कोरोना से जान बचाने पर जोर



देश में कोरोना के कारण जान गंवाने वालों की तादाद 12 हजार के पार जा चुकी है। इतनी बड़ी संख्या दहशत पैदा करती है, लेकिन कुल संक्रमणग्रस्त लोगों में मृतकों के अनुपात की दृष्टि से भारत की स्थिति आज भी बाकी दुनिया से बेहतर है। दुनिया में यह अनुपात पांच फीसदी से ऊपर है जबकि भारत में यह साढ़े तीन फीसदी से नीचे है। हालांकि हर मौत एक परिवार के लिए बहुत बड़ा हादसा है, कागज पर लिखी कोई संख्या नहीं, जिसके अनुपात को देखकर राहत महसूस की जा सके। ऐसे में यह अच्छी बात है कि सरकार मौतें कम से कम रखने की दिशा में प्रो-एक्टिव होती हुई दिख रही है।

राजधानी दिल्ली में हालात बिगडऩे के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने न केवल अस्पतालों का औचक निरीक्षण किया बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों की समस्याओं को समझने का प्रयास भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी पिछले दो दिनों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बातचीत की और कहा कि लॉकडाउन तथा अर्थव्यवस्था की समस्याएं भी कोरोना के खिलाफ जारी इस जंग से जुड़ी हैं।

मौतों को कम से कम रखने के लिए टेस्ट की संख्या बढाने का फैसला अच्छा है लेकिन पर्याप्त नहीं है। ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाने के लिए हर गंभीर केस का समय रहते अस्पताल पहुंचना और जल्द से जल्द इलाज शुरू होना जरूरी है। यह सही है कि कोरोना की कोई दवा अभी तक नहीं खोजी जा सकी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज का बचना सिर्फ उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता या संयोग पर निर्भर करता है।

अस्पताल में काबिल डॉक्टर और स्टाफ कई स्तरों पर इस लड़ाई में सकारात्मक योगदान करते हैं। कोविड से सबसे ज्यादा मौतें दिल, गुर्दे और लिवर की बीमारियां झेल रहे लोगों की हुई हैं। इनमें कई की जान ऐसी बीमारियों की देखरेख भर से बच जाती है। कुछ मामलों में शरीर के ओवर रिएक्शन के चलते फेफड़ों में फफोले पड़ जाते हैं तो जानलेवा एलर्जी जैसी उस स्थिति से निपटने में दवाओं से भरपूर मदद मिलती है। इसके अलावा इस वायरस को खत्म भले न किया जा सके, पर दवाओं के जरिये शरीर में इसकी ग्रोथ धीमी जरूर की जा सकती है। इससे शरीर को संभलने का वक्त मिल जाता है जो इस जंग में निर्णायक साबित होता है।

अमेरिका और ब्रिटेन से कोविड की गंभीर स्थिति में पहुंचे मरीजों की जान बचाने में डेक्सामेथासन के सफल उपयोग की खबरें आई हैं। पाया गया कि वेंटिलेटर पर जा चुके मरीजों के फेफड़े भी इस हल्के स्टेरॉयड से हरकत में आ गए और उन्हें बचाना संभव हो गया। इन सारी मेडिकल कोशिशों के लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मामूली या नगण्य लक्षणों वाले मरीज भले ही होम क्वारंटीन में रहें, लेकिन जब भी कोई मामला सीरियस होता दिखे, तत्काल उसे हॉस्पिटल शिफ्ट करने में किसी तरह की अड़चन न आए।

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