कांग्रेस नेतृत्व से पार्टी नहीं संभल रही

अजीत द्विवेदी

कोई कुछ भी कहे हकीकत यहीं है कि कांग्रेस नेतृत्व से पार्टी नहीं संभल रही है। हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस नेतृत्व में पार्टी को संभालने का न तो जुनून दिख रहा है और न कोई ठोस संरचनात्मक योजना दिख रही है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि कांग्रेस अब भी मजबूत है और सिर्फ चुनाव हार जाने से वह खत्म नहीं हो जाएगी। सैद्धांतिक रूप से यह बात ठीक है लेकिन कांग्रेस के सामने संकट सिर्फ यह नहीं है कि वह चुनाव हार रही है, बल्कि असली संकट यह है कि उसकी जगह लेने के लिए विकल्प उभर रहा है। भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे अच्छी बात यह थी कि हिंदुत्व की राजनीति के स्पेस में वह अकेली पार्टी थी। इसलिए लगातार हारते रहने के बावजूद हिंदुत्व की विचारधारा और उसके राजनीतिक स्पेस की वह अकेली प्रतिनिधि पार्टी के तौर पर बची रही। इसके उलट कांग्रेस के आइडिया और उसके स्पेस में राजनीति करने वाली पार्टियों की भरमार है। कांग्रेस से अलग हुई पार्टियां हों या समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियां हों या आम आदमी पार्टी हो सब कांग्रेस के आइडिया और उसके स्पेस में राजनीति कर रहे हैं। तभी कांग्रेस का संकट बहुत गहरा है।

कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व इस संकट की गंभीरता को नहीं समझ रहा है या समझ रहा है तो उसके पास इस संकट से निपटने की कोई योजना नहीं है। राजनीति एक जुनून है, जो सत्ता की अदम्य चाहना से निर्देशित होती है। सारी पार्टियां और नेता कहते हैं कि वे देश और जनता की सेवा के लिए राजनीति में आएं हैं लेकिन यह सिर्फ कहने की बात होती है। हर पार्टी और राजनेता को निर्देशित करने वाली केंद्रीय शक्ति सत्ता की भूख होती है। कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व में या कम से कम राहुल गांधी में उसकी कमी है। वे यह मान कर राजनीति नहीं करते हैं कि इसमें असफल हो गए तो दुनिया खत्म हो जाएगी! वे यह मान कर राजनीति करते हैं और चुनाव लड़ते हैं कि हार गए तो क्या हो जाएगा? क्योंकि कांग्रेस की लगातार हार से भी उनकी स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है इसलिए वे जुनून के साथ न राजनीति करते हैं और न चुनाव लड़ते हैं। उनकी राजनीतिक ईमानदारी, बेबाकी और साहस अपनी जगह हैं लेकिन सिर्फ बयानों से राजनीति नहीं होती है।

हकीकत यह है कि राहुल गांधी हों या कांग्रेस का पूरा मौजूदा नेतृत्व हो उसमें ऊर्जा का अभाव है। उसमें स्पष्ट वैचारिक सोच का अभाव है। उसको समझ में नहीं आ रहा है कि उसकी वैचारिक व राजनीतिक विशिष्टता क्या है! उसके नेता हिंदुत्व की राजनीति की काट में कभी मंदिरों में दौड़ते हैं और भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को चोट पहुंचाने वाली बातों पर भी चुप रह जाते हैं तो कभी खैरात बांटने वाली राजनीति के जवाब में ज्यादा खैरात बांटने की घोषणा करते हैं। कभी इसकी तरफ तालमेल का हाथ बढ़ाते हैं तो कभी उसकी तरफ। दीर्घावधि की योजना से कुछ भी निर्देशित होता नहीं दिख रहा है। सारे फैसले तात्कालिक राजनीतिक और चुनावी जरूरतों को ध्यान में रख कर किए जा रहे हैं।

इसके बाद जब पार्टी के नेता सवाल उठाते हैं और पार्टी छोड़ते हैं तो उनको कायर, डरपोक, अहसानफरामोश कहा जाने लगता है। किसी को कायर कह देना बहुत आसान है। आप साहसी हैं इसका यह मतलब नहीं है कि आपसे सहमत नहीं होने वाला हर व्यक्ति कायर है। क्या कांग्रेस छोडऩे वाले सारे लोग सिर्फ ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग के डर से पार्टी छोड़ कर गए हैं या कोई और गहरी समस्या है, जिसने दशकों तक पार्टी में रहे नेताओं को मजबूर किया कि वे पार्टी छोड़ें? सत्ता का लालच पार्टी छोडऩे का एक कारण हो सकता है और हो भी क्यों नहीं क्या सारी राजनीति सत्ता के लिए ही नहीं होती है? राहुल गांधी में सत्ता की भूख नहीं है या सत्ता की अदम्य चाहना नहीं है लेकिन उनको यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि बाकी लोग भी सत्ता से निरपेक्ष होकर राजनीति करेंगे। आज कांग्रेस के जो नेता पार्टी छोडऩे वालों को कायर, अहसानफरामोश या सत्ता का लालची कह रहे हैं, जरा राहुल गांधी उनका पद वापस लेकर दिखाएं, फिर पता चलेगा कि असलियत क्या है? क्या आज कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या पार्टी का पदाधिकारी स्वेच्छा से अपना पद छोड़ेगा? अगर उसे लालच नहीं है और वह साहसी है तो पद छोड़ कर लड़े! यकीन मानिए ऐसा हुआ तो लडऩे वालों की संख्या बहुत कम बचेगी!

इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को अपने स्वप्न लोक से निकलना होगा और व्यावहारिकता के कठोर धरातल पर खड़े होकर राजनीति करनी होगी। उसे समझना होगा कि सिर्फ केंद्र सरकार की एजेंसियों के डर से लोग कांग्रेस नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि उनको यकीन हो गया है कि कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व उन्हें सत्ता नहीं दिला सकता है। वे अपने भविष्य की चिंता में कांग्रेस छोड़ रहे हैं। उनको लग रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व का करिश्मा खत्म हो गया है। उसमें कोई ऊर्जा, कोई वैचारिकता और सत्ता हासिल करने की अदम्य इच्छा से निर्देशित होने का जुनून नहीं बचा है। उनको लग रहा है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस पार्टी को रसातल से नहीं निकाल पाएंगे। उनको दिख रहा है कि कांग्रेस एक खड़ी ढलान से लुढक़ती हुई पार्टी है, जिसके बीच में रूकने और वापस सत्ता की चढ़ाई चढऩे का कोई मौका अभी नहीं है।

कांग्रेस को सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि पार्टी और नेतृत्व दोनों कमजोर हो गए हैं। सोचें, कांग्रेस पार्टी ढाई साल से अध्यक्ष नहीं चुन पाई है। लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल ने इस्तीफा दिया तब से पार्टी सोनिया गांधी के तदर्थ नेतृत्व में चल रही है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस चिंता में दुबला हुआ जा रहा है कि भाजपा की ओर से वंशवाद के आरोप लगाए जा रहे हैं तो कैसे खुल कर पार्टी का नेतृत्व परिवार के हाथ में ही रखा जाए। कांग्रेस को यह भ्रम तत्काल खत्म करना होगा। पहले भी कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र टाइप की कोई चीज नहीं थी और पहले भी कांग्रेस का नेतृत्व परिवार के हाथ में रहा तभी कांग्रेस एकजुट रही और बची रही। या तो आंतरिक लोकतंत्र और वंशवाद की चिंता छोड़ कर नेहरू-गांधी परिवार कमान अपने हाथ में रखे या तत्काल किसी ऐसे नेता को कमान सौंपे, जिसमें सत्ता के लिए लडऩे-भिडऩे का जुनून हो। नेतृत्व के साथ ही विचारों में स्पष्टता लानी होगी और अपनी राजनीति को धारदार बनाना होगा। सिर्फ प्रतीकात्मक विरोध से कुछ नहीं होगा और न ट्विटर पर आंदोलन करने से कुछ होगा। नेता को सडक़ पर उतरना होगा। गांवों में जाना होगा। ट्रेन से सफर करना होगा। पैदल चलना होगा। लोग नेता को अपने बीच पाकर खुश होते हैं, उसके साथ अपने को जोड़ते हैं। चंद्रशेखर की भारत यात्रा ने उनको देश का नेता बनाया था। राजीव गांधी भी ट्रेन देश घूमे थे। नरेंद्र मोदी ने कन्याकुमारी से कश्मीर और सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा की है। राहुल या प्रियंका को अगर कांग्रेस को रसातल से बाहर निकालना है तो उन्हें भी तत्काल देश की खाक छानने के लिए निकलना होगा।


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