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कैंपस में हिंसा

जेएनयू में रविवार को हुई हिंसा को किसी यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच हुई मारपीट की तरह नहीं देखा जा सकता, हालांकि इसकी ऐसी ही शक्ल देश के सामने पेश की जा रही है। विश्वविद्यालयों से छात्रों की बेचैनी और संगठनों के हिंसक टकराव की खबरें पिछले कुछ सालों से लगातार आ रही हैं, लेकिन पिछले पंद्रह-बीस दिनों में हुई ऐसी घटनाओं को अलग रोशनी में ही देखा जा सकता है। पहले जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में और अब जेएनयू में हुई हिंसक घटनाओं के ब्यौरे बताते हैं कि इनके ज्यादा बड़े सूत्र यूनिवर्सिटी कैंपस के बाहर हैं। इन घटनाओं में मुख्य भूमिका सरकारी तंत्र और उसके नजदीक रहकर उत्पात मचाने वाले बाहरी तत्वों की बताई जा रही है।

शासन के विवादित फैसलों से समाज में फैले असंतोष और उसे दबाने की कोशिशों का कुछ नाता भी इन घटनाओं से दिखता है, हालांकि इस बारे में ठोस जानकारी तटस्थ जांच से ही सामने आ सकती है। बीते रविवार बाहरी नकाबपोशों का जेएनयू में घुस आना एक ऐसा तथ्य है, जिससे कोई भी इनकार नहीं कर रहा। देश की राजधानी में स्वतंत्र सुरक्षा व्यवस्था वाले एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में लाठी, डंडे, रॉड लिये गुंडे अचानक घुस आएं और वहां घंटों तांडव मचाकर सुरक्षित निकल जाएं, यह बात आसानी से गले नहीं उतरती। जेएनयू प्रशासन से ही नहीं, दिल्ली के पुलिस तंत्र से भी कुछेक असहज कर देने वाले सवालों के जवाब अपेक्षित हैं।

यह तो ठीक है कि पुलिस ने जामिया वाली गलती नहीं दोहराई और बाहरी हमले की सूचना होने के बावजूद यूनिवर्सिटी प्रशासन के बुलावे का इंतजार किया। लेकिन उसके कैंपस में पहुंचने के बावजूद एक भी नकाबपोश गुंडा पकड़ा नहीं जा सका, प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ हमले पुलिस की मौजूदगी में भी हुए- यह बात दिल्ली पुलिस की छवि से मेल नहीं खाती। यूनिवर्सिटी के सभी गेटों पर पहरे बिठाकर गुंडों को बाहर जाने से रोकना भी क्या इतना कठिन काम था पुलिस कह रही है कि उनमें से पांच-छह की पहचान कर ली गई है, लेकिन अभी तो वह यह बताए कि अपवाद स्वरूप भी उनमें से कोई पकड़ा क्यों नहीं गया।

दिल्ली पुलिस की ओर से इस पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी बिठा दी गई है, लेकिन खुद पुलिस की ढिलाई के पीछे किसका हाथ था, यह जानकारी न्यायिक जांच में ही निकल कर आ सकती है। अच्छा होगा कि दिल्ली की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार इसे हल्के में न ले। देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में सौ-पचास नकाबपोश अगर मार-काट मचाकर बेदाग निकल जाते हैं, तो ऐसा किसी भी हाई सिक्योरिटी कैंपस में हो सकता है- कोई मंत्रालय, कोई मीडिया संस्थान, कोई ऐतिहासिक-सांस्कृतिक धरोहर। सरकार अगर राजधानी में अपनी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रखना चाहती है, तमाम तरह के षड्यंत्र सिद्धांतों को हवा नहीं देना चाहती तो उसे न्यायिक जांच का आदेश देकर सचाई सामने आ जाने देना चाहिए।

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