कांग्रेस बदलने को तैयार नहीं


अजीत द्विवेदी

चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के बारे में अपनी जो ताजा राय व्यक्त की है उसमें उन्होंने कहा है, 'कांग्रेस पार्टी सुधरती नहीं है, अपने तो डूब रही है हमको भी डुबा देगी। हम 10 साल में सिर्फ एक चुनाव हारे 2017 में। कांग्रेस ने हमारा ट्रैक रिकॉर्ड खराब कर दिया, इसलिए उसके बाद हमने उनसे हाथ जोड़ लिया कि इन लोगों के साथ कभी काम नहीं करेंगे। सचमुच प्रशांत किशोर ने 2017 के बाद कांग्रेस के लिए काम नहीं किया। हालांकि वे कांग्रेस के साथ जुडऩे जरूर गए थे लेकिन वह एक अलग मामला है। वे चुनाव रणनीतिकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक नेता के तौर पर कांग्रेस के साथ जुड़ कर उसमें संरचनात्मक बदलाव करके उसे भाजपा से मुकाबले के लिए तैयार करने के मकसद से गए थे। उनके कई बार प्रेजेंटेशन देने के बावजूद जब कांग्रेस उनकी शर्तों पर राजी नहीं हुई तो लगा कि कांग्रेस एक चुनाव रणनीतिकार के तौर पर तो उनकी सेवा लेना चाहती है लेकिन एक नेता के रूप में पार्टी में शामिल कर उन्हें अपने मन से हर काम करने की छूट नहीं देना चाहती।

कांग्रेस ने हालांकि प्रशांत किशोर के कुछ सुझावों पर उदयपुर के नव संकल्प शिविर में विचार किया और उनमें से कुछ पर अमल का फैसला भी किया। लेकिन नव संकल्प शिविर के बाद पिछले तीन हफ्ते में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं उनसे ऐसा लग नहीं रहा है कि कांग्रेस इस बात को समझ पाई है कि उसके अंदर क्या कमी है और उसे क्या सुधार करना है। असल में कांग्रेस ने उदयपुर में अपनी कमियों पर चर्चा ही नहीं की। यह सोचा ही नहीं कि उसकी क्या कमजोरी है, जिसकी वजह से वह लगातार चुनाव हार रही है और जिसकी वजह से लगातार उसके नेता पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं। तीन दिन तक पार्टी के शीर्ष नेता विचार करते रहे लेकिन हार पर चिंतन नहीं किया और न संगठन पर विचार हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव अगस्त में होना है। उसकी तैयारियों से भी पार्टी कोई राजनीतिक माहौल नहीं बना पाई है, जबकि भाजपा अध्यक्ष का चुनाव अगले साल होना है और उसने हर प्रदेश में लगातार कार्यसमिति का आयोजन करके राजनीतिक माहौल बनाया हुआ है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक हुई है।

नव संकल्प शिविर के बाद जो सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है वह राज्यसभा के दोवार्षिक चुनाव हैं। इन चुनावों के लिए कांग्रेस के उम्मीदवारों को देख कर भी साफ हो गया है कि कांग्रेस किसी हाल में नहीं बदल सकती है। कांग्रेस ने कुल 10 उम्मीदवार उतारे हैं लेकिन उनमें महाराष्ट्र के एक, राजस्थान के तीन, छत्तीसगढ़ के दो और हरियाणा के एक यानी सात उम्मीदवारों को लेकर राज्यों में जबरदस्त विरोध है। सोचें, 10 में से सात उम्मीदवारों का भारी विरोध है और उन्हीं में से दो उम्मीदवार ऐसी लड़ाई में फंस गए हैं, जहां उनके जीतने की संभावना कम हो गई है। कांग्रेस ने कर्नाटक से जयराम रमेश, तमिलनाडु से पी चिदंबरम और मध्य प्रदेश से विवेक तन्खा को छोड़ कर बाकी सारे उम्मीदवार बाहरी दिए हैं। यानी जिस राज्य में सीटें खाली हुई हैं वहां की बजाय दूसरे राज्य का उम्मीदवार उतारा है। कांग्रेस ने ऐसा सिर्फ इसलिए किया है कि परिवार के प्रति निष्ठा रखने वालों को उच्च सदन में भेजा जा सके।

कांग्रेस ने उम्मीदवार तय करने में न तो सामाजिक समीकरण का ध्यान रखा है और न क्षेत्रीय संतुलन का प्रयास किया है। बादशाह के हुक्मनामे की तरह उम्मीदवारों के नाम जारी कर दिए गए। उत्तर प्रदेश के रहने वाले राजीव शुक्ल छत्तीसगढ़ से, प्रमोद तिवारी राजस्थान से और इमरान प्रतापगढ़ी महाराष्ट्र से चुनाव लड़ रहे हैं। हरियाणा के रणदीप सुरजेवाला और महाराष्ट्र के मुकुल वासनिक राजस्थान से तो दिल्ली के अजय माकन हरियाणा से उम्मीदवार हैं। बिहार की रंजीत रंजन को छत्तीसगढ़ से उम्मीदवार बनाया गया है। इसके उलट भाजपा ने अपने 22 में सिर्फ दो उम्मीदवारों को उनके राज्य के बाहर टिकट दिया है। उसने निर्मला सीतारमण को कर्नाटक और के लक्ष्मण को उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार बनाया है।

अगर सामाजिक समीकरण की बात करें तो भाजपा ने 22 उम्मीदवारों में से सिर्फ चार ब्राह्मण उम्मीदवार दिए हैं। इनके अलावा उसके ज्यादातर उम्मीदवार पिछड़ी और दलित जातियों के हैं। उसने इस बात का खास ख्याल रखा है कि कम से कम उम्मीदवार हाई प्रोफाइल हो। उसने ज्यादातर संगठन के नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका दिया है। इसके उलट कांग्रेस ने 10 में से पांच ब्राह्मण सहित सात सवर्ण उम्मीदवार दिए हैं। कांग्रेस की सूची में एक दलित, एक ओबीसी और एक मुस्लिम है। इसके अलावा लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा देने वाली पार्टी ने 10 में से सिर्फ एक महिला उम्मीदवार दिया है, जबकि भाजपा के 22 उम्मीदवारों में से चार महिलाएं हैं। भाजपा ने तीन राज्यों में अतिरिक्त उम्मीदवार देकर कांग्रेस को फंसाया है लेकिन मौका होने के बावजूद कांग्रेस किसी राज्य में भाजपा को नहीं उलझा सकी। उलटे कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी नासमझी या अपरिपक्वता में झारखंड की सहयोगी पार्टी जेएमएम से संबंध खराब किया सो अलग।

कांग्रेस ने जिस तरह से अपने शासन वाले राज्यों- राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उम्मीदवार दिए हैं उससे ऐसा लग रहा है कि पार्टी ने इन दोनों राज्यों में अगले साल होने वाले चुनाव में जीतने का इरादा त्याग दिया है। अगर कांग्रेस इन राज्यों में लडऩे और जीतने का इरादा दिखाती तो सारे उम्मीदवार स्थानीय होते और राज्य के जातीय समीकरण के अनुरूप होते। जमीनी कार्यकर्ता होते और दोनों मुख्यमंत्रियों के हाथ मजबूत करने वाले होते। लेकिन उसकी बजाय पांच बाहरी व थके-हारे नेताओं को उम्मीदवार बना कर कांग्रेस आलाकमान ने अपने मुख्यमंत्रियों को भी मुश्किल में डाला है और आगे की संभावना भी खराब की है। दूसरी और बड़ी कमी यह है कि कांग्रेस अब भी उस बादशाही वाले अंदाज में काम कर रही है कि जो निष्ठावान नहीं है या कभी भी जिसने परिवार पर सवाल उठाया है उसको कुछ नहीं देना है। तभी पार्टी के अनेक उपयुक्त उम्मीदवारों की अनदेखी कर दी गई।

सोचें, इतनी खराब दशा में भी कांग्रेस परिवार के प्रति निष्ठावान लोगों को उपकृत करने और असंतुष्ट नेताओं को निपटाने के खेल में लगी है। इतने मुश्किल समय में पार्टी अपनी कमियों पर विचार नहीं कर रही है। पार्टी को एकजुट रखने और नेताओं से बात कर उनकी शिकायतों को दूर करने की बजाय ऐसे हालात बना रही है कि और नेता पार्टी छोड़ कर जाएं। नव संकल्प शिविर के बाद सुनील जाखड़ और कपिल सिब्बल जैसे पुराने नेता पार्टी छोड़ गए। कांग्रेस ऐसे दिखा रही है, जैसे उसे इसकी परवाह ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ नेताओं के मामले में पार्टी की यह एप्रोच है। पार्टी के पास कोई संगठन भी नहीं है और कोई कार्यक्रम भी नहीं है। इतनी घनघोर महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी के बावजूद सरकार को घेरने वाला कोई कार्यक्रम कांग्रेस नहीं चला रही है। भाजपा और क्षेत्रीय पार्टियां आगे होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी में लगी हैं लेकिन कांग्रेस नेता पार्टी के अंदर एक-दूसरे को निपटाने के खेल में लगे हैं। असल में लगातार चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस के नेता इस मुगालते में हैं कि एक दिन लोग भाजपा से उब जाएंगे और फिर घर बैठे कांग्रेस को सत्ता सौंप देंगे।

एक बार 2004 में ऐसा हो गया था लेकिन अब ऐसा नहीं होने वाला है।

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