कानून पर टकराव

देश में नया नागरिकता कानून (सीएए) लागू होने के साथ ही उसे लेकर देश भर में घमासान मचा हुआ है। तकरीबन एक महीने से इस कानून और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ कई विश्वविद्यालयों के छात्रों ने अभियान छेड़ रखा है। समाज के कई और तबकों के लोग भी इसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में इस मुद्दे पर विपक्षी दलों की बैठक देर से बुलाई गई, लेकिन इसकी जरूरत भी विपक्ष को शायद सरकारी पहल के बाद ही महसूस हुई हो। इधर कुछ समय से बीजेपी की पहल पर सीएए के समर्थन में प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है। पार्टी ने इसके बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए बाकायदा एक अभियान शुरू किया है।

औपचारिक रूप से नागरिकता संशोधन कानून बीते शुक्रवार से लागू हुआ है। हालांकि विपक्ष शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने कह दिया है कि वे अपने राज्य में नया नागरिकता कानून नहीं लागू करने जा रहे हैं। केरल विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव तक पास हो चुका है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) की आड़ में ‘एनआरसी’ पर काम कर रही है। दरअसल विवाद के लिए यहां पर्याप्त गुंजाइश भी छोड़ी गई है। सरकार कह रही है कि नागरिकता कानून का एनआरसी से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन आम आदमी में, खासकर मुसलमानों में यह आशंका घर कर गई है कि जो भी गैर-मुस्लिम एनआरसी से बाहर रह जाएंगे वे नागरिकता कानून के जरिए नागरिकता पा जाएंगे, चाहे वे घुसपैठिये ही क्यों न हों।

इसके विपरीत अगर भारतीय मुसलमान किसी कारणवश अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए सारे कागजात नहीं दिखा पाए तो उनका जीना दूभर कर दिया जाएगा। और बात यहीं तक सीमित नहीं है। देश के तमाम गरीब, कमजोर तबकों के मन में यह डर पैठ गया है कि कागजात न दे पाने के कारण उन्हें भी दर-दर भटकना पड़ सकता है। कई राज्यों में जन्म तिथि या अन्य प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लोग अभी से दफ्तरों के सामने भीड़ लगाने लगे हैं। सरकार कह रही है, किसी की नागरिकता नहीं जाएगी, किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं है। लेकिन कोई नहीं बताता कि गृहमंत्री ने संसद में जिस एनआरसी की बात कही है, उसके लिए लोगों को क्या-क्या कागजात दिखाने पड़ेंगे।

सरकार के लिए इतना कहना काफी नहीं कि सीएए को लेकर जनता को बरगलाया जा रहा है। उसे इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उसकी सारी कोशिशों के बाद भी एक बड़े तबके में दुविधा क्यों है। अच्छा होगा कि सरकार इसे नाक का सवाल न बनाए। वैसे भी सीएए को अदालत में चुनौती दी जा चुकी है। कानून के समर्थक और विरोधी, दोनों धैर्य बनाए रखें। संसद के बनाए एक कानून को लेकर देश भर में दो खेमों का टकराव कोई अच्छी बात नहीं।

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