कोरोना की कारगर दवा के करीब वैज्ञानिक

मुकुल व्यास

दुनिया में इस समय कोरोना के इलाज के लिए 150 से अधिक दवाओं पर रिसर्च चल रही है। इनमें से अधिकांश दवाएं पहले से उपलब्ध हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सबसे ज्यादा उत्साहजनक दवाओं के आकलन के लिए सोलिडेरिटी ट्रायल शुरू कर रखा है। ब्रिटेन का कहना है कि उसका रिकवरी ट्रायल दुनिया में सबसे बड़ा है। इसमें 5000 से अधिक मरीज हिस्सा ले रहे हैं। रिसर्चर यह जानना चाहते हैं कि कौन-सी दवा कोविड के इलाज में सबसे ज्यादा कारगर हो सकती है। वे मुख्य रूप से तीन तरह की एप्रोच पर काम कर रहे हैं।

पहली एप्रोच में उन एंटीवायरल दवाओं की जांच हो रही है जो शरीर के भीतर कोरोना वायरस को विकसित होने से रोकती हैं। दूसरी एप्रोच में वे दवाएं शामिल हैं जो शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली को शांत कर सके। कोरोना वायरस से संक्रमित अधिकांश लोगों में हल्के लक्षण दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ गंभीर मामलों में मरीजों के शरीर में प्रतिरोधी प्रणाली बहुत आक्रामक हो जाती है और शरीर के अंगों पर ही हमला शुरू कर देती है। इसे ‘साइटोकाइन स्ट्रॉम’ कहा जाता है। इससे ‘एक्यूट रेस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम’ हो जाता है जो फेफड़ों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर देता है। ज्यादातर मामलों में यह घातक सिद्ध होता है। इस आंतरिक प्रतिरोधी तूफान को शांत करने और प्रतिरोधी प्रणाली को सही रखने के लिए कई दवाएं आजमाई जा रही हैं। तीसरी एप्रोच में कोरोना से ठीक होने वाले मरीजों के रक्त से अलग की गई एंटीबॉडीज या लैब में निर्मित की गई एंटीबॉडीज पर फोकस किया जा रहा है जो वायरस पर हमला कर सके।

एंटीवायरल दवाओं में रेमडेसिविर इस समय ज्यादा ध्यान आकृष्ट कर रही है। इस दवा पर चल रहे नवीनतम क्लीनिकल ट्रायल उत्साहवर्धक रहे हैं। अमेरिका के इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शंस डिजीज ने पता लगाया है कि रेमडेसिविर के उपयोग से कोविड के लक्षणों की अवधि 15 दिन से घटकर 11 दिन रह जाती है। दुनियाभर के अस्पतालों में चले इस ट्रायल में 1063 लोग शामिल हुए थे। लेकिन इस ट्रायल से इस बात का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला कि यह दवा कोरोना वायरस से होने वाली मौतों को भी रोक सकती है। यह माना जाता है कि इलाज के आरंभिक चरणों में एंटीवायरल दवाएं ज्यादा कारगर होंगी। ब्रिटेन की सरकार ने नेशनल हैल्थ सर्विस को रेमडेसिविर उपलब्ध करा दी है।

अमेरिका में किए गए दो अध्ययनों से पता चलता है कोरोना वायरस झेलने वाले को दोबारा संक्रमण नहीं होता क्योंकि उसके शरीर में वायरस के प्रति इम्यूनिटी उत्पन्न हो जाती है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने नौ बंदरों को वायरस से संक्रमित किया। जब ये बंदर ठीक हो गए तो वैज्ञानिकों ने पुन: उन्हें वायरस से संक्रमित कर दिया। लेकिन वायरस से दोबारा संपर्क में आने के बाद ये बंदर बीमार नहीं हुए।

यह एक आशाजनक संकेत है कि वायरस के खिलाफ बनाई जा रही वैक्सीन सफल हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिक यह मानते हैं कि कोरोना वायरस के खिलाफ बनने वाली एंटीबॉडीज सुरक्षात्मक होती हैं लेकिन उनके इस विश्वास के समर्थन में अभी तक कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं था। दूसरे अध्ययन में डॉ. बेरोच और उनके सहयोगियों ने 25 बंदरों पर 6 प्रोटोटाइप वैक्सीनों का परीक्षण किया। वे यह देखना चाहते थे कि इन वैक्सीनों के रेस्पॉन्स में उत्पन्न होने वाली एंटीबॉडीज सुरक्षा प्रदान कर सकती या नहीं। इसके पश्चात उन्होंने इन बंदरों और कंट्रोल ग्रुप के दस बंदरों को कोविड-19 से एक्सपोज किया। डॉ. बेरोच ने बताया कि कंट्रोल ग्रुप के बंदरों की नाक और उनके गलों में वायरस की अत्यधिक मात्रा पाई गई जबकि जिन बदरों को वैक्सीन दी गई थी उन्होंने काफी हद तक वायरस से सुरक्षा दिखाई। आठ बंदरों ने संपूर्ण सुरक्षा दिखाई। बंदरों को लेकर किया गया अध्ययन उत्साहवर्धक जरूर है लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि ये वैक्सीन मनुष्यों में भी असरदार होगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनमें वायरस से इम्यूनिटी कब तक चलेगी। लेकिन डॉ. बेरोच ने कहा कि यह अध्ययन हमें आश्वस्त करता है कि मनुष्य को भी वैक्सीन से सुरक्षा मिल सकती है।

इस बीच, ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कोरोना वायरस की एक वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल जारी है और रिसर्चरों का दावा है कि इसमें ठीकठाक प्रगति हो रही है। ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप के प्रमुख प्रोफेसर एंड्रयू पोलार्ड ने कहा है कि अब हम यह पता लगा रहे हैं कि बड़ी उम्र के वयस्कों में वैक्सीन कितना इम्यून रेस्पॉन्स उत्पन्न करती है। यह वैक्सीन छह बंदरों को वायरस की वजह से होने वाले निमोनिया से बचाने में सफल रही। यह वैक्सीन सामान्य खांसी-जुकाम उत्पन्न करने वाले वायरस के कमजोर रूप से तैयार की गई है। ऑक्सफोर्ड के रिसर्चरों के मुताबिक इस वायरस को आनुवंशिक फेरबदल के जरिए इस कदर शिथिल कर दिया गया है कि वह मनुष्य के शरीर में जाकर खुद को दोहरा नहीं सकता।

स्वस्थ वयस्क वॉलंटियर्स पर पहले चरण का ट्रायल अप्रैल में आरंभ हुआ था और रिसर्चरों के मुताबिक 1000 इम्यूनाइजेशन पूरे हो चुके हैं। अगले चरण में 10260 वयस्कों और बच्चों को भर्ती किया जाएगा। दूसरे चरण में 56 से 59 साल और 70 से अधिक साल के बुजुर्गों के अलावा 5 से 12 साल के बच्चों को शामिल किया जाएगा। रिसर्चर यह जानना चाहते हैं कि इन आयु वर्गों के लोगों में वैक्सीन का इम्यून रेस्पॉन्स कितना होता है। ट्रायल के तीसरे चरण में यह आकलन किया जाएगा कि क्या यह वैक्सीन 18 वर्ष से अधिक आयु वाली आबादी के बड़े वर्ग पर कितना असर करती है और उसे कितनी सुरक्षा प्रदान करती है। यदि ऑक्सफोर्ड के वैक्सीन ट्रायल सफल रहते हैं तो सितंबर तक वैक्सीन की तीन करोड़ डोज उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

वैज्ञानिकों का ध्यान दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले ‘लामा’ ऊंट पर गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि लामा में पाई जाने वाली एंटीबॉडीज कोविड-19 को रोकने में कामयाब हो सकती है। कोरोना वायरस पर वर्तमान रिसर्च से पहले वैज्ञानिकों ने सार्स (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम), मेर्स (मिडलईस्ट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम), एड्स और इन्फ्लूएंजा के वायरसों पर भी रिसर्च के लिए लामा की अनोखी एंटीबॉडी का प्रयोग किया था। अमेरिका में ऑस्टिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टैक्सस, अमेरिका के नेशनल इंस्टिटयूट्स ऑफ हैल्थ और बेल्जियम की गेंट यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने विंटर नामक लामा ऊंटनी की एक खास एंटीबॉडी की दो प्रतियों को जोडक़र एक नई एंटीबॉडी तैयार की है। यह एंटीबॉडी कोरोना वायरस के उस प्रोटीन को मजबूती के साथ जकड़ लेती है जो मनुष्य में बीमारी उत्पन्न करता है। इस प्रोटीन को स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है। वायरस इसी प्रोटीन की वजह से ही मानव कोशिका में दाखिल होता है। प्रयोगशाला में प्रारंभिक परीक्षणों से पता चलता है कि लामा की एंटीबॉडी कोरोना वायरस को स्वस्थ कोशिकाओं को संक्रमित करने से रोक देती है। रिसर्चर अब प्राइमेट जैसे जानवरों पर इस एंटीबॉडी का परीक्षण करने की तैयारी कर रहे हैं। ध्यान रहे मनुष्य और विभिन्न वानर प्राइमेट समूह में आते हैं। इन प्रयोगों में सफलता मिलने पर मनुष्य पर क्लीनिकल ट्रायल शुरू किए जाएंगे।

0 views0 comments