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कर्म से मानसिक शक्ति बढ़ा हासिल करें लक्ष्य

अमिताभ स.


लॉकडाउन खुलने के दौर में शहरियों को चिंता सताने लगी है कि कामगार गांव से न लौटे तो घर में रोज के काम कौन करेगा। रिक्शा में बैठाकर उन्हें बस या मेट्रो स्टेशन कौन लाएगा-ले जाएगा। उनकी फैक्टरियों में पसीना बहाकर कौन माल बनाएगा। वास्तव में, अब शहरियों को अपना काम स्वयं करने की आदत कहां रही है? आने वाले दौर में हमें कोविड-19 के साथ ही नहीं बग़ैर मददगारों के अपने काम ख़ुद करने के साथ जीना सीखना होगा। यानी अपना-अपना काम पहले करने की सलाह। फिर भी अपना छोटा-बड़ा हर काम खुद करना आना ही चाहिए। याद रखिए, कोई दूसरा आपके लिए सब कुछ नहीं कर सकता। बहुत कुछ आप को खुद करना पड़ता है। कोशिश की जाए तो मुश्किल भी नहीं है। हालांकि, हर किसी को अक्सर लगता है कि मैं अगर थोड़ा-सा प्रयत्न करूं तो उन परिस्थितियों का निर्माण कर सकता हूं जो मेरी पहुंच से जऱा बाहर लगती हैं। कहते ही हैं कि भक्ति करो, जैसे सब ईश्वर पर निर्भर है और कर्म करो, जैसे सब कुछ आप पर निर्भर है। कर्म न करने वाले ही मददगारों की आस में वक्त गंवाते रहते हैं।

अपना हर कार्य बढिय़ा करना ही सच्चा योग है। कर्म का मूलमंत्र यही है कि हम जो भी करें, पूरी निष्ठा और समूची लगन से करें। श्री श्री परमहंस योगानंद सत्संगों में बखान करते हैं, ‘आपको पहले अपने शरीर की शक्ति को बढ़ाना चाहिए, फिर मन की शक्ति को। मानसिक शक्ति को बढ़ाने का सर्वोत्तम उपाय है कि आप प्रतिदिन कुछ अर्थपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करें। प्रतिदिन किसी ऐसी उपलब्धि को हासिल करें, जिसके बारे में आप सदा सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते।’ हौसला बढ़ाते हुए और कहते हैं, ‘तुम्हें और अधिक प्रयत्न करना चाहिए तो करो। जुटे रहो अपने हाथों से जीवन की बगिया को संवारने में।’

इसी भाव पर चीनी लोककथा है—एक बार वहां सूखा पड़ गया। बारिश नहीं हुई, लेकिन एक किसान रोज़ अपना फ़ावड़ा उठाकर खेत में पहुंच जाता। चौदह साल तक बारिश नहीं, मगर वह लगातार खेत जाता रहा और अपना काम करता रहा। अंतत: इंतज़ार की घडिय़ां ख़त्म हुईं, इंद्र देव मेहरबान हुए, झमाझम बारिश हुई। उसकी ज़मीन ने ढेरों-ढेर नमी सोख ली। क्योंकि वह मिट्टी को मुलायम करता रहा था। उधर बाक़ी किसानों ने सूखे से परेशान होकर, अपने खेत छोड़ दिए थे, उनके खेतों की मिट्टी सख्त और पथरीली हो चुकी थी। सो, वहां पानी तो खूब गिरा, लेकिन बह गया। बारिश के बावजूद खेती नहीं कर पाए। दरअसल, अगर व्यक्ति अपने काम में अविचलित जुटा रहे तो उसे किसी का मोहताज होने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

हर परेशानी का हल ख़ुद के भीतर ही होता है। शक्तियां खुद के भीतर ही मौजूद हैं। भीतरी शक्ति को बाहर निकालकर नामुमकिन को भी मुमकिन किया जा सकता है। सद्गुरु जग्गी वासुदेव समझाते हैं, ‘जब आप अपने को कार्यकलापों में पूरी तरह झोंक देते हैं, तब आप की ऊर्जा बढ़ती और परिपक्व होती जाती है।’ धर्म ग्रंथ कहते हैं—हमारे एक हाथ में काम और कर्तव्य है, तो दूसरे हाथ में सफलता सुनिश्चित है। जो अपना कर्म करता है, उसका भाग्य जाग जाता है, जो बैठा रहता है, उसका भाग्य बैठ जाता है और जो सोता रहता है, उसका भाग्य भी सो जाता है।

इनसान हर कि़स्म की चुनौतियों और परीक्षाओं से लडऩे में सक्षम है। ईश्वर जैसे सब कुछ कर सकते हैं, वैसे ही इनसान भी सब कुछ कर सकता है। कमी होती है, इरादे को पाने के दृढ़निश्चय की। इनसान मन में कुछ भी ठान ले, तो वह कर सकता है। पुरुषार्थ में कि़स्मत बदलने तक का दमख़म है। कैसे? राजा विक्रमादित्य के पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला ज्योतिषी आया। उनके सामुद्रिक लक्षण देखकर ज्योतिषी गहरी सोच में डूब गया। असल में, लक्षणों के आधार पर उन्हें दुर्बल, दीन और कंगाल होना चाहिए था। लेकिन वह स्वस्थ, सम्पन्न और सम्राट थे। यानी जो-जो लक्षण ज्योतिषी ने देखे, उससे उलट उनका व्यक्तित्व दिखाई दिया। ज्योतिषी की दुविधा भांप कर राजा विक्रमादित्य बोले, ‘ज्योतिषी आचार्य, आप चिंतित मत हों। बाहरी लक्षणों से अगर आप असन्तुष्ट हैं, तो जऱा ठहरिएज्’, कहते-कहते विक्रमादित्य ने म्यान से तलवार निकाली और अपनी छाती पर नोक टिका दी। फिर बोले, ‘छाती चीर कर दिखाता हूं, भीतर के लक्षण भी देख लीजिये।’ ज्योतिषी झट से बोल पड़ा, ‘मैं समझ गया, महाराज। आप निर्भय हैं, पुरुषार्थी हैं, इसलिए सारी परिस्थितियां आपके अनुकूल हो गई हैं।’

अपने हर छोटे-बड़े काम को सफलतापूर्वक हेतु उत्साहवर्धन के चंद अचूक सूत्र हैं—पहला, अपनी क्षमताओं को पहचानें, भीतर आत्मविश्वास जगाएं और स्वप्रेरित रहें। दूसरा, छोटा-बड़ा हर काम पूरे दमख़म से करें। छोटे-छोटे कामों को सफलतापूर्वक करने में ख़ुद पर गर्व महसूस कीजिए। तीसरा, गुजरे दौर को याद कर, खेद जताने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। नया सीखें और आगे बढ़ें। चौथा, सपने देखें ज़रूर, लक्ष्य तय करें और उन्हें हासिल करने के लिए लगे रहें। पांचवां, अगर आप नीति या योजना बनाने में चूक गए, तो समझिए कि आपकी चूकने की योजना बन गई। दूरदृष्टि हर हाल में अत्यंत ज़रूरी है। और छठा, हिम्मत नहीं हारनी है, जुनून के साथ लगे रहना जरूरी है। पहले ऐसे काम करें, जिन्हें करने में ख़ुशी मिलती है, इससे पॉजि़टिव मूड बना रहता है और फिर सारे काम तेज़ी से सम्पूर्ण होने लगते हैं।

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