कोरोना काल में हादसे


पश्चिम एशिया के छोटे से देश लेबनान की राजधानी बेरूत में मंगलवार को हुए हादसे ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है। बेरूत बंदरगाह पर कुछ मिनटों के अंतराल पर दो धमाके हुए, जिनमें दूसरा इतना भीषण था कि कुछ लोगों को लगा जैसे परमाणु हमला हो गया हो। कुछ देर बाद ही इस नतीजे पर पहुंचा जा सका कि यह कोई हमला नहीं बल्कि लापरवाही और संयोग के कुछेक ऐसे भीषणतम परिणामों में से एक है, जो आज तक दुनिया की नजर में आए हैं।

इस विस्फोट की जमीन अब से सात साल पहले, 2013 में ही तैयार हो गई थी जब लेबनान के कस्टम अधिकारियों ने अमोनियम नाइट्रेट से भरा एक ऐसा रूसी जहाज पकड़ा था, जिसके पास जरूरी कागजात नहीं थे। यह रासायनिक खाद जॉर्जिया से मोजांबीक ले जाई जा रही थी। जहाज के मालिकों ने खुद को दिवालिया बताकर जुर्माना देने से मना कर दिया, लिहाजा जहाज का माल जब्त कर वहीं पोर्ट के गोदाम में रखवा दिया गया था, जहां यह विस्फोटक उर्वरक बरसों से पड़ा था।

हाल में बड़े पैमाने पर पटाखे पोर्ट पर आए, जिनकी उतराई या रख-रखाव के दौरान संभवत: सुरक्षा का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जा सका। 137 से ज्यादा लोगों की जान लेने और 3 अरब डॉलर का तत्क्षण नुकसान करने वाली इस घटना की जांच शुरू हो गई है। जांच रिपोर्ट से ही पता चलेगा कि किस तरह की चूक इसके लिए जिम्मेदार थी, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोविड-19 से कम हुई कार्यशक्ति ने पूरी दुनिया में हादसों को आसान बना दिया है।

भारत की बात करें तो अनलॉक प्रक्रिया शुरू होते ही तरह-तरह के औद्योगिक हादसों का सिलसिला चल निकला। जुलाई के पहले हफ्ते में हुई एक स्टडी के मुताबिक मई से उस समय तक देश में 30 से ज्यादा औद्योगिक हादसे हो चुके थे जिनमें 75 लोग मारे गए थे। और यह संख्या सिर्फ उन दुर्घटनाओं की है जिनकी रिपोर्ट की गई। वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी।

विशाखापत्तनम के एक पॉलिमर्स प्लांट में 7 मई को जहरीली गैस लीक होने की घटना ने तो भोपाल गैस त्रासदी की याद दिला दी। तमिलनाडु और गुजरात में बॉयलर फटने की घटनाओं ने केवल कंपनी में काम करने वाले मजदूरों के ही जानमाल का नुकसान नहीं किया, आसपास की बस्तियों में भी दहशत फैलाई। असम के तिनसुकिया जिले के एक तेल कुएं में लगी आग उस पूरे इलाके की पारिस्थितिकी के लिए चुनौती बनी हुई है। दुर्घटना को दो महीने बीत जाने के बावजूद तीन मंजिला इमारत जितनी ऊंची लपटें वहां आज भी दिखाई दे रही हैं। ये भयानक नतीजे बता रहे हैं कि बाकी मोर्चों पर अतिरिक्त कीमत चुकाकर भी बंदरगाहों, खदानों और औद्योगिक इकाइयों के संचालन और सुरक्षा में किसी तरह की लापरवाही की गुंजाइश नहीं छोड़ी जानी चाहिए।

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