरसों में सोलह सौ लोग आत्महत्या कर चुके हैं, चाहे सरकारी खाते इसका कारण भूख और बेकारी नहीं बताते। लेकिन बढ़ती हुई बेकारी आज इस देश का ऐसा कड़वा सच बन गयी है, जिसके अजगर पाश से हमारे देश की विकास यात्रा मुक्त नहीं हो पा रही। इस समय हालत यह है कि देश में बेकारी दर 7.1 प्रतिशत हो गयी, जो पिछले कई दशकों की तुलना में सर्वोच्च है। इस समय युवा भारत में हर वर्ष एक करोड़ बीस लाख लोग कार्य योग्य होकर नौकरी मांगते हैं, और बदले में निराशा पाते हैं।

अंधाधुंध विकास गति प्राप्त करने के लिए मोदीकाल के इन छह वर्षों में देशी-विदेशी व्यापार घरानों के निवेश के लिए दौड़ लगी रही कि वे अपने निवेश के साथ स्वचालित मशीनों की धरती से औद्योगिक क्रांति की फसल उगा दें। लेकिन पूंजी गहन उद्योगों और उनकी त्वरित उत्पादन दर ने देश के लघु और कुटीर उद्योगों का बंटाधार कर दिया है। छोटे आदमी के श्रम गहन उद्योगों का पतन हो गया है। बटाला, फगवाड़ा, गोरायां और गोबिंदगढ़ के छोटे उद्योगों में मुर्दनी छा गयी है। पानीपत में हथकरघा उद्योगों के सहकारी विकास का सपना बड़ी मशीनों की आमद के सामने पानी मांगता नजर आ रहा है। परिणाम स्पष्ट रहा कि पुश्तैनी कारीगर बेकार होने लगे। उनके द्वारा बनायी गयी विशिष्ट लोककला का परिचय देने वाली वस्तुएं मंडी से गायब हो गयीं। लेकिन इनके स्थान पर वैविध्य रहित वस्तुओं का थोक उत्पादन भी नयी मांग न बटोर सका।

देखते ही देखते देश के प्रमुख सेक्टरों में पांच साल में 3.64 लाख करोड़ नये बेकार हो गये। यह उस ग्यारह करोड़ से अतिरिक्त थे जो पहले से देश में बेकार बैठे थे। बरसों से नेताओं के भाषणों में अच्छे दिन आने की मृगमरीचिका झेल रहे थे।

ऐसे माहौल में देश की युवा पीढ़ी के चेहरे पर रौनक लौटती तो कैसे क्या देश में युवकों के मरते हुए सपनों की जिंदगी लौटाने के लिए आवश्यक नहीं कि इस कृषि प्रधान देश में उन्हें अपनी जड़ों, अपने ग्रामीण समाज में लौटने के लिए प्रेरित किया जाये, जहां कृषि आधारित उद्योगों का एक नया ढांचा उनका स्वागत करे

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