कष्टों की प्रेरक याद

प्रस्तुति : किरणपाल बुम्बक



जब प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तब श्रीराम ने माता कौशल्या को कहा, ‘मां, अब मैं राजा बन गया हूं। अपने से छोटों को मुझे कुछ देना चाहिए। सबसे कहो, मुझसे कुछ मांग लें।’ तब भरत को बुलाया गया तो भरत ने कहा, ‘मेरा आपके चरणों में प्रेम बढ़ता जाए।’ भरत की पत्नी मांडवी को बुलाया गया तो उन्होंने कहा, ‘रघुकुल की पुत्रवधू बनने का सौभाग्य मिला, मुझे और क्या चाहिए ’ लक्ष्मण को बुलाया गया तो वे बोले, ‘बचपन से साथ रहता आया हूं, बाकी जीवन भी इसी प्रकार व्यतीत हो।’ उर्मिला ने मांगा, ‘कैसी भी परिस्थितियां आयें मेरा धैर्य बना रहे।’ शत्रुघ्न ने भरत जी की सेवा मांग ली। शत्रुघ्न की पत्नी श्रुतिकीर्ति ने मांगा, ‘प्रभु, आज स्नान करने से पूर्व जो वस्त्र आपने वनवास में पहने थे, वह आप मुझे दे दें। कल को यदि दुख आये तो हम त्याग और समर्पण के सिद्धांत को न भूल जायें, ये वस्त्र हमें याद दिलाते रहेंगे।’


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