ऐसा तो होना ही है और!


हरिशंकर व्यास

यदि दुनिया की आठ अरब आबादी के 95 प्रतिशत लोग भेड़-बकरी जीवन जीते हुए हैं तो क्या यह होनी इतिहास के कारण नहीं है? पृथ्वी के सभी इंसान खोपड़ी में कमोबेश 99 प्रतिशत एक से डीएनए लिए हुए हैं बावजूद इसके मानव समाजों में फर्क है। 95 प्रतिशत गंवार बनाम पांच प्रतिशत सभ्य-स्वतंत्र जीवन का जो फर्क है वह यदि परिवेश और डीएनए के कारण है तो दोनों की प्रवृत्तियों में इतिहास भी सच्चाई लिए हुए है। क्या पता इसी के कारण मानवता बार-बार संकट में आती हो। मानो हम सब अतीत की अपंगताओं से नियति के मारे हैं और अब अपना व पृथ्वी के अस्तित्व का संकट बना बैठे हैं। प्रलय का मुहाना-3: सौ वर्षों का रिकॉर्ड निकालें। मानवता को झिंझोडऩे वाली आपदाओं, संघर्षों को गूगल पर खोजें तो क्या मिलेगा? यह रोना कि ऐसा तो होना ही था! होनी ही थी यूक्रेन और रूस में लड़ाई। होना ही है धर्म संघर्ष और जेहाद। मनुष्य को एक-दूसरे से लगातार लड़ते रहना है। दूसरे शब्दों में इंसान की नियति है जो वह शोषण, पॉवर भूख, विपदाओं-आपदाओं की ‘सरवाईवल ऑफ द फिटेस्ट’ की परीक्षा में हमेशा बैठा रहे! इससे जो जीतेंगे, वे संपन्न बनेंगे और सभ्यता बनाएंगे। सभ्यताओं के अधिपति बनेंगे, सुख भोगेंगे। अंत में वे अपने भार से पतन के शिकार होंगे। बर्बरों की तलवारों से तबाह होंगे। यह सत्य सभ्यताओं के इतिहास का लब्बोलुआब है। तभी अमेरिका यदि अफगानिस्तान से भागा तो क्या आश्चर्य! पहले सोवियत संघ भी भागा था। बर्बर से कौन सभ्य जीत सकता है? महामारी लौट आई तो क्या आश्चर्य? मनुष्य कैसे प्रकृति से जीत सकता है? क्या सत्य नहीं कि पिछली सदी, उससे पिछली सदी याकि पूरा अतीत विपदाओं-आपदाओं से भरा पड़ा है। क्या लगता नहीं कि मनुष्य प्रजाति उत्थान-पतन, विकास-विनाश के बिल्ट-इन बीज, जन्मजात जन्मपत्री को लिए हुए है! होना वहीं है जो होनी है! कलियुग में हिंदुओं को जीना ही है। निरंकुशता के पिंजरों में चाइनीज, रूसी नस्ल के लोगों को सांस लेना ही है। कितना ही मनुष्यों में भरत-मिलाप हो लेकिन भाई-भाई लड़ेंगे ही। गौर करें रूस और यूक्रेन की रिश्तेदारी पर! नौवीं सदी से नाते-रिश्ते हैं लेकिन बावजूद इसके सन् 2014 और सन् 2022 में लड़ाई का अनुभव है तो वह होनी है। तो क्या अतीत से जन्मपत्री है? पृथ्वी के आठ अरब आबादी के अलग-अलग बाड़ो के अपने-अपने इतिहास की जन्मपत्री अपनी पूर्वनिर्धारित चाल लिए हुए होती हैं, जिन्हें क्रमबद्धता से बूझें तो भविष्य दिखेगा! इतिहास से बनी जन्मपत्री कमाल की है। उससे सोचें तो हिंदुस्तान के दो टुकड़े होने ही थे। हिंदू-मुस्लिम विभाजन होना ही था। दोनों को विभाजन के बाद भी लड़ते रहना है। खंड-विखंड होना है। ऐसे ही सोवियत संघ ढहना ही था। इस्लामी जिहाद का भभका लगातार बने रहना है तो चीन की महत्वाकांक्षाएं लगातार पांव पसारते हुए होंगी। इसलिए क्यों न मानें कि सभ्यताओं के संघर्ष, नए-आधुनिक किस्म के महाभारत की आगे भी ‘होनी’ है।

पिछले सौ वर्षों या पांच सौ सालों के मानव समाज के पोस्टमार्टम का निचोड़ बूझें। जाहिर होगा वैश्विक परिवर्तनों के कारण-प्रभाव का सत्व व मनुष्य स्वभाव एक पैटर्न लिए हुए है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जन्मपत्री में ट्रांसफर होता है। तभी इंसान होनी की नियति में जीता आया है। मानव अस्तित्व और इतिहास एक-दूसरे की झांकी हैं। इसलिए मानव समाज की जन्मपत्री सामान्य बात है। स्मृतियों का कालजयी टाइम कैपसूल है इतिहास। किसी ने ठीक कहा कि सभी लोग जिंदा इतिहास हैं। लोग वहीं भाषा बोलते हैं जो विरासत से प्राप्त है। वहीं करते हैं जो पूर्वज करते आए हैं। जीवन का जीना इतिहास से, इतिहास में और इतिहास के लिए होता है। इतिहास जीवन वास्तविकताओं की खदान है, अनिवार्यता है न कि एक ख्याल या उपयोगी विषय! यह सत्य व्यक्ति विशेष पर लागू है तो समाज, कौम, देश, सभ्यता की सामूहिकता पर भी समान रूप से लागू है।

इतिहास की इतनी विवेचना इसलिए है क्योंकि मानव विकास के बाकी शास्त्रों से भले बहुत कुछ संभव हुआ हो लेकिन वह सब ज्ञात इतिहास के क्रम और कुंडली में है। उस नाते संभव है भविष्य में पृथ्वी के लोगों की कलह, संघर्ष, मारकाट, युद्ध, महायुद्ध याकि देव बनाम असुर प्रवृत्तियों के कारण और परिणामों का एक पूर्वानुमान विज्ञान बने। मनुष्य स्वभाव की अतीत की सत्यताओं पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से अलग-अलग सभ्यताओं की कमियों-खूबियों की प्रोग्रामिंग हो जाए। उसी पर फिर मानवता के भविष्य को सुरक्षित, बेहतर बनाने की प्रोग्रामिंग के कंप्यूटरकृत मॉडल भविष्यवाणी करते हुए होंगे।

क्या तब लग सकेगा होनी (यह तो होना ही था) का वैज्ञानिक पूर्वानुमान और ‘होनी-अनहोनी’ पहेली की सच्ची मानवशास्त्रीय या ज्योतिष विवेचना संभव?

इतिहास के डायग्नोसिस से पूर्वानुमान संभव है तो इलाज भी संभव! यह मुमकिन नहीं कि मनुष्य चेतना से इतिहास मिट जाए या खत्म हो जाए। इसकी गलतफहमी में कई दार्शनिकों और विचारकों ने मानवता का बहुत नुकसान किया है।

सो, अतीत मानव चेतना की सडक़ है वह नहीं मिट सकती। इतिहास मर नहीं सकता।

पर हां, पृथ्वी और मनुष्य जीवन यदि खत्म हो जाए तब जरूर मनुष्य और इतिहास के शव अंतरिक्ष या मृत पृथ्वी के श्मशान में छितरे होंगे। अन्यथा जब तक पृथ्वी पर मनुष्य जीवन है तब तक इतिहास से जीवन और विश्व मानविकी का जीवन है।

प्रश्न है इतिहास से क्या वर्तमान का उपचार संभव है? और किस-किस पहलू में उपचार? क्या खुद इतिहास का उपचार और मनुष्य प्रकृति का?

सवाल है मानव समाज और मनुष्य प्रकृति के बाड़ों को उपचार की क्या जरूरत भी है?

हां, है! ताकि पृथ्वी व मनुष्य का अस्तित्व, उसका भविष्य सुरक्षित बन सके।

सोचें, यदि दुनिया की आठ अरब आबादी के 95 प्रतिशत लोग भेड़-बकरी जीवन जी रहे है तो क्या यह होनी इतिहास के कारण नहीं है? पृथ्वी के सभी इंसान खोपड़ी में कमोबेश 99 प्रतिशत एक से डीएनए लिए हुए हैं बावजूद इसके मानव समाजों में फर्क है। 95 प्रतिशत गंवार बनाम पांच प्रतिशत सभ्य-स्वतंत्र जीवन का जो फर्क है वह यदि परिवेश और डीएनए के कारण है तो दोनों की प्रवृत्तियों में इतिहास भी हर समाज की सच्चाई लिए हुए है। मनुष्य-मनुष्य का फर्क डायग्नोसिस से भी जाहिर है। तब मनुष्य विकास के क्रम में पैदा शारीरिक-मानसिक अपंगता की ब्रांचों की मनुष्यता कब तक अनदेखी करेगी? क्या पता शायद इसी कारण मानवता बार-बार संकट में आती हो? क्या पता हम सब अतीत की अपंगताओं से नियति के मारे हैं और अब अपना व पृथ्वी का दोनों के अस्तित्व का संकट बना बैठे हैं?

बहुसंख्यक इंसानों का झूठ, अंधकार और शोषण में लगातार जीना स्थायी संकट है। भीड़ वाली कैटल क्लास मानव त्रासदी का सत्य है। इससे सत्य-समझदारी के सामूहिक फैसले नहीं हो पाते। लोगों में न अपने से हिम्मत होती है और न सामूहिक संकल्प संभव। ऐसे लोग क्रांति, बगावत कर स्थितियां ठीक नहीं कर सकते। ये अपने पुरुषार्थ पर नहीं, बल्कि मालिक के सुपुर्द हो कर जीवन जीते हैं। ऐसी नस्ल, ऐसे लोग आंख मूंद कर मानेंगे कि पुतिन की बर्बरता व तानाशाही सही है। राष्ट्रपति किम जोंग भगवान हैं। राष्ट्रपति शी जिनफिंग उद्धारक हैं! ये नेता जो भी करें, परमाणु लड़ाई लड़ें, दुनिया का संहार करें, अपने ही लोगों को पिंजरों में रखें मगर जनता इनके तराने गाते मिलेगी। ऐसा पहले भी था, आज भी है और भविष्य की भी होनी है!

पुनरावृत्ति कैसे रूके? पृथ्वी की 95 प्रतिशत मनुष्य भीड़ कैसे अंधकार से बाहर निकले? क्या संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था से समाधान संभव है? या किसी तरह के वैश्विक मॉडल, ऐप से ऐसा हो सकना संभव है कि भविष्य में वह नहीं होगा जो होता आया है!

मनुष्य चेतना में नासमझी और समझदारी का मसला पेचीदा है। उसके आगे के कदम अतीत से उठते हैं। पहले से लकीर चली आ रही है। उसी पर उसका वर्तमान है। अतीत की याद अनुसार अहंकार, भय, असुरक्षा, भयाकुलता में व्यवहार है। समझदार है तो समझदारी से मनुष्य लकीर पर कल याकि भविष्य का कदम उठाएगा। जबकि नासमझ लोग बेसुधी, खौफ, भक्ति, पराश्रय से नींद में चलते हुए होंगे। 95 प्रतिशत लोग सपने देखते, नींद में चलते हुए जबकि पांच प्रतिशत लोग जागे हुए, एडवेंचर की जिंदादिली से आकाश में नई दुनिया की उड़ान बनाए हुए।

नई दुनिया का भावार्थ समझें। होमो सेपियंस का सफर अफ्रीकी गुफा के अंधकार से बाहर निकल ‘नई दुनिया’ को बसाने की अंतर-चेतना से शुरू हुआ था। ऐसे ही पांच सौ साल पहले यूरोप के जो खोजी भारत, अमेरिका, पृथ्वी को खोजने निकले थे वे भी भविष्य की नई दुनिया बनाने की होमो सेपियंस चंचलता लिए हुए थे। याद करें चंद लोगों से ही अमेरिका की नई दुनिया बनी। क्यों केवल यूरोप के लोगों में नई दुनिया का जज्बा था? वहां से क्या लोग सामंतशाही, बेहाली और जड़ता से उकताएं हुए अमेरिका नहीं गए थे? अमेरिका, लातिनी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया की नई दुनिया नई जिंदगी, नए उजियारे के लिए क्या नहीं थी? वह क्या अतीत को लात मार कर भविष्य बनाने का दुस्साहस नहीं था? वह सचमुच चंद समझदार लोगों का साहस और निश्चय था!

वहीं अब होता हुआ है! अमेरिका और यूरोप के समझदार-दुस्साहसी लोग, अंतरिक्ष में नई दुनिया बनाने की धुन में हैं।

पृथ्वी पर दो तरह के लोग हैं। एक, दिमाग में अतीत की बंद आंख और नींद लिए हुए। दूसरे वे मानव जो शरीर की इंद्रियों की जाग्रतता में, उनसे वर्तमान को भोगते हैं और ज्ञान-विज्ञान-सत्य साधना से भविष्य के कदम उठाते हैं। नए साधनों, नए पंखों से ये नई दुनिया और नए भविष्य के लिए उड़ते हुए होते है! नींद में चलने वालों के लिए होनी और भाग्य से पार पाना संभव नहीं होता है जबकि जागे हुए मनुष्य अस्तित्व और बचाव के लिए हमेशा सतर्क और विचारवान। यह मानव त्रासदी है जो सबल मनुष्यों का सामर्थ्य नहीं जो सभी मनुष्यों को पिंजरों से बाहर निकाल समझदार और उड़ता पंछी बना सके!

खैर, इस पर बाद में विचार करेंगे। मोटा-मोटी दो महायुद्धों में पैदल सेना में कौन लोग थे? महामारियों में सबसे ज्यादा कौन मरते आए हैं? सर्वाधिक प्रदूषित, जुनूनी, जिहादी जीवन लिए हुए कौन है? मजदूर, कुली, सर्विस प्रोवाइडर, बैक ऑफिस सेवाकर्ता और देश छोड़ते, भागते, शरणार्थियों के चेहरों की भीड़ में किस तरह के लोग होते हैं? क्या सर्वहारा वर्ग याकि कैटल क्लास नहीं?

मैं भटक गया हूं। लब्बोलुआब भूलोक के सर्वहारा न केवल अतीत के मारे हैं, बल्कि वर्तमान भी गिरवी रखे हुए हैं। वे उन धूर्त ठेकेदारों, स्वामित्वधारी राजाओं, महाराजाओं, नेताओं, व्यवस्थाओं के अधीन हैं, जो बेसुध पैदल सेना की ताकत पर अहंकार पालते हैं और भस्मासुर साबित होते हैं। महाभारत में कौरवों की सेना विशाल थी क्योंकि अहंकारी राजा पॉवरफुल था। ऐसे ही रावण की सेना हो या हिटलर की, सभी संख्या में विशाल। इन अधिपतियों ने अपने जादू मंतर, अपनी धूर्तताओं से लोगों की बुद्धि का हरण कर उनसे जो चाहा वह करवाया। इसलिए क्योंकि लोग दिमाग से पैदल, भक्त और जैसे कहें उस अनुसार नींद में चलते हुए। जाहिर है मनुष्य समाज के इस बेसुध हिस्से के दिल-दिमाग में न इतिहास के सबक होते हैं और न नींद में चलने के खतरे का अलार्म बजता हुआ।

इंसान- इंसान के फर्क का श्राप

इनकी संख्या आठ अरब लोगों की मौजूदा वैश्विक आबादी में कितनी हैं? इसकी संख्या पर आग्रह-पूर्वाग्रह में चाहे जो अनुमान बनाए, मोटा सत्य है कि पृथ्वी की अधिकांश आबादी ऐसी ही अवस्था में जीवन जीते हुए है। इतिहास का उन्हें श्राप मिला हुआ है। उनका ऐसा होना उनकी होनी है!

इंसान-इंसान के इस फर्क को, मनुष्य प्रकृति के सिक्के के दो पहलूओं में भी समझा जा सकता है। धर्म-व्यवस्था के आईने में भी विचार संभव है। मगर इक्कीसवीं सदी का मौजूदा संकट अलग तरह का है। मनुष्य और पृथ्वी दोनों का अस्तित्व संकट में है। यह संकट विज्ञान की खुर्दबीन से जाहिर है। विज्ञान की दो टूक भविष्यवाणी है कि जागो, पृथ्वी और मनुष्य का अस्तित्व प्रलय के मुहाने पर है। प्रलय की होनी विज्ञान-सत्य से घोषित है। तभी सीधे दो टूक विचार यह होना चाहिए कि क्या 195 देशों की 95 प्रतिशत बेसुधी में जीती मानवता के जागे बिना बचना कैसे संभव? सभी लोगों के समझदार बने कैसे प्रलय से बचा जा सकता है?


0 views0 comments