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कोरोना से जंग


ऐसे वक्त में जब रविवार को पहली बार रिकॉर्ड पचास हजार कोरोना वायरस संक्रमितों को पता चला, देशवासियों का चिंतित होना स्वाभाविक है। मगर इन आंकड़ों की वजह यह भी है कि टेस्टिंग में तेजी आई है। पिछले 24 घंटों में टेस्टिंग का आंकड़ा चार लाख की संख्या पार कर गया। निस्संदेह कोरोना को हराने के लिये टेस्टिंग-ट्रैकिंग के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। इसके बूते ही तमाम विकसित-विकासशील देशों ने समय रहते कोरोना के खिलाफ लड़ाई जीती है। यह बात अलग है कि हम दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी व घनी जनसंख्या वाले देश हैं। आर्थिक विसंगतियां भी कोरोना के प्रसार के लिये उर्वरा भूमि उपलब्ध कराती हैं। इसके बावजूद उत्साहवर्धक खबरें दिल्ली से भी आई हैं। एशिया की सबसे बड़ी स्लम बस्ती धारावी में कोरोना पर शिकंजा कसने की तारीफ डब्ल्यूएचओ ने भी की है। दिल्ली में केंद्र व राज्य सरकार ने मिलकर जैसे कोरोना का मुकाबला किया, उस मॉडल को पूरे देश में अपनाने की जरूरत है। चिंता की बात यह है कि देश के नये क्षेत्रों में संक्रमण में तेजी आई है। उत्तर प्रदेश व बिहार में बढ़ते संक्रमण के आंकड़े हमारी चिंता का विषय होने चाहिए। वहीं दूसरी तरफ केंद्र द्वारा बिहार, पश्चिम बंगाल, असम व ओडिशा को कोरोना संक्रमण रोकने के लिये नये सिरे से रणनीति बनाने के दिये गये निर्देश बताते हैं कि नीतियों का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से नहीं हो पाया। जो राज्य पहले कम संक्रमित नजर आ रहे थे, वहां अब चिंताजनक हालात उभर रहे हैं। जाहिर है इन राज्यों में समय रहते पर्याप्त सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाये गये। साथ ही जांच व संक्रमितों की तलाश का काम भी समय रहते पूरा नहीं किया गया। कई राज्य सरकारें पुन: लॉकडाउन का सहारा लेकर कोरोना से लड़ाई का दावा कर रही हैं, लेकिन बदले हालात में यह अर्थव्यवस्था व कामगारों के हित में नहीं होगा। कोरोना के साथ हमें फिर भूख की लड़ाई से भी जूझना पड़ेगा।

भले ही भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा पंद्रह लाख के करीब पहुंचने वाला है, मगर एक बात तो तय है कि कोरोना योद्धाओं के प्रयासों व केंद्र तथा राज्य सरकारों के साथ मिलकर दिखायी गई सक्रियता ने एक बड़ी आबादी को कोरोना फोबिया से मुक्त करने का प्रयास किया है। जो बड़े पैमाने पर अवसाद व तनाव की वजह बन सकती थी। आज राज्य सरकारें, स्वास्थ्य कर्मी तथा समाज के जागरूक लोगों ने सीमित संसाधनों के साथ कोरोना के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। दरअसल, हमें वायरस आधारित रोगों के खिलाफ एक स्थायी चिकित्सा तंत्र विकसित करने की जरूरत है ताकि भविष्य में मामूली संसाधनों के लिये हमें दूसरे देशों का मुंह न ताकना पड़े। धीरे-धीरे वायरस से जुड़े रहस्यों से पर्दा हट रहा है और कोरोना से लडऩे वाले जीन की पहचान करने का दावा वैज्ञानिक कर रहे हैं। कोरोना की वैक्सीन तलाशने की सैकड़ों कोशिशों में से कुछ अंतिम चरण में हैं। इसमें भारत की भी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। भारतीयों में स्वस्थ होने की दर भी उत्साहवर्धक है और मृत्यु दर भी वैश्विक दर के मुकाबले कम है। निस्संदेह यह लड़ाई सामूहिक प्रयासों से ही जीती जायेगी। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे को स्थायी रूप से मजूबत करने की जरूरत है। कोरोना वायरस के खिलाफ जारी जंग में टेस्टिंग की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए सोमवार को देश में दस हजार टेस्टिंग क्षमता वाली आईसीएमआर की तीन टेस्टिंग लैब्स का अस्तित्व में आना कोरोना से हमारी लड़ाई को मजबूती देगा। स्वयं प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉनफ्रेंसिंग के जरिये नोएडा, मुंबई व कोलकाता में इन टेस्टिंग सेंटर्स का उद्घाटन किया। इससे जहां कोरोना संक्रमण की जांच में तेजी आएगी, वहीं समय रहते रोगियों के उपचार से संक्रमण रोकने में मदद मिलेगी। आधुनिक सुविधाओं से लैस इन लैब्स में स्वास्थ्यकर्मियों को भी संरक्षण मिलेगा। इतना ही नहीं, ये लैब्स कोरोना महामारी खत्म होने के बाद हेपेटाइटिस, एचआईवी, टीबी व डेंगू की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।



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