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काले धन पर चोट का वक्त

देश में जब भी काले धन का उल्लेख होता है तो विदेशों में जमा धन का जिक्र आता ही है। फिर गाहे-बगाहे स्विस बैंक में भारतीयों के काले धन की चर्चा होती है। फिर इसके राजनीतिक संपर्क का जिक्र भी होता है। इससे जुड़ी तमाम कहानियां चर्चा में रहती हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि वर्ष2014 का आम चुनाव भाजपा ने विदेशों में भेजे गये काले धन के मुद्दे पर ही लड़ा था। इस धन के बूते ही हर व्यक्ति के खाते में पंद्रह लाख रुपये डालने व अच्छे दिन लाने के वायदे भी किये गये थे। हालांकि, बाद में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इसे चुनावी जुमला बताया था। बहरहाल, अब काले धन की लड़ाई की दिशा में भारत को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। स्विस बैंक में जमा भारतीयों के काले धन से जुड़ी पहली सूची के रूप में विवरण भारत सरकार को सौंपा गया है। इसमें सक्रिय खातों की जानकारी भी शामिल है। फेडरल टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन ने पहली बार ऑटोमेटिक एक्सचेंज ऑफ इन्फॉर्मेशन यानी एईओआई के तहत यह जानकारी उपलब्ध कराई है। इसके अंतर्गत न केवल वर्तमान में सक्रिय खातों की जानकारी शामिल है बल्कि उन खातों की जानकारी भी होगी जो वर्ष 2018 में बंद कराये जा चुके हैं। इस व्यवस्था के तहत अगली जानकारी सितंबर 2020 में उपलब्ध करायी जायेगी। हालांकि, ये जानकारी संस्था की गोपनीयता के दायरे में होगी। अब मोदी सरकार का नैतिक दायित्व बनता है कि स्विस बैंक खाताधारकों की जानकारी को सार्वजनिक करे और भारतीय कानूनों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। दरअसल, एफटीए द्वारा उपलब्ध भारतीय खाताधारकों की जानकारी मूल रूप से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों, अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अमेरिका व अफ्रीकी देशों में रह रहे अनिवासी भारतीयों और व्यवसायियों की है। वहीं एक हकीकत यह भी है कि पिछले कुछ सालों में पूरे विश्व में स्विस बैंक के खातों के खिलाफ उठी आवाज के बाद इन खातों से बड़े पैमाने पर धन निकाल लिया गया था। साथही कई खाते बंद किये गये। अब ये आने वाला वक्त बतायेगा कि गोपनीयता की शर्त में बंधी जानकारियों का उपयोग सरकार कैसे करती है। या फिर क्या राजनीतिक संपर्क रखने वाले खाताधारकों के खिलाफ जांच व कार्रवाई को प्राथमिकता दी जायेगी। उल्लेखनीय है कि स्विस बैंक में धन जमा कराने वाले देशों में भारत 74वें स्थान पर है और ब्रिटेन पहले नंबर पर। बीते वर्ष भारत 15 पायदान चढक़र 73वें स्थान पर था। बहरहाल, इतना तो तय है कि पहली सूची मिलने से विदेशों में धन जमा करने वाले भारतीयों के खिलाफ कार्रवाई का आधार मिलेगा। हालांकि यह भी हकीकत है कि भाजपा के चुनाव में काले धन के खिलाफ मुहिम चलाने तथा केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद भारतीयों ने अप्रत्याशित रूप से स्विस बैंकों से पैसा निकाला है। फिर भी जो जानकारी मिली है, उससे बेहिसाब पैसा रखने वाले भारतीयों के खिलाफ कार्रवाई के लिये ठोस सबूत मिल सकते हैं। साथ ही तथ्य यह भी कि वर्ष 2016 में स्विस बैंक में भारतीयों की जमा राशि 45 फीसदी तक घट गई। बहरहाल अब गोपनीयता की अभेद दीवार समझे जाने वाले स्विस बैंक के खाते सरकारों की पहुंच से दूर नहीं रह सकते। यह गोपनीयता का कवच अब उघडऩे लगा है। एफटीए ने पूरी दुनिया में करीब 31 लाख खाताधारकों की जानकारी विभिन्न सरकारों को उपलब्ध कराई है। अब यह नहीं कहा जा सकता कि स्विस बैंक काला धन रखने का सबसे सुरक्षित ठिकाना है। इसी साल जून में भी स्विस सरकार ने स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले पचास भारतीय कारोबारियों के नाम उजागर किये थे। अब गेंद मोदी सरकार के पाले में है कि काले धन के खिलाफ बहुप्रचारित मुहिम को कैसे अमलीजामा पहनाती है ताकि सरकार की साख कायम रह सके।


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