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कोरोना काल में ‘लाइव’ होने का खुमार


अंशुमाली रस्तोगी

सोच रहा हूं, जब सब आ रहे हैं फिर मैं भी क्यों न ‘लाइव’ आ ही जाऊं। ‘लाइव’ आने वालों में अपना भी नाम दर्ज करवा लूं। इन दिनों सोशल मीडिया पर जिस तरह लाइव आने का कॉम्पिटिशन चल पड़ा है, उसे देखकर तो यही लगता है कि आगे आने वाला समय ‘लाइव’ का ही है। जिसे देखो वह लाइव आ रहा है। क्या लेखक, क्या साहित्यकार, क्या कलाकार, क्या बावर्ची, क्या शिक्षक, क्या छात्र, क्या पड़ोसी, क्या रिश्तेदार। सब लाइव हैं। सारे रिश्ते, सारे संबंध लाइव हो गए हैं। और तो और लोग खाना लाइव खा भी रहे हैं, पका भी रहे हैं, पचा भी रहे हैं।

लाइव आना सब ‘स्टेटस सिंबल’ है। कोई आपकी सेहत का हालचाल भले न ले पर इतना अवश्य पूछ लेगा कि आप लाइव कब आ रहे हैं। लाइव आना या होना कोरोना काल का महत्वपूर्ण सबक है। कहीं जब आ-जा नहीं सकते तब क्यों न लाइव ही आया जाए।

मैं देख रहा हूं अपने साथियों को, कोई लाइव आकर व्यंग्य पाठ कर रहा है तो कोई कविता पाठ तो कोई अर्थ संबंधित चर्चा में व्यस्त है। हर किसी ने सोशल मीडिया पर अपनी दुकान खोल रखी है। घर बैठकर अपना माल बेचने में लगे पड़े हैं।

वैसे, लाइव आना मार्केटिंग का सबसे उम्दा फंडा है। अपना प्रचार घर बैठकर। कहीं आना नहीं। कहीं जाना नहीं। अपनी प्रतिभा को लाइव आकर निखारते रहिए। यू-ट्यूब पर अपना रंग जमाइए। सब्सक्राइबर्स बढ़ाइए। कमाई कीजिए। जिंदगी का मजा लीजिए।

जिसने एक दफा लाइव आने-दिखने का स्वाद चख लिया फिर उसे कंट्रोल कर पाना मुश्किल है। फिर तो बंदा सपने में भी लाइव आने का चांस नहीं छोड़ेगा।

मैं मजदूरों को लाइव आते देख रहा हूं। सोच रहा हूं क्यों न उन पर एक कविता या व्यंग्य लिखकर लाइव सुना दी जाए। यह मौका अच्छा है। मजदूर इन दिनों ‘हॉट केक’ भी हैं। क्यों न मैं चांस लपक लूं। हालांकि, मुझसे पहले भी कई लोग उन पर कविता या व्यंग्य लिखकर लाइव पढ़ चुके हैं। फिर मैं ही क्यों भला पीछे रहूं। कल हो सकता है ऐसा मौका बन जाए कि मुझे लाइव सुनाने पर कोई पुरस्कार या सम्मान ही मिल जाए। व्यक्ति को हमेशा दूर की सोचकर चलना चाहिए।


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