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कितना सही, कितना गलत : राहुल का विदेश में व्याख्यान

डॉ. सुरजीत सिंह गांधी

विश्व के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देशों जी-20 की अध्यक्षता कर रहे भारत में बैठकों का दौर निरंतर जारी है। सरकार इसे एक अवसर के रूप में मान रही है।

इस कार्यक्रम के आर्थिक लाभ लेने की तैयारी के साथ-साथ भारत अपनी सोच, संस्कृति और सामथ्र्य से भी विश्व को परिचित करा रहा है। इसी क्रम में मार्च के पहले सप्ताह में विभिन्न देशों के विदेश मंत्री भारत में एकत्रित हुए थे। उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से भारतीय लोकतांत्रक व्यवस्था को देखा एवं महसूस किया होगा कि भारत कितनी तेजी से बदल रहा है। इसके विपरित इसी समय प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी कैंब्रिज विविद्यालय में ‘लर्निग टू लिसन इन द 21 सेंचुरी’ विषय व्याख्यान देते हुए देश के लोकतंत्र पर प्रश्न खड़े कर रहे थे।

राहुल गांधी मीडिया और न्यायपालिका पर कब्जा और नियंत्रण की बात कह रहे थे। प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा विरोधी पार्टयिों को डराने और धमकाने की बात कर रहे थे। अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों पर हमले किए जाने की बात दोहरा रहे थे। कुल मिलाकर राहुल गांधी देश की एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहे थे, जो रहने लायक नहीं है। जहां वह दबाव महसूस कर रहे हैं। उनके इन वक्तव्यों ने देश की राजनीति को गर्मा दिया है। बीजेपी और कांग्रेस में जुबानी जंग छिड़ गई है। अलबत्ता, राहुल गांधी की बातों में कुछ भी नया नहीं है। इस तरह की बातें देश में कई मंचों पर वह कई बार कह चुके हैं। इस बार मंच अंतरराष्ट्रीय है। पिछले कुछ वर्षो में वैश्विक स्तर पर भारत की छवि में काफी सुधार आया है।

आज विश्व के बड़े देश भारत के साथ दोस्ताना संबंध रखना चाहते हैं। कई बड़ी कंपनियों के भारतीय लोग शीर्ष पदों पर हैं। बात खाड़ी देशों की हो या यूरोपीय देशों की, हर देश भारत से व्यापार बढ़ाना चाह रहा है। ऐसे समय में राष्ट्रीय मुद्दों के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस प्रकार से उपयोग कतई भी देश हित में नहीं है। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं हैं, जहां पक्ष और विपक्ष पार्टी में मतभेद न हो, परंतु उस देश के प्रतिनिधि जब दूसरे देशों में जाते हैं तो अपने देश की बुराई नहीं करते हैं।

सबसे पुराना लोकतंत्र का दावा करने वाले देश अमेरिका में भी राष्ट्रपति का चुनाव जीतने वाले जो बाइडन को डोनल्ड ट्रंप से सत्ता को सौंपने के लिए सशस्त्र बलों को बुलाना पड़ा था। अमेरिका की राजनीति में भी दोनों रिपब्लिकन एवं डेमोक्रेट पार्टयिों के बीच अपने देश में कितनी ही खींचतान क्यों न हो, उसके बावजूद जब यह दूसरे देशों में जाते हैं तो देशहित को सर्वोपरि मानते हुए अपने संस्थागत संस्थानों की तारीफ ही करते हैं। कुछ इसी तरह की राजनीति ब्रिटेन में भी दिखाई देती है। वहां की राजनीति न सिर्फ विभाजनकारी है बल्कि बहुत नाजुक भी है। राजनेता जमकर नारेबाजी करते हैं। पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री बार-बार बदल रहे हैं। इसके बावजूद ब्रिटिश हित उनके लिए सर्वोपरि है।

देश की राजनीति भी तेजी से बदल रही है। पार्टयिां अपने घर की बातों को कहने के लिए विदेशी धरती को ही सियासी अखाड़े में बदल रही है। एक तरफ वैश्विक स्तर पर भारत की लोकप्रियता बढ़ रही है तो दूसरी ओर इस प्रकार की वैचारिकता के लिए विदेशी मंचों का उपयोग करना कहां तक उचित है? किसी भी देश के विकास में नीतियां सही या गलत हो सकती हैं, परंतु जिस राजनीति का हिस्सा राहुल गांधी भी है, उसको एक सिरे से नकार देना जायज नहीं है। लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर आए एवं संसद में विपक्ष के महत्त्वपूर्ण पद को सुशोभित कर रहे राहुल गांधी द्वारा विदेशी धरती पर भारतीय लोकतंत्र पर आक्षेप उनके पद की गरिमा के विपरीत है। भारत के लोकतंत्र पर आक्षेप करने से पहले देश में लोकतंत्र के इतिहास को पढ़ और समझ लेते तो शायद वह उन बात पर फोकस नहीं करते, जिनको उन्होंने विदेशी धरती पर गाया है। भारत विश्व का बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहां संविधान ही सर्वोपरि है। इतिहास साक्षी है कि विश्व के किसी भी देश में जब नेतृत्व मजबूत हाथों में रहा है तो उसने अपने देश की संस्थाओं और प्रणालियों को हमेशा ही प्रभावित किया है। वह हमेशा ही समाज के ध्रुवीकरण का भी प्रयास करता है। राजनीति में स्वयं को स्थापित करने के लिए कभी भी पहले से खींची लाइनों को मिटाने से अच्छा होता है, अपनी बड़ी लाइन खींचना।

पिछले 50 वर्षो से राहुल गांधी भी भारत की राजनीति को पास से देख समझ रहे हैं। चार बार के निर्वाचित सांसद ने देश की राजनीतिक संस्थाओं, राज्यों, व्यक्तियों और उनके अधिकारों की विकास यात्रा को उन्होंने भी समझा होगा, फिर यह दोषारोपण क्यों? शब्दों की भी अपनी मर्यादाएं होती है, उनका प्रयोग कब और कहां किस प्रकार किया जाना है, यह अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। राहुल गांधी यह भी अवश्य जानते होंगे कि विदेशी धरती से संचालित होने वाला खालिस्तान आंदोलन पहले से ही भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में उनका यह बयान कि भारत में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है, उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। राहुल के इस बयान के बाद ही जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ की इमारत के सामने भारत विरोधी पोस्टर चिपकाए गए, जिसमें दिखाया गया कि भारत में महिलाओं की इज्जत नहीं की जाती और ईसाईयों पर अत्याचार होते हैं, जबकि सच्चाई यह कि भारत की तुलना में कई यूरोपीय और मुस्लिम देशों में महिलाओं पर अधिक अत्याचार होते हैं।

2014 के बाद से, भारत में सांप्रदायिक हिंसा सबसे कम रही है और अल्पसंख्यक परिवारों की समृद्धि अब तक की सबसे अधिक है। राहुल गांधी ने पेगासस पर फोकस करते हुए कहा कि उनका फोन टेप किया जाता था, जिससे वह दबाव महसूस करते हैं। सर्वोच्च अदालत की जांच के बाद भी उनकी पीड़ा कम होती दिखाई नहीं देती है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के साथ निरंतर चल रहे सीमा विवाद एवं टकराव के कारण उपजे गतिरोध के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विपक्षी नेता को विदेशी धरती पर कुछ भी बोलने से परहेज करना चाहिए था। क्योंकि इससे विश्व भर में गलत संदेश का ही संप्रेषण होता है। आज के दौर में बदलती राजनैतिक विचारधारा ने वासुधैव कुटुंबकम की अवधारणा को नुकसान ही पहुंचाया है। देश हित सर्वोपरि ही विकास का मूलमंत्र होना चाहिए।


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