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कोरोना: बीमारी से जंग जारी

कोरोना से जंग हम पूरी शिद्दत से लड़ रहे हैं, लेकिन वह स्थिति अभी तक नहीं आई है जिसमें वायरस के परास्त होने या कमजोर पडऩे की घोषणा की जा सके। उलटे भारी तबाही झेलने वाले कुछेक यूरोपीय देशों को छोडक़र बाकी दुनिया में इसका प्रकोप फिलहाल बढ़ता हुआ ही दिख रहा है। हाल तक दक्षिण एशिया में बीमारी की प्रचंडता कुछ कम मानी जा रही थी, लेकिन अभी तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी मामलों और मौतों का हाल बाकी दुनिया जैसा ही होता जा रहा है।

स्थिति को तुलनात्मक रूप से समझना हो तो इसके लिए इंग्लैंड या इटली का हवाला देने के बजाय हमें अधिक उपयुक्त उदाहरण चुनने होंगे। जैसे, कोरोना से लड़ाई में हाल तक भारत का मास्टरस्ट्रोक बताए जा रहे लॉकडाउन की बात करें तो इसमें कोई शक नहीं कि इसने देश में बीमारी का तेज फैलाव नियंत्रित करने में मदद की। हाल में देश को अनलॉक करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से बीमारी के प्रसार में आई तेजी भी इस बात की पुष्टि करती है। लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में लॉकडाउन कभी लागू ही नहीं हुआ, इसके बावजूद वहां बीमारी का स्तर कमोबेश भारत जैसा ही है और मौतों पर उसका नियंत्रण हमसे थोड़ा बेहतर ही कहा जा सकता है।

यानी लॉकडाउन अच्छा कदम था लेकिन उसकी सकारात्मक भूमिका पर एक हद से ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता। एक्टिव केसों की संख्या के हिसाब से अभी दुनिया में कुल तीन ही देश भारत से आगे रह गए हैं- अमेरिका, ब्राजील और रूस। इस पांत से बाहर निकलने के लिए हम पीछे लौटकर पहले जैसा लॉकडाउन भी अब नहीं लागू कर सकते, लिहाजा इन तीनों देशों की सरकारों द्वारा की गई गलतियों से बचने और बीमारी से लडऩे में इनके बेहतर तौर-तरीकों से सीखने का रास्ता ही फिलहाल हमारे सामने बचा है।

इस दृष्टि से सबसे प्रेरक उदाहरण रूस का है, जहां प्रभावितों की कुल संख्या हमसे लगभग दोगुनी है, लेकिन मृतकों की संख्या हमसे कम है। रूस की खासियत यह है कि उसने आक्रामक टेस्टिंग के जरिये बीमारी के शुरू में ही मरीजों का पता लगाकर उनकी देखरेख का रास्ता अपनाया। इसके साथ ही अस्पतालों में भर्ती कोरोना संक्रमित मरीजों पर उसने एंटीवायरल ड्रग एविफविर के इस्तेमाल को मंजूरी दी है, जिसके अच्छे नतीजे देखने को मिल रहे हैं।

भारत में एविफविर के परिवार की ही एक दवा पर जुकाम को लेकर परीक्षण पहले से जारी है लिहाजा एक संभावना है कि एविफविर का जेनरिक वर्जन हमारे यहां भी लांच हो जाए। वैक्सीन की कहानी अक्सर देर से शुरू होती है, सो सारे देशों का ध्यान अभी कोरोना की दवा खोजने पर ही है। जब तक इस दिशा में पक्की कामयाबी की खबर आए, तब तक हर कोई अपने स्तर पर बीमारी से सतर्क रहे और देसी उपायों से अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर काम करे तो सरकार का काम आसान हो जाएगा और वह अपना ध्यान लोगों की रोजी-रोटी बचाने पर लगा सकेगी।

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