कारोबार में महिलाएं

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘स्टार्ट अप इंडिया’ का लाभ महिला उद्यमियों को ज्यादा नहीं मिल पाया है। आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार इस साल 8 जनवरी तक 27,084 अधिकृत स्टार्टअप कंपनियों में कम से कम एक महिला डायरेक्टर वाली कंपनियों का हिस्सा महज 43 प्रतिशत था।

महिलाओं का प्रतिनिधित्व दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी कम है, जहां स्टार्टअप कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किए हैं। महिला उद्यमी इंडेक्स 2019 में भारत का स्थान कुल 57 देशों में 52वां है। कर्जदाता प्लैटफॉर्म ‘इनोवेन कैपिटल’ के अनुसार वित्तपोषित स्टार्टअप कंपनियों में कम से कम एक महिला को-फाउंडर वाली कंपनियों का हिस्सा 2018 में कुल का 17 फीसदी था, जो 2019 में घटकर 12 प्रतिशत रह गया। साफ है कि महिलाएं इस क्षेत्र में आना तो चाहती हैं लेकिन परिस्थितियां अनुकूल न रहने के कारण कुछ समय बाद वे अपने कदम वापस खींच ले रही हैं।

वैसे तो देश में सामाजिक स्थितियां महिलाओं के लिए कारोबार करने के अनुकूल नहीं बन पाई हैं, फिर भी कुछ वर्षों से इस दायरे में स्त्रियां दिखने लगी हैं। खासकर स्टार्टअप्स का दौर शुरू होने के बाद नई पीढ़ी की महिलाओं ने इसमें अपनी क्षमता सिद्ध की। कुछ ने इसमें सफलता भी पाई लेकिन उनके सामने चुनौतियां इतनी ज्यादा हैं कि कुछ दूर जाने के बाद उनका मनोबल टूट जा रहा है। सर्वे से पता चला है कि उन्हें क्रेडिट सपोर्ट भी कम मिलता है।

एक अनुमान है कि महिलाओं के 3 फीसदी स्टार्टअप्स को ही फंड मिल पा रहा है। इसका एक कारण शायद यह भी है कि बाजार में स्वतंत्र महिला निवेशकों की मौजूदगी नाममात्र ही है। लेकिन बड़ा सच यह है कि लगातार मुनाफा कमाने की क्षमता, टिकाऊपन या फिर विस्तार की कसौटियों पर महिला उद्यमियों के स्टार्टअप्स को निवेशक ज्यादा जोखिम भरा मान रहे हैं। उन्हें फंड देते समय उनके कारोबार का आकलन करने के अलावा उनके परिवार का भी मूल्यांकन किया जाता है, जबकि पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं है।

पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ भी एक बड़ी बाधा है। इस दायित्व के चलते महिलाओं को पुरुषों की तुलना में नेटवर्किंग के लिए कम समय मिल पाता है। स्त्री को लेकर समाज के पूर्वाग्रह अलग आड़े आते हैं। महिला बॉस से पुरुषों का अहं कुछ ज्यादा ही टकराता है इसलिए हाल तक हुनरमंद लोगों को कंपनी में लाना महिला उद्यमियों के लिए एक बड़ी समस्या थी। कई पुरुष प्रफेशनल्स इस दुविधा में रहते हैं कि महिला स्वामित्व वाला उद्यम चल पाएगा या नहीं। जिन वेंडरों के साथ उन्हें खरीद-बिक्री करनी होती है, वे भी महिला उद्यमी को गंभीरता से नहीं लेते। अगर हम कारोबारी दायरे में महिला-पुरुष बराबरी चाहते हैं तो इन सारे पहलुओं पर लगातार कुछ न कुछ करते रहना होगा।

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