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कारगर है रूसी पलटवार


अमेरिका ने प्रतिबंधों का एलान करते हुए जो लक्ष्य घोषित किए, उनमें एक रूस की वित्तीय व्यवस्था को ठप करना था। लेकिन रुबल की जोरदार वापसी ने प्रतिबंधों के औचित्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब रुबल की डॉलर के मुकाबले लगभग वही कीमत हो गई है, जो यूक्रेन युद्ध से ठीक पहले थी।

रूस की मुद्रा रूबल दोबारा मजबूत हो चली है। पश्चिमी देशों की तरफ से प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रुबल की कीमत में भारी गिरावट आई थी, लेकिन पिछले सप्ताह कहानी बदल गई। अमेरिका ने प्रतिबंधों का एलान करते हुए जो लक्ष्य घोषित किए थे, उनमें एक रूस की वित्तीय व्यवस्था को ठप कर देना था। लेकिन रुबल की जोरदार वापसी ने प्रतिबंधों के औचित्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब रुबल की डॉलर के मुकाबले लगभग वही कीमत हो गई है, जो यूक्रेन पर रूस के हमले से ठीक पहले थी। इसे राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की एक बड़ी सफलता समझा जा रहा है। अपने देश पर लगे अभूतपूर्व प्रतिबंधों से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पुतिन सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं। सबसे पहले वहां के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को दो गुना बढ़ा कर 20 प्रतिशत कर दिया। फिर रुबल के बदले यूरो या डॉलर आदि चाहने वाले लोगों पर सख्त पाबंदियां लगाई गईं। आखिर में जिस कदम से रुबल की कीमत उछली, वह पुतिन का यह फैसला है कि एक अप्रैल से उन्हीं ‘अमित्र’ देशों को रूस प्राकृतिक गैस देगा, जो उसके बदले भुगतान रुबल में करेंगे। रूस ने ‘अमित्र देशों’ की सूची में उन देशों को रखा है, जिन्होंने उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैँ।

तो कहा जा सकता है कि यूक्रेन मामले में पश्चिमी देशों ने रूस के खिलाफ जो वित्तीय युद्ध छेड़ा, रूसी राष्ट्रपति उसका जवाब अब जवाबी वित्तीय हमलों के जरिए दे रहे हैँ। इस सिलसिले में उन्होंने यूरोप के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। गौरतलब है कि यूरोपियन यूनियन क्षेत्र की रोजमर्रा की गैस की जरूरत की लगभग 40 फीसदी पूर्ति रूसी निर्यात से होती है। दरअसल, ब्रिटिश पत्रिका इकॉनमिस्ट के एक पॉडकास्ट में बताया गया है कि पश्चिमी प्रतिबंधों का रूस पर उतना असर नहीं दिखा है, जितनी उम्मीद अमेरिका और उसके साथी देशों को थी। इसके विपरीत रूस की वास्तविक और वित्तीय अर्थव्यवस्थाओं ने प्रतिबंध को सह लेने की आश्चर्यजनक क्षमता दिखाई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 2014 में यूक्रेनी इलाके क्राइमिया को जब रूस ने खुद में मिला लिया, तब भी पश्चिमी देशों ने उस पर पाबंदियां लगाई थीँ। तब से रूस ने प्रतिबंधों का मुकाबला करने की बड़ी तैयारी की। उसका फायदा अब उसे मिला है। जबकि प्रतिबंध लगाने वाले देशों के सामने अब नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैँ।


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