क्षमा प्रसन्नता-आरोग्यता की दवा भी

दिनेश चमोला ‘शैलेश


क्षमा करने का साहस करना व क्षमा कर दिखाना, दोनों ही, सबके बूते की बात नहीं है। वास्तव में इसको कार्य रूप में परिवर्तित करने का सुअवसर विरले भाग्यशाली लोगों को ही नसीब हो पाता है।

सही मायने में क्षमा का उपयोग किया जाए तो यह मनुष्य के व्यक्तित्व व महत्व को चार-चांद लगा सकती है। इसमें हिंसक जीव को अहिंसक बनाने की जादुई क्षमता है। इसमें उग्र से उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति को भी कुछ ही क्षणों में अत्यंत सरस व सरल प्रकृति में बदलने की शक्ति भी समाई रहती है। संसार की बड़ी से बड़ी संपदा व शक्ति भी कभी वह काम नहीं कर सकती, जो पलक झपकते केवल क्षमा करने से संभव है।

क्षमा करना, अपने विपक्ष में खड़े व्यक्ति या सत्ता को पस्त करने का भावनात्मक शस्त्र मात्र नहीं, बल्कि अंदर ही अंदर उसके विद्रोही मनोभावों का सामान्यीकरण कर, उसे आदर्शपूर्वक अपने पक्ष में करने का चमत्कारी शास्त्र अथवा भाव भी है। क्षमा मनुष्य को प्राप्त प्रमुख दैवीय गुण है।

वस्तुत: क्षमा करने से, क्षमा किये जाने वाले व्यक्ति की दृष्टि में, क्षमा कर रहे व्यक्ति का कद स्वत: ही कई गुना अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि वह स्वयं को अपनी ही दृष्टि में क्षमा न करने योग्य मान चुका होता है। ऐसे में जब वह अपने बड़े अपराध के लिए क्षमा किया जा रहा होता है तो उसका अहम् उसके सामने पानी भरने लग पड़ता है

प्रसिद्ध पुस्तक ‘हाउ टु फॉरगिव व्हेन यू कांट’ में प्रसिद्ध मनोचिकित्सक, डॉ. जिम ने अपने शोधों व अध्ययनों के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि क्षमा करने से हम बेहतर तरीके से खुद को दुखों तथा पिछली घटनाओं से छुटकारा दिला सकते हैं। क्षमा के माध्यम से हम मानसिक शक्ति अर्जित कर दूसरे के लिए भी सुख का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

वे बताते हैं किस प्रकार अक्षम्य से अक्षम्य अपराधों व बातों को कलात्मक तरीके से क्षमा करते हुए उन सारे दुखों को कैसे सुख के संसार में बदला जा सकता है। क्षमा, एक तरह से दूसरे व्यक्ति के लिए अपने मन की पनपती कड़वाहट अथवा बुराई से स्वयं को रोकने की प्रक्रिया है। एक प्रकार से यह गलत व उलटी दिशा से अपना ध्यान हटाकर किसी अच्छी जगह केंद्रित करना है। जब आप अपने विचारों की दिशा बदल देते हैं तो आपकी जीवन-दृष्टि स्वत: ही बदल जाती है।

केवल दूसरों को क्षमा करना महत्वपूर्ण व बड़ी अहम बात नहीं होती है, बल्कि स्वयं को क्षमा करना उससे भी बड़ी बात है। जब आप अपने साथ अत्यंत बुरा व्यवहार करने वाले व्यक्ति को सहज रूप में, बिना किसी अपेक्षा के क्षमा कर देते हैं तो आप स्वयं को अधिक सकारात्मक व दबावमुक्त पाते हैं। किसी को क्षमा इसलिए मत करो कि वह क्षमा का पात्र है, बल्कि इसलिए करो कि आपको अपने जीवन में, परिवेश में, समाज में शांति चाहिएज् सृजनात्मकता चाहिएज्। यदि आप स्वयं को हर पल तरोताजा व स्वस्थ रखना व देखना चाहते हैं तो क्षमा करना सीखें। जब कोई आपकी बुराई करता है तो उसके प्रति आपके मन में नकारात्मक विचार आना स्वाभाविक है। लेकिन आपकी कुशलता इसी में है कि आप इस संकट की स्थिति से स्वयं को कैसे सुरक्षित रखते हो व दूसरे के साथ कितनी सकारात्मकता से पेश आते हो। क्षमा-दान, संत-हृदयी व्यक्ति का स्वभाव है। स्वयं भगवान श्रीराम, क्षमा आदि भावों को संतों का प्रमुख लक्षण मानते हैं। हमारे शास्त्रों में धर्म के जो 10 लक्षण बताए गए हैं उनमें धैर्य के बाद क्षमा का ही स्थान आता है। कहा भी गया है : ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ क्षमा करना वीरों का आभूषण है; लक्षण है। क्षमा दोनों ओर अर्थात् करने वाले व किये जाने वाले का गुणवर्द्धन करती है। वेदव्यास जी इसका सुंदर वर्णन इस प्रकार करते हैं : क्षमा असमर्थ मनुष्य का भूषण है और समर्थों का गुण है।

प्रख्यात मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट डी. एनराइट ने अपनी पुस्तक में कष्ट व पीड़ा देने वाले व्यक्ति को उसके बदले में क्षमा कर देने का पर्याय, स्वयं के जीवन को तनाव, क्रोध व पीड़ा से मुक्त कर सुखपूर्वक बनाना व साथ ही इसे कई प्रकार की बीमारियों से बचाव करना भी माना है। उनके अनुसार क्षमा के मार्ग में आगे बढऩे का तात्पर्य किन्हीं दूसरों के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के लिए प्रेम व शांति के द्वार खोलना है।

किसी को क्षमा करने से न केवल अपने शारीरिक रोगों का निदान संभव है बल्कि इससे चिंता, तनाव, मनोवृत्ति विषयक बीमारियों के साथ-साथ अन्य कई व्याधियों का भी उपचार स्वत: ही संभव है। अत: क्षमा करने की प्रक्रिया दूसरों से अधिक अपने लिए ही हितकारिणी है। अतीत की बुरी घटना का स्मरण मात्र जहां आपके वर्तमान की नींद उड़ा सकता है, वहीं कल को भी बाधित कर देता है। जब आप दूसरों को तत्काल क्षमा कर देते हो तो आप उतनी ही जल्दी अपने जीवन के सपनों और लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में उतने समय का सदुपयोग कर पाने में सक्षम हो जाते हो।

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